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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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ambedसामाजिक समरसता के अभाव में समता का या तो निर्माण ही नहीं होगा और यदि जैसे-तैसे निर्माण हुआ भी तो वह अधिक समय तक टिकेगी नहीं। दलित बन्धुओं का नेतृत्व करने वाले डा. बाबा साहब अम्बेडकर के विचार इस संदर्भ में माननीय हैं। वे कहते हैं, ” मेरा सामाजिक तत्व ज्ञान निश्चित रूप से तीन शब्दों में प्रस्तुत किया जा सकता है- स्वतंत्रता, समता तथा बंधु भाव। फिर भी ऐसा किसी को भी नहीं समझना चाहिए कि यह तत्व ज्ञान की जड़ें राज्यशासन में नहीं, धर्म में हैं। मेरा गुरु बुद्ध है। उनकी शिक्षा से यह सिद्धांत मैंने निकाले हैं। मेरे तत्व ज्ञान में स्वतंत्रता तथा समता का स्थान है, किन्तु अपरिमित स्वतंत्रता से समता का विनाश होता है और विशुद्ध समता में स्वतांत्र्य के लिए गुंजाइश नहीं होती। मेरे तत्व ज्ञान में स्वतांत्र्य और समता का उल्लंघन न हो इसलिए केवल संरक्षण के नाते विधि को स्थान है। किन्तु मुझे ऐसा नहीं लगता कि स्वतंत्रता और समता के विषय में होने वाले उल्लंघनों के विरूद्ध विधि गारंटी दे सकती है। मेरे तत्व ज्ञान में बंधुता को बहुत उच्च स्थान है। स्वतंत्रता और समता के उल्लंघनों के विरुद्ध संरक्षण केवल बंधुभावना से ही हो सकता है। इसी का दूसरा नाम मानवता है।”

डा. अम्बेडकर स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ”पिछड़े और दलित वर्ग को वर्ग संघर्ष या वर्ग युद्ध का निर्माण करने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिए।” विचारों की समग्रता के कारण ही डॉ. अम्बेडकर के लिए यह कह सकना संभव हुआ कि ”इस विचार पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि यह देश जातियों तथा वर्गों में विभाजित है और यह तब तक एक और स्वयं शासित समुदाय नहीं बन सकता, जब तक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की संविधान में समुचित व्यवस्था नहीं की जाती। लेकिन अल्पसंख्यकों का यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यद्यपि आज हम वर्गों और जातियों में विभाजित हैं, परन्तु हमारा आदर्श और लक्ष्य एकताबद्ध भारत है। अल्पसंख्यकों द्वारा इच्छा या अनिच्छापूर्वक की गई किसी भी मंशा पर, जो राष्ट्र की एकता को तोड़ती है, इस आदर्श की बलि नहीं दी जा सकती।” सम्पूर्ण राष्ट्र ने बाबा साहब अम्बेडकर को ‘आधुनिक भारत का मनु’ कह कर गौरावान्वित किया। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। ध्येय समर्पित जीवन होने के कारण इस गौरव को उन्होंने अतीत निर्लिप्त भाव से स्वीकार किया। संविधान के निर्माण में भी उन्होंने ध्येय के लिए अनुकूल व्यवस्था की। यदि यह संभव न होता तो केवल ”आधुनिक मनु” के रूप में गौरवान्वित होने में उन्हें कभी संतोष न होता।

स्वनिर्मित संविधान के प्रति उनमें दिखावटी प्रेम नहीं था। संविधान में जो कमियां रह गई थी, वे उन्हें भलि-भांति जानते थे। उनकी सूक्ष्म दृष्टि का एक उदाहरण देखिए, ”छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ पचास को हम एक अन्तर्विरोधों से मुक्त जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हम समानता की दुहाई देंगे किन्तु हमारे सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में असमानता विद्यामान होगी। राजनीति में हम एक मनुष्य का एक मत और एक मत का एक ही मूल्य वाले सिध्दांत को स्वीकार करेंगेतो दूसरी ओर हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में इसी सिद्धांत को धज्जियां उड़ाते रहेंगे। अन्तर्विरोधों से भरपूर इस प्रकार का जीवन हम कब तक जीते रहेंगे। अपने सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में समानता को अपनाने से हम कब तक इंकार करते रहेंगे? यदि अधिक समय तक हम समानता को स्थापित करने का विरोध करते रहें तो अपने जनतंत्र को ही संकट में डाल देंगे। इसलिए इन अन्तर्विरोधों को हमें अविलम्ब दूर करना होगा अन्यथा इस संविधान निर्मात्री समिति के द्वारा परिश्रम पूर्वक निर्मित इस जनतंत्र के ढ़ांचे को विषमता से पीड़ित लोग विध्वंस कर डालेंगे।”

बाबा साहब कहते थे, ”प्रत्येक मनुष्य को मन, वचन और कर्म से शुद्ध होना होगा। हमने धर्म के लिए सत्याग्रह किया। धर्मांतरण करने का प्रस्ताव पारित किया। हम सब कुछ कर चुके। अब हमें अपने मन को पवित्र करना होगा। सद्गुण प्राप्ति का प्रयास करना होगा। अर्थात हमें अब धार्मिक बनना होगा। केवल शिक्षित होना ही सब कुछ नहीं है। शील अर्थात सचरित्रता धर्म का अविभाज्य अंग है। धर्म दुराचरण को नियंत्रित करता है। आप लोगों को समझ में आ सके, इसके लिए मैं बैलगाड़ी का उदाहरण देता हूं। बैलगाड़ी में दो पहिए, दौ बैल तथा एक उसे हांकने वाला होता है। गाड़ी के पहियों में समय-समय पर तेल देना पड़ता है,जिससे गाड़ी आसानी से चलती रहे। बैलगाड़ी की धुरी के समान व्यक्ति के जीवन-रथ की धुरी का काम करता है- ‘धर्म’। ‘धर्म’ के बन्धन के बिना कोई भी कार्य स्थायित्व प्राप्त नहीं कर सकता। बाबा साहब भौतिक-आर्थिक उन्नति का महत्व भी जानते थे। वे यह जानते थे कि मनुष्य को धर्म तथा अर्थ, दोनों की आवश्यकता होती है। लेकिन वे इस बात भी जोर देते थे कि केवल अर्थ अर्थात समृध्दि अनर्थ का कारण बनेगी। धर्माधिष्ठित अर्थोपार्जन ही श्रेयस्कर है। धर्म की सबसे अधिक आवश्यकता पद दलितों को है। संसार में धर्म की आवश्यकता का अनुभव समाज के निम्नश्रेणी के लोगों को ही हुआ। रोमन, इटालियन साम्राज्य में इसाई धर्म को सर्वप्रथम गरीबों ने ही अपनाया।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि बाबा साहब अम्बेडकर के समस्त विचारों का अधिष्ठान धर्म था। वे सद्धर्म चाहते थे, अधर्म नहीं। बाबा साहब अम्बेडकर का प्रेरणास्रोत विदेशी नहीं, विशुद्ध भारतीय था।

– राजीव मिश्र

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1 Comment on "अम्बेडकर के समस्त विचारों का अधिष्ठान धर्म था"

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DP Singh
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मनु डिवाइडेड सोसाइटी एंड क्रिएटेड आल प्रोब्लेम्स व्हिच बाबा साहेब ट्राइड तो रिमूव, सो कोम्परिंग बाबा साहेब विथ मनु इस रियली foolish

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