लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

महबूबा मुफ्ती भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाएगीं या नहीं? यह प्रश्न सभी पूछ रहे हैं। कोई यह नहीं पूछ रहा है कि भाजपा पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाएगी या नहीं? याने भाजपा अधर में लटकी हुई है। पीडीपी के पास तो विकल्प है लेकिन भाजपा विकल्पहीन है। पीडीपी चाहे तो आज भी नेशनल कांफ्रेस और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना सकती है लेकिन भाजपा के साथ कोई भी खुशी-खुशी मिलने को तैयार नहीं है। भाजपा के साथ जो भी हाथ मिलाएगा, वह कश्मीर में मारा जाएगा। उसका सूंपड़ा साफ हो जाएगा। अकेले जम्मू के हिंदू वोटों के आधार पर जम्मू-कश्मीर में कोई भी सरकार नहीं खड़ी की जा सकती। इस दुविधा के रहते हुए भी मुफ्ती मुहम्मद सईद ने भाजपा के साथ हाथ मिलाया और दस महिने तक सरकार चलाकर दिखा दी।

लेकिन महबूबा को ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने तत्काल मुख्यमंत्री की शपथ नहीं ली और पिछले 25 दिन से भाजपा को अधर में लटका रखा है? असल बात तो यह है कि उनके दिल में खुद ही अधर में लटकने का डर पैदा हो गया। मुफ्ती साहब की अंत्येष्टि में उनके गांव के लोग ही जमकर शामिल नहीं हुए, यह सबसे बड़ी खतरे की घंटी है, जो महबूबा के कानों में चैबीसों घंटे बजती रहती है। भाजपा को साथ लेकर वे यदि अगले पांच साल तक कुर्सी में टिकी रहती हैं तो उन्हें डर है कि उनके पांच विधायक भी चुनकर नहीं आएंगे,क्योंकि पीडीपी और भाजपा, जैसा कि मुफ्ती कहते थे, उत्तर और दक्षिण ध्रुव हैं। यह कैसे हो सकता है कि भाजपा धारा 370, कश्मीरी झंडे, हुर्रियत से सीधी बातचीत, अफ्सा-कानून, भारत-पाक वार्ता में कश्मीरी भागीदारी, फौज द्वारा इस्तेमाल की जा रही जमीन की वापसी आदि मुद्दों पर पीडीपी की राय मान ले? यदि इन सब मुद्दों पर भाजपा कोई स्पष्ट लिखित या मौखिक आश्वासन दे देगी तो सारे भारत में उसकी प्रतिष्ठा पैंदे में बैठ जाएगी।

इसका मतलब यह नहीं कि दोनों पार्टियां मिलकर सरकार चला ही नहीं सकतीं। दोनों पार्टियों के पास दोनों के मिलने से बढि़या कोई विकल्प नहीं है। यदि आज देश में कोई बड़ा नेता होता तो कमीर की इन चारों पार्टियों से कहता कि आप चारों मिलकर संयुक्त सरकार क्यों नहीं बनाते? वह संयुक्त सरकार पहले सर्वसम्मत कार्यक्रम तैयार करती, फिर केंद्र की सहमति लेती और छह साल में कश्मीर का इतिहास बदल देती। अभी पीडीपी की चिंताओं का निराकरण भी केंद्र सरकार चाहे तो बखूबी कर सकती है। यदि जम्मू-कश्मीर विधानसभा आज भंग हो जाए और चुनाव हो जाएं तो पीडीपी और भाजपा, दोनों का ही कबाड़ा हो सकता है। सरकार नहीं बनाकर मरने से कहीं अच्छा है, सरकार बनाकर मरना! उसमें से शायद जीने का कोई रास्ता भी निकल आए।

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