लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना

वर्ष 2003 में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह के साथ रहकर उन्हें सत्ता की सीयिं च़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और उनसे दूर होने के बाद उनको नेस्तानाबूत कर देने की कसम खाने वाले पूर्व दिग्गज सपा नेता(अब लोकमंच के संयोजक) अमर सिंह आज स्वयः उस मुकाम पर पहंुच गए हैं जहां वह अपने पूर्व समाजवादी दोस्त को देखना चाहते थे।वह लगातार चारों तरफ से घिरते जा रहे हैं। हकीकत सामने आने के बाद दोस्तों ने उनसे दूरी बना ली है तो अदालत का शिकंजा कसता जा रहा है।किडनी की बीमारी। फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन से संबंध बिगड़ना। कथित सीडी मामले में प्रसिद्ध अधिवक्ता और जन लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग समिति के सदस्य शांति भूषण और प्रशांत भूषण पर बेवजह आरोप। 11 मई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पांच साल से उनकी विवादित सीडी पर लगी रोक को हटाना।पहले कांगे्रस पर सीडी के दुरूपयोग का आरोप। और उसके बाद इस बात से मुकरने पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार। प्रशांत भूषण का अमर के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज करना। मुलायम को सपा का ‘डान’ बताना। यह ऐसे मुद्दे हैं जिन्होने अमर सिंह का दिन का चैन और रात की नींद हराम कर रखी है। रही सही कसर विवादित सीडी के प्रसारण में उनका किसी बिपाशा नाम की युवती (जिसे फिल्म अभिनेत्री समझा जा रहा है)से ओछी हरकत में बातचीत करने ने पूरी कर दी, तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 20 मई 11 को एक अहम फैसले में प्रवर्तन निदेशालय को राज्यसभा सदस्य अमर सिंह के खिलाफ लगे धन शोधन के आरोपों की जांच करने का आदेश देकर उनको कहीं का नहीं छोड़ा। उच्च न्यायालय ने यह आदेश समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह की एक याचिका को खारिज करते हुए दिया। इस याचिका में अमर ने दो साल पहले अपने खिलाफ कानपुर में दर्ज कराई गई एक प्राथमिकी को चुनौती दी थी। प्राथमिकी में उन पर आरोप लगाया गया था कि जब उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार थी तब वह कथित तौर पर कई वित्तीय अनियमितताओं में लिप्त थे। न्यायमूर्ति इम्तियाज मुर्तजा और न्यायमूर्ति एसएस तिवारी की पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय को जांच का आदेश तो दिया ही, जांच शुरू होने के एक माह के भीतर एक स्थिति रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया।स्थिति रिपोर्ट पेश होने के बाद अमर सिंह के बुरे नक्षत्र अपना असर दिखा सकते हैं। अमर सिंह की गिरफ्तारी पर रोक की याचिका भी इलाहाबाद हाइकोर्ट से खारिज हो चुकी थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय को जो जांच के आदेश दिए हैं, वह मामला कानपुर से जुड़ा है। अमर सिंह के खिलाफ कानपुर स्थित बाबूपुरवा पुलिस थाने में 15 अक्तूबर 2009 को एक स्थानीय निवासी शिवकांत त्रिपाठी ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम और धन शोधन अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इसी प्राथमिकी को सिंह ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। त्रिपाठी ने भी अदालत से संपर्क किया था और अनुरोध किया था कि मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय से कराई जाए। सिंह और त्रिपाठी की याचिकाओं को नत्थी कर दिया गया और पीठ ने सुनवाई की। इसके बाद 28 मार्च को पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। पूर्व सपा नेता अमर सिंह की ओर से दलील देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने अमर के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को ॔जालसाजी और दुर्भावना से की गई कार्रवाई॔ करार देते हुए कहा कि इसकी वजह केवल राजनीतिक शत्रुता थी। उन्होंने कहा कि इसलिए यह प्राथमिकी खारिज करने लायक है।इस पर अदालत ने कहा कि दस्तावेजों में ऐसा कुछ भी नहीं है कि कार्रवाई को दुर्भावनावश और राजनीतिक शत्रुता के आधार पर खारिज कर दिया जाए। अदालत ने याचिकाकर्ता की ओर से अमर पर लगाए गए आरोपों को गंभीरता से लिया। याचिका में कहा गया था कि जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी तब सिंह उप्र विकास परिषद के अध्यक्ष थे। यह पद कैबिनेट मंत्री के समकक्ष होता है। त्रिपाठी ने आरोप लगाया था कि इस पद पर रहते हुए सिंह ने कई कागजी कंपनियां खड़ी कीं और धन शोधन में लिप्त रहे। पीठ ने कहा कि धन शोधन वित्तीय प्रणाली के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करता है। यह देश में ऐसी समानान्तर वित्त प्रणाली के तौर पर उभर सकता है जिसका नियंत्रण गिने चुने लोगों के पास होता है। इससे अच्छी खासी अर्थव्यवस्था अस्थिर और ठप हो सकती है। अदालत ने कहा ”हमारी यह दृ़ राय है कि यह अतिविशिष्ट अधिकार के दुरुपयोग का मामला है और स्पेशल सेल से इसकी गहन जांच कराने की जरूरत है।” पीठ ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि जो कंपनियां कथित तौर पर कागजी कंपनियां थीं, वे विभिन्न राज्यों में पंजीकृत थीं। पीठ ने कहा कि एक केंद्रीय एजेंसी होने के नाते प्रवर्तन निदेशालय इस मामले की गहन जांच करने के लिए पूरी तरह उपयुक्त है। अदालत ने कहा ”इसलिए, यह आदेश दिया जाता है कि इस मामले से संबंधित समस्त दस्तावेज दो सप्ताह में प्रवर्तन निदेशालय को सौंप दिए जाएं और दस्तावेज मिलने के तत्काल बाद प्रवर्तन निदेशालय को जांच शुरू कर देना चाहिए। दस्तावेज मिलने के एक माह के भीतर प्रवर्तन निदेशालय पीठ के सामने एक स्थिति पत्र पेश कर दे।”अदालत के आदेशनुसार इस मामले को जुलाई के पहले सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है और तब अधिकारी स्वयं अदालत में पेश हो कर पहला स्थिति पत्र सौंपें।

अमर सिंह के खिलाफ कानपुर के बाबू पुरवा थाने में दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि सपा सरकार के पांच साल के शासन में 16 से 168 कंपनियां बनाकर सपा के पूर्व महासचिव अमर सिंह और उनकी पत्नी पंकजा ने पांच सौ करोड़ का घोटाला किया। इन कंपिनयों में बिग बी अमिताभ बच्चन से लेकर घाटमपुर के किसान तक को निदेशक बनाया था। यही नहीं यूपी, दिल्ली और कोलकाता के दो दर्जन से अधिक ऐसे लोग हैं,जिन्हें मालूम ही नहीं कि वे किसी कंपनी के निदेशक भी हैं। बाबूपुरवा थाने में यह एफआईआर शिवाकांत त्रिपाठी ने अक्टूबर 2009 को दर्ज कराई थी। वर्ष 2003 से 2007 के बीच अमर ने जो कम्पनियां बनाई उनमें एनर्जी डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड, ईडीसीएल पॉवर लिमिटेड, पंकजा आर्ट एंड क्रेडिट लिमिटेड, सर्वोत्तम कैंप लिमिटेड, ईडीसीएल एंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड व ईस्टर्न इंडिया लिमिटेड प्रमुख हैं। बाकी कंपनियां काले धन को सफदे करने के लिए बनाई गई थीं।

याचिकाकर्ता का कहना था कि इन कंपनियों के अलगअलग निदेशक बनाए गये थे । एक कंपनी में अमिताभ बच्चन निदेशक थे। दो में सा़ घाटमपुर के अमौर गांव निवासी देवपाल सिंह राणा और गाजियाबाद निवासी उसका भाई निदेशक था। दिल्ली और कोलकाता के दो दर्जन लोगों के फर्जी हस्ताक्षर से कंपनियों का निदेशक बनाया गया। जब देवपाल सिंह राना से पूछा गया तो उन्होंने कंपनी के बारे में जानकारी से इंकार कर दिया। याचिकाकर्ता का कहना था कि पहले कंपनियां बनाई गईं, फिर इन्हें घाटे में दिखाकर अमर और पंकजा की कंपनियों में विलय कर दिया गया। सर्वोत्तम कैंप लिमिटेड में 25 छोटी कंपनियों का विलय किया गया । अमर सिंह औेर पंकजा सहित कंपनी के निदेशक अमिताभ बच्चन व नोएडा की फ्लैक्स कंपनी के निदेशक अशोक चतुर्वेदी के खिलाफ धोखाधड़ी (420/467/471) 120 बी, भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम 7/8/9/10/13 तथा मनी लांड्रिंग एक्ट 3/4 के तहत क्राइम नंबर 458/2009 पर एफआईआर दर्ज कराई थी।

माया राज के शुरूआती दौर में कानपुर में एफआईआर दर्ज होने पर काफी बवाल भी मचा था।सपा मुखिया मुलायम सिंह ने बसपा सरकार पर राजनीतिक विद्वेष के चलते अमर सिंह और अमिताभ बच्चन को फंसाने का आरोप लगाया। अधिकतर कंपनियां कोलकाता से रजिस्टर्ड हुई थी इसलिए शासन के निर्देश पर विवेचना के लिए मामला वहां स्थानांतरित कर दिया गया । बाबूपुरवा के तत्कालीन इंसपेक्टर दिनेश त्रिपाठी कागजात लेकर कोलकाता गये लेकिन वहां पुलिस ने विवेचना ग्रहण करने से इंकार कर दिया। बाद में विवेचना बाबूपुरवा थाना की पुलिस को ही सौंप दी गई थी। फिर यह मामला आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा को स्थानांतरित कर दिया गया था।

बहरहाल, जो हालात बन गए हैं उससे इतना तो तय ही है कि बीमारी से परेशान अमर सिंह को आने वाले दिनों में एक साथ कई मोर्चो पर लड़ना होगा।विवादित छवि और बडबोले पर के कारण ही उन्हें कोई भी राजनैतिक दल अपने साथ लेने को तैयार नहीं है।लोकमंच के सहारे वह अपनी राजनैतिक हैसियत बनाए रखना चाहते हैं लेकिन मंच को राजनैतिक जमीन ही नहीं मिल पा रही है। पूर्वांचल में वह अपनी ताकत ब़ाना चाहते थे, लेकिन उनसे बेहतर स्थिति में तो ॔पीस पार्टी ’ नजर आती है। छवि खराब होने के बाद उनके उद्योगपति, बॉलीबुड के फिल्मी और राजनैतिक दोस्त सभी किनारा करने लगे हैं।अब वह किसी मंच पर नहीं दिखाई देते हैं। उनसे जब इस संबंध में पूछा जाता है तो वह तबियत खराब होने के कारण ऐसे मंचों से दूर रहने की बात कहते हुए पल्ला झाड़ लेते हैं।चारों तरफ से घिरे अमर आजकल सोनिया गांधी की याद में कसीदे पड़ने में लगे हैं।उनको अपनी राजनैतिक हैसियत बचाए रखने के लिए कांगे्रस के अलावा कोई प्लेटफार्म नजर नही आ रहा है।कांग्र्रेस का साथ मिलने पर अमर की कई परेशानियां कम हो सकती है,यह बात भी वह जानते हैं। पिछले दिनों तो यहां तक चर्चा चली थी कि अमर सिंह अपने लोकमंच का कांगे्रस में विलय करने वाले हैं,लेकिन कुछ कांगे्रसियों के चलते मामला लटक गया।

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