लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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aziz sahabश्रद्वांजलि……………..उस्ताद अजीज नजीबाबादी को

 
तंजो मिजाह के उस्ताद शायर जनाब अजीज नजीबाबादी आज हमारे बीच नही रहे। अपनी उम्र के 90वें पडाव में आज भी वो शायरी सेे दीवानगी की हद तक जुडे हुए थे और अपने पॉचवे नातिया मजमुए की तैयारी मैं मसरूफ थे कि अचानक मौत ने अपनी आगौश में उन्हे समा लिया। अजीज नजीबाबादी इल्मो अदब की दुनिया मैं किसी तआरूफ के मोहताज नही थे मोहतरम अजीज नजीबाबादी साहब के नाम का सूरज नजीबाबाद में उस वक्त निकला जब यहॅा इल्मो फन उरूज पर था उस्ताद शायर अख्तर साबरी, शकील रहमानी, मक्फी साहब, इरशाद अहमद इरशाद, इशरत जमा खॉ, शमीमुल कादरी, अयाज खा साहब, साकिब, माहिर मण्डावरी, जफर रहमानी, जलीस नजीबाबादी, सोज नजीबाबादी जैसे दानिशवरो की खुशबू से नजीबाबाद की सरजमी महक रही थी। ऐसे में इन दानिशवरो के बीच अजीज नजीबाबादी साहब ने तंजो मिजाह मैं अपनी एक अलग पहचान बना कर ये साबित किया कि उन की शायरी में भी दम है।
अजीज साहब से मेरा ताल्लुक उस वक्त से रहा है जब में अदब की दुनिया में अपनी जबान की तुतलाहट दूर कर रहा था। तब से मरते दम तक उन से मेरा रिश्ता ऐसा बना कि मेरे तमाम घर वालो ने उन्हे अपना बुजुर्ग बना लिया। मेरे बच्चे उन्हे दादा की तरहा प्यार करते थे उन्हे भी हर इतवार मेरे घर आये बिना चैन नही मिलता था ये ही वजह रही के आपने कदम कदम पर मेरी रहनुमाई करने के साथ साथ मेरे शेरो को सुनकर कभी दाद ओ तहसीन से नवाजा तो कभी मेरे कलाम पर इस्लाह फरमाकर मेरी हौसला अफजाई की। मेरे बहुत करीब होने की वजह से अजीज साहब को मैने बहुत करीब से देखा और समझा। अजीज साहब के षेरो में मुल्क, समाज, मंहगाई, उरयानी, रिष्वतखोरी पर गजब की शायरी मिलती है। षेर कहने की सलाहियत बहुत ही उम्दा है जो लोगो के जहनो को बिजली की तरह कौंध कर गायब हो जाती है वह धूप की तरह नही फैलती बल्कि ऑखो को चकाचौंध कर के ओझल हो जाती है लेकिन ओझल होते होते भी एक ऐसा एहसास दे जाती है जो सुनने वाले के दिलो दिमाग में बहुत आसानी से अपनी जगह बना लेती है।
एक गरीब घर में पैदा हुए अजीज साहब दिल से किसी राजा से कम नही थे उन के तंज और मिजाह के अशआरो ने अक्सर लोगो को गुदगुदाने के साथ ही उन के दिलो को झिंझोड कर रखने के साथ साथ ही उनके दिलो दिमाग में जिन्दगी की हरारत पैदा की। ये ही वजह है कि इन की ज्यादातर शायरी में आम इन्सान, दोस्ती, वतनपरस्ती, भाईचारा, अमनो इत्तेहाद, जिन्दगी कि तल्खिया देखने को मिलती रही है। आज अदब में जो बेअदबी का माहौल चल रहा है अजीज साहब उस से हमेशा अछूते रहे। फरिश्ता सिफ्त ये इन्सान मौहब्बत का भूखा होने के साथ साथ अमन पसन्द और छुपते छुपाते जरूरत मन्द लोगो कि पैसो से मदद भी करने में बहुत खुशी महसूस करता था। बडो को इज्जत छोटे से प्यार करना उन की रोज मर्राह की जिन्दगी में शामिल था। वही लोगो को दूर से देखकर मुस्कुरा देना इन की आदत में शामिल था।
अजीज साहब की शायरी उन की पूरी जिन्दगी की हकीकत बयान करती है। अपने वतन बिजनौर के जलालाबाद के एक छोटे से गॉव राहूखेडी से हिजरत करते वक्त रोटी की जरूरत जब उन्हे नजीबाबाद लाई तब उन की जरूरतो के हिसाब से उन की आमदनी बहुत कम थी, मीडिल तक पढाई करने के बाद आप जगलात में एक ठेकेदार के यहा मुंशी हो गये फिर नजीबाबाद तहसील कंपाउड में अरजी नवीस बन लोगो की खिदमत अंजाम देने लगे। आप की जिंदगी से ये मुंषी लफ्ज ऐसा जुडा की मोहल्ले बस्ती में लोग अजीज साहब को मुंषी जी के नाम से भी जानते और पहचानते थे। अजीज साहब की शायरी आकाषवाणी नजीबाबाद, जी सलाम टीवी चैनलो के साथ ही, शिगुफा (हैदराबाद) परवाज-ए-अदब (पंजाब) शायर (मुंबई) अच्छा साथी (दिल्ली) जैसे हिंदुस्तान के मुखतलिफ रिसालो में शाया होते रहती थी। आप के अब तक चार षेरी मजमुए मंजर-ए-आम पर आ चुके है जिन में ’’डके की चोट’’,हिंदी उर्दू ’’शहर-ए-तबस्सुम’’ और ’’क्या समझ’’े है इन सब को उर्दू अदब में काफी नाम मिला। ’’क्या समझ’’े को उर्दू अकादमी उत्तर प्रदेश ने दो हजार रू के ईनाम से भी नवाजा था। अजीज नजीबाबादी साहब के इन मजमुओ की कामयाबी ने ये साबित कर दिया कि हिन्दुस्तान के तंजो मिजाह केशोराहजरात में उन का शुमार आज पहली सफ केशोरामें बिलयकी किया जाता और किया जाता रहेगा। दुनिया को हसाने वाले कलम के इस जादूगर को मेरी ओर से श्रद्वांजलि……………..बडे शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्ही सो गये दास्ता कहते कहते,।
शादाब जफर ‘‘शादाब’’

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