लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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godअशोक “प्रवृद्ध”

परमेश्वर के तीनों ही लिंगों में नाम हैं । स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम सम्मुल्लास में कहा है कि, जितने ‘देव’ शब्द के अर्थ लिखे हाँ उतने ही ‘देवी’ शब्द के भी हैं l परमेश्वर के तीनों लिंगों में नाम हैं , जैसे – ब्रह्म चितिश्वरेश्चेति l जब ईश्वर का विशेषण होगा तब देव , जब चिति का होगा तब देवी इससे ईश्वर का नाम देवी है l वेद संहिताओं में अदिति शचि, ऊषा, पृथ्वी, वाक्, सरस्वती, रात्रि, धिषणा, इला, सिनीवाली, मही, भारती, अरण्यानी, निर्ऋति, मेघा, पृश्नि, सरण्यू, राका, सीता, श्री, आदि देवियों के नाम मिलते हैं । ऋग्वेद के मन्त्रों में बहुतायत से स्त्री देवता अदिति की कथा अंकित है । शक्तिधारा की आराध्य ब्रह्ममयी महाशक्ति का आदि श्रौतस्वरुप अखण्ड सत्तास्वरूपा विश्वमयी चेतना अदिति है। यही काली, दुर्गा सर्वदेवीस्वरूपिणी है –
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ।
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्त्यासर्वमिदं ततम्।।
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभीधियते ।
अथर्ववेद में तंत्र में वर्णित महाशक्ति की धारणा, आराधना के मूल का वर्णन है। शक्त्याचार समन्वित तंत्राचार अथर्ववेद की ही भूमिका है । वैदिक देवमण्डल में कालक्रम से महान परिवर्तन हुआ है । अदिति और वाक् अभिन्न हो जाती हैं और वे सरस्वती के स्वरुप में प्रतिष्ठा लाभ करती हैं । वैदिक सोम केनोपनिषद की हेमवती उमा हो जाती है और वह रणदेवी के रूप में महादेवी का स्वरुप धारण करती है ।
ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों में अम्बिका, इन्द्राणी, रूद्राणी, शर्वाणी, भवानी, कात्यायनी, कन्याकुमारी, उमा, हैमवती आदि का उल्लेख मिलता है । किन्तु स्वातंत्र्य एवं गौरव की दृष्टि से मातृ प्रधान शक्ति अदिति ही है । ऋग्वेद में अदिति का अस्सी बार उल्लेख प्राप्त होता है ।
अखण्ड, बन्धनरहित, सर्वव्यापिनी द्यौरन्तरिक्षरूपा जननात्मिका आद्याशक्ति का का चिन्मय ज्योति के रूप में निर्देश मिलता है –
अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्ष मदितिर्माता सा पिता सा पुत्रः ।
विश्वेदेवा अदिति पञ्च जाना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम ।।
-ऋग्वेद 1/89/10
ऋग्वेद में अदिति, विशेषरूप से, सार्वभौम सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित हुई है। अथर्ववेद में अदिति पुत्रकामना से ब्रह्मौदन पकाती हुई चित्रित की गयी है। अथर्ववेद के एक अन्य स्थान पर प्रजापति भी ब्रह्मप्राप्ति के लिये ओदन पकाते हुए दिखाये गये हैं।
विद्वानों के अनुसार अथर्ववेद से स्पष्ट रूप से प्रभावित ब्राह्मण-ग्रन्थों में अदिति पुत्रकामना से साध्य देवों से बचे हुए ब्रह्मौदन को खाने से गर्भ धारण करती है तथा उससे मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान् आदि देव जन्म लेते हैं। एक अन्य ब्राह्मण-ग्रन्थ में प्रजा-कामना से पकाये गये उच्छिष्ट ओदन का भक्षण करने से उसके गर्भ से आदित्यों के जन्म लेने का उल्लेख मिलता है।

पौराणिक आख्यान के अनुसार ब्रह्मा के छः मानस पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र मरीचि की पत्नी कर्दम ऋषि की पुत्री कला से कश्यप और पूर्णिमा नाम के दो पुत्र हुए। दूसरी और मनु की तीसरी पुत्री प्रसूति का ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति से विवाह हुआ। इनकी सोलह कन्यायें थीं। इनमें से दक्ष ने तेरह धर्म, एक अग्नि, एक पितरों और एक शंकर को प्रदान की। दक्ष प्रजापति की दूसरी पत्नी असिक्मनी के गर्भ से साठ कन्यायें उत्पन्न हुईं। दक्ष प्रजापति ने उनमें से तेरह कन्याओं का विवाह कश्यप, सताईस का चन्द्रमा, दस का धर्म, भूत, अङ्गिरा और कृशाश्व के साथ दो-दो पुत्रियों का तथा शेष चार का विवाह तार्क्ष्य नामक कश्यप के साथ किया। पौराणिक मान्यता के अनुसार कश्यप के साथ दक्ष प्रजापति की निम्न तेरह कन्याओं का विवाह हुआ- अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि। इनसे ही समस्त प्राणि-समुदाय आविर्भूत हुआ है। भागवत पुराण के अनुसार अदिति से बारह पुत्र उत्पन्न हुए, जो द्वादशादित्य नाम से जाने जाते है- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम। लेकिन महाभारत आदिपर्व के अनुसार अदिति के तैंतीस पुत्र हुए, उनमें से बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र तथा आठ वसु हैं। भागवत पुराण में परिगणित द्वादशादित्य के कुछ नाम भी महाभारत से मेल नहीं खाते हैं। भागवत के विधाता, इन्द्र और त्रिविक्रम के स्थान पर महाभारत में अंश, शक्र और विष्णु नामों का परिगणन किया है। इनमें से इन्द्र और त्रिविक्रम के पर्यायवाची क्रमशः शक्र और विष्णु हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार अदिति से उत्पन्न होने वाले पुत्र दो-दो के युगलों में हुए, जैसे-धाता और अर्यमा, इन्द्र और विवस्वान्, अंश और भग। सम्भवतः, भागवत पुराण में भग का युग्म विधाता के साथ बनाया है।
अदिति के सम्बन्ध में पुरानों में वर्णित सन्दर्भों में दक्ष प्रजापति, कश्यप, अदिति, आदित्य आदि का नाम शामिल होने से वैदिक रूप के साथ इनका पर्याप्त साम्य दृष्टिगोचर होता है, परन्तु सत्य इसके विपरीत है । ऋग्वेद के अनुसार दक्ष अदिति के पिता भी हैं और पुत्र भी। एक सूक्त की ऋषिका अपने को अदिति दाक्षायणी बतलाती है। इसी सूक्त के एक अन्य मन्त्र में अदिति को दक्ष की दुहिता बताया गया है। ऋग्वेद के एक अन्य स्थल पर असत् (अव्यक्त) और सत् (व्यक्त) को परमव्योम (आकाश) में स्थित बताते हुए दक्ष का जन्म अदिति की गोद से होने का उल्लेख है। एक दूसरे स्थान पर यह कहा गया है कि अदिति और दक्ष के जन्म (उदय) के समय उनसे मित्रावरुण नामक राजा प्रकट होते हैं। ऋग्वेद के विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि अदिति और दक्ष एक-दूसरे जनक हैं। ऋग्वेद 10-72 के अनुसार उत्तानपाद नामक राजा से भू जन्म लेती है, उस भू से आशायें उत्पन्न होती हैं, उसके बाद दक्ष से अदिति और अदिति से दक्ष का जन्म होता है। यह इतरेतर विरुद्ध जन्म सम्भव प्रतीत नहीं होता है। इससे स्पष्ट है कि यह मानवी इतिहास नहीं है, परन्तु बाद में इन्ही वैदिक शब्दों के आधार पर मानवों ने अपने संतानों के नाम रख लिए । जिससे लोगों में विभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई । यास्क इसको स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि ये समानजन्मा हैं अर्थात् एक-दूसरे के तत्काल पश्चात् जन्म लेने वाले देवता हैं। एक अन्य स्थान पर देवता-स्वरूप विषयक विवेचन करते हुए आचार्य यास्क कहते हैं कि मनुष्यधर्म से देवताधर्म विपरीत होता है, देवता ऐश्वर्यशाली होते हैं, जबकि मनुष्य ऐश्वर्य से रहित। मनुष्यों में पिता से पुत्र उत्पन्न होता है और किसी भी अवस्था में पुत्र अपने पिता का जनक नहीं हो सकता। जबकि वेद में पुत्र भी अपने पिता का जनक हो सकता है।
निरुक्त के अनुसार प्रस्तुत प्रकरण में अवश्याय रसप्रदान करने के कारण अदिति मध्यस्थानी देवता है तथा दक्ष का अर्थ आदित्य है। प्रातःकाल की सन्धिवेला में अवश्याय रसप्रदान करने के कारण अदिति पहले से विद्यमान है। इसलिये अदिति माता है और दक्ष पुत्र है। सायंकाल की सन्धिवेला का जनक दक्ष है, अतः, उस समय दक्ष पिता और अदिति पुत्री है। इस व्यवस्था के मूल में निहित सिद्धान्त की स्थापना करते हुए आचार्य यास्क कहते हैं कि ये कर्मजन्मा हैं अर्थात् जिस क्षण कर्म आरम्भ होता है, वह उस देवता का जन्मकाल है। कहने का आशय यह है कि कर्म का प्रारम्भ ही जन्म है।
ब्राह्मण-ग्रन्थ दक्ष को पिता प्रजापति के रूप में चित्रित करते हैं। शतपथ-ब्राह्मण सूर्य को प्रजापति बतलाता है। ऋग्वेद द्युलोक को पिता तथा पृथ्वी का माता के रूप में उल्लेख करता है और कहता है कि पिता प्रजापति ने दुहिता के गर्भ स्थापित किया। वस्तुतः, आदित्यरूप पिता प्रजापति दक्ष है तथा महनीय अखण्ड पृथिवी माता अदिति है। निघण्टु में पृथ्वी वाचक नामपदों में अदिति परिगणित है। इसके अतिरिक्त मन्त्र में पृथ्वी को दुहिता कहा है तथा दूसरी ओर ऋग्वेद का ऋषि अदिति को दक्ष की दुहिता बतलाता है। यास्काचार्य के अनुसार दुहिता का निर्वचन है- ‘दूरे हिता’ अर्थात – जिसका दूर रहने में हित है या जो दूर स्थित है। इस प्रकार पृथिवी दूर स्थित तथा सूर्य का अंश होने से दक्ष की पुत्री है। वह सूर्य ही वृष्टि के माध्यम से पृथ्वी से औषधि आदि रूप वनस्पतियों को जन्म देता है। अतः, ऋग्वेद में पिता प्रजापति को दुहिता के गर्भ स्थापित करने वाले के रूप में चित्रित किया है।

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