लेखक परिचय

गोपाल बघेल 'मधु'

गोपाल बघेल 'मधु'

President Akhil Vishva Hindi Samiti​ टोरोंटो. ओंटारियो, कनाडा

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-गोपाल बघेल ‘मधु’-

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(मधुगीति १५०६२१)

रहते हुए भी हो कहाँ, तुम जहान में दिखते कहाँ;
देही यहाँ बातें यहाँ, पर सूक्ष्म मन रहते वहाँ ।

आधार इस संसार के, उद्धार करना जानते;
बस यों ही आ के टहलते, जीवों से नाता जोड़ते ।
सब मुस्करा कर चल रहे, स्मित-मना चित तक रहे;
जाने कहाँ तुम को रहे, तव तरंगों में बह रहे ।

आते हो तुम जाते हो तुम, बिन प्रयोजन लगते मगन;
लगते सभी तुमरे सुजन, साजन बने रहते नयन ।
आत्मा सभी हैं तुम्हारी, आत्मीय तुम प्रिय प्रभारी;
जाएँ कहाँ छोड़ें कहाँ, यह जगत बिन तुमरे कहाँ ।

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1 Comment on "रहते हुए भी हो कहां"

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डॉ. मधुसूदन
Guest

मण्डलाकार हिण्डोल को
गतिमान क्यों कर, कर रहे।
क्यों सितारों चाँद में,
जगमगाहट भी भर रहे?
————————-
रहते हुए भी हो कहाँ, तुम जहान में दिखते कहाँ;
देही यहाँ बातें यहाँ, पर सूक्ष्म मन रहते वहाँ ।
———————————————-

गोपाल जी सुन्दर कविता कहीं अंतरिक्ष में उछाल देती है।
मधुसूदन

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