लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

संदर्भ – कांग्रेस से राकांपा की नाराजगी ।

कांग्रेस बनाम राष्टीय कांग्रेस पार्टी के शरद पवार की रहस्यमय नूरा कुश्ती का अखिरकार सुखद अंत हो गया। इस संघर्ष का यही फलित निकलना संभावित था। क्योंकि शरद पवार और उनके दल का विरोध व बहिष्कार किसी जनहित के मुददे को लेकर न होकर, अपने दल और मातहतों के निजी हित साधना था, जि समें वे सफल रहे।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार में घटक दल की नाराजी मनचाही मुरादों की उपलबिध बनती रही है। लिहाजा दलों के मुखियाओं ने संप्रग की लाचारी का फायदा उठाकर नैतिक कम अनैतिक हित साधने में ज्यादा दबाव बनाया। ममता बनर्जी को अपवाद स्वरुप छोड़ भी दें तो करुणानिधि शरद पवार, लालू यादव और अजीत सिंह ने गठबंधन के भीतर रहकर व्यकितगत लाभ-हानि के समीकरण साधे तो दूसरी तरफ बाहर से गठबंधन में टेका लगा रहे मुलायम सिंह और मायावती ने भी अनैतिक लक्ष्यों की मकसद पूर्ति के लिए दमखम दिखाया। हालांकि प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने राकांपा से सुलह के बाद बेबाकी से स्वीकारा भी कि गठबंधन की राजनीति में लेन-देन चलता रहता है। लेकिन परस्पर हित साधक बने इन राजहठों ने जनता को जरुर यह संदेश दे दिया है कि गठबंधन की राजनीति गरीब व वंचितों की राजनीति नहीं रह गर्इ है ?

सप्रंग गठबंधन और राकांपा के बीच चली रार का अंत इस बहाने खत्म हो गया कि संप्रग में बेहतर समन्वय बनाने के लिए एक तंत्र तैयार किया जाएगा। जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी होंगी। यह बहाना इसलिए शगूफेबाजी है, क्योंकि वैसे भी अब तक कांग्रेस और संप्रग की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी ही हैं, लिहाजा एक नर्इ समिति को सोनिया की ही अध्यक्षता में वजूद में लाने की क्या जरुरत ? दरअसल प्रत्यक्ष रुप से यह बहाना इसलिए सामने लाया गया, जिससे सहयोगी घटक दलों की अनैतिक मांगों पर मर्यादा का झीना पर्दा डला रहे। हकीकत में तो यह नाराजी महाराष्ट के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण द्वारा सिंचार्इ विभाग के कामकाज पर श्वेतपत्र लाने के फैसले के विरोध में थी। वह भी इसलिए क्योंकि एक समय यहीं सिंचार्इ महकमा शरद पवार के चहेते भतीजे अजित पवार के पास था। जाहिर है श्वेतपत्र के मार्फत सिंचार्इ परियोजनाओं में धांधलियों की जो सडांध बाहर आती, उससे अजीत का हाजमा तो बिगड़ता ही शरद और राकांपा भी दलदल में हाथ-पैर मारते नजर आते।

रहस्यों से पर्दा उठाते हुए यह जानकारी भी सामने आर्इ है कि महाराष्ट की गठबंधन सरकार में शामिल राकांपा के जिन मंत्रियों की गड़बडि़यों की गोपनीय चरित्रावली तैयार की जा रही थी, उनमें राकांपा के ताकतवर नेता तथा लोक निर्माण मंत्री छगन भुजबल का भी नाम दर्ज किया जा रहा था। अपने कुटुमिबयों और चहेते मंत्रियों पर भ्रष्टाचार की गाज न गिरे इस गरज से शरद पवार नाराजी की कुटिल चाल चल रहे थे। वैसे भी बीते आठ साल से शरद पवार ने जनहितों से जुड़े मुददों की राजनीति कतर्इ नहीं की। केंद्र में कृषि मंत्री होने के बावजूद उन्होंने कभी किसान और किसानी की चिंता नहीं की। बढ़ती मंहगार्इ को लेकर उनके चेहरे पर कभी शिकन दिखार्इ नहीं दी। विदर्भ में आत्महत्या कर रहे किसानों की बजाय उनकी चिंता में सड़े अनाज से शराब बनाने वाले माफिया और चीनी उत्पादक शामिल रहे। ऐसे हालातों में गठबंधन राजनीति की विवशता बनाम सौदेबाजी अनैतिकता की ही मिसाल मानी जाएगी। क्योंकि जहां राकांपा को कांग्रेस की जरुरत है वहीं कांग्रेस को भी राकांपा की महाराष्ट व केंद्र में जरुरत है। बहरहाल यदि अजीत पवार और छगन भुजबल की अनैतिकताओं का लेखा-जोखा तैयार करने का दमखम मुख्यमंत्री चव्हाण दिखा रहे थे तो उनकी इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को गठबंधन में लेन-देन के चल रहे खेल से बाधित करने की जरुरत नहीं थी ?

यदि राकांपा की यह सौदेबाजी मंहगार्इ को नियंत्रित करने, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने अथवा बिगड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने को लेकर होती, तो इसे राष्टीय चिंता का सबब माना जाता। लेकिन परत दर परत राज खुलने के बाद जाहिर हो गया कि यह नाराजी महज कदाचरणों पर पर्दा डालने की गरज से राजनीतिक सौदेबाजी के निहितार्थों की मकसद पूर्ति के लिए है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि एक ओर तो घटक दल स्वाहितों को पलीता लगा रहे हैं दूसरी तरफ सत्ता में बने रहने का लालच प्रधानमंत्री को नाजायज शर्ते मानने को बाध्य कर रहा है। इन तात्कालिक हित पूर्तियों की कीमत अंत में देश को ही चुकानी पडे़गी, माननीय प्रधानमंत्री जी ?

सौदेबाजी के ऐसे ही अनैतिक समीकरणों को गठबंधन में रहकर भुनाने का काम करुणानिधि और लालू यादव ने किया। ऐसे ही अनैतिक मकसद को अंजाम देने की दृषिट से मुलायम और मायावती संप्रग गठबंधन को बाहर से समर्थन दे रहे हैं। दरअसल सीबीआर्इ केंद्रीय गृह मंत्रालय के मातहत है और उसकी चाबी केंद्र के पास है। लिहाजा चाबी के उमेठते ही माया और मुलायम की अनुपातहीन संपतित पर चल रही सीबीआर्इ जांच ढीली अथवा कड़ी हो जाती है। नतीजतन ऐसे ही टोटकों के चलते कांग्रेस की सत्ता में बने रहने की मंशा आठ साल से पूरी होती चली आ रही है। यदि मनमोहन सिंह राष्टीय स्वाभिमान के प्रतीक होते तो वे कबका वीपीसिंह, चंद्रशेखर, एचडी देव गौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल की तरह गठबंधन की अनैतिक कलह से मुकित के लिए इस्तीफा दे चुके होते ?

सप्रंग के घटक दलों में एकमात्र तृणमूल कांग्रेस जरुर ऐसा सहयोगी दल है जो जनहित के मुददे साधने के लिए गठबंधन सरकार पर नैतिक दबाव बनाता रहा है। यही कारण है कि ममता बनर्जी रेल का किराया बढ़ाये जाने पर अपने ही दल के रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी की बलि ले लेती हैं।ममता के हठ के चलते ही अब तक खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश को केंद्र इजाजत नहीं दे पाया। इधर पशिचम बंगाल में होने जा रहे पंचायत चुनाव में ममता ने अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है तो इसकी पृष्ठभूमि में भी वह नैतिक मांग है, जिसके तहत वे कर्ज पर ब्याज भुगतान में तीन साल की छूट चाहती हैं। दरअसल राज्य के आर्थिक हालातों की विंडबना यह है कि उसे अपने आय के समस्त स्त्रोंतो से आमदनी तो महज 22 हजार करोड़ की होती है, जबकि उसे केंद्र से लिए धन के ब्याज पर चुकाने 25 हजार करोड़ रुपये पड़ते है। अब यदि ऐसे हितों की पूर्ति के लिए केंद्र की गठबंधन सरकार लेन-देन की सौदेबाजी करती है तो यह सौदा न तो व्यकितगत हित साधन के दायरे में आता है और न ही इससे देशहित को पलीता लगता है। यह लेन-देन पारदर्शी होने के साथ जन आंकाक्षाओं की पूर्ति करने वाला है, लिहाजा ऐसी नाराजियों को एक बार जायज ठहराया जा सकता है लेकिन पवार की नाराजी को कतर्इ जायज नहीं कहा जा सकता है।

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