लेखक परिचय

ब्रह्मदीप अलुने

ब्रह्मदीप अलुने

.राजनीति विज्ञान एवं अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध , शा. माधव कला, वाणिज्य एवं विधि महा. उज्जैन

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ambedkar डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते तब तक आपको कानून चाहे जो भी स्वतंत्रता देता है, वह आपके किसी काम की नहीं।बाबा आंबेडकर के ये विचार उस भारत के करोडों लोगों के लिए थे जिन्हें उन्होंने संविधान के जरिये कानूनन  अधिकार तो दिए थे लेकिन सामाजिक अधिकार देना उनके वश में नही था।सामाजिक स्वीकार्यता की लड़ाई इस देश में दलितों के लिए  कुछ इतनी जटिल रही की बाबा अम्बेडकर 6 दिसम्बर 1956 को दुनिया से जब अलविदा कह गये तो वे एक बौद्ध बनकर गये । उन्हें ये एहसास था की हिन्दू समाज ने खंडित हो कर रहना स्वीकार किया है, लेकिन अपनी जटिलताओ को नही छोड़ा इसलिए हिन्दू धर्म का अंग रहकर दलितों का उद्धार नही किया जा सकता।आंबेडकर अब नहीं है ,लेकिन उनकी लड़ाई बदस्तूर जारी है। सामाजिक बदलाव के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले इस महान व्यक्ति को भारत का हर नागरिक जानता है ,क्योकि आंबेडकर की नीतियों से हम सब प्रभावित है ,शायद इसीलिए इस देश की हर राजनीतिक पार्टी के दफ्तर में उनकी तस्वीर लगी होती है, ये बात और है की बदलते दौर में सामाजिक सुधार का हिमायती ये शख्स कई भागों में बंटा  दिखाई पड़ता है ,अब  सबके अपने अपने आंबेडकर है जो  राजनीतिक परिकल्पनाओ को साकार करने के लिए नये नये प्रतीकों में सामने आतें है।

आंबेडकर के सामाजिक न्याय और बंधुत्व स्थापित करने के उद्देश्य से कोसों दूर आज भारतीय समाज में जातीयता का पारम्परिक रूप बदल गया है,भारत के करोडों लोग इस जातीयता से मुक्ति पाना चाहते है, लेकिन लोकतांत्रिक अवसरवादिता में जातीय पहचान को समरसता और अंतिम व्यक्ति के नाम पर राजनीतिक हथियार बना दिया गया है जो घिनौना भी है और आत्मघाती भी।  1930 में भारत में दलित राजनीति की शुरुआत करने वाले आंबेडकर ने ब्रिटिश शासन से दलितों के लिए वैसे ही अलग प्रतिनिधत्व की मांग की जैसा साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए दिया जा रहा था। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमन्त्री रैम्जे मेक्डोनाल्ड ने इसे स्वीकार भी कर  लिया लेकिन भारतीय धरती पर जन्म लेने वाले महापुरुष महात्मा गाँधी इस बात से बेखबर नहीं थे। जेल में बंद गाँधी ने इसके खिलाफ आमरण अनशन करते हुए कहा की दलितों को हिन्दू धर्म से अलग किया जा रहा है,उन्होंने कहा की अछूतों का एक जुदा वर्ग बना देना हिंदू धर्म के माथे पर कलंक है, जात-पात एक बंधन है पाप नहीं, अछूतपन तो पाप है, सख्त जुर्म है और अगर हिंदू धर्म इस बड़े सांप को समय रहते नहीं मार डालेगा तो वह उसको खा जाएगा, अछूतों को अब हिंदू धर्म के बाहर हरगिज न समझना चाहिए। इस देश में गाँधी की स्वीकार्यता इतनी की ये कम्युनल अवार्ड पूना पैक्ट में बदल गया और अब दलितों को अलग प्रतिनिधित्व तो मिला लेकिन सुरक्षित सीट के नाम पर ।आंबेडकर की सोच थी की दलितों के विकास के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़े ,लेकिन पूना पैक्ट के प्रतिनिधित्व के आरक्षण से वे उपयोग का साधन बन गये। बहुत जल्दी आंबेडकर ने इस बात को भांप भी लिया और वे इस निष्कर्ष पर पहुचें की आरक्षण और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था से सामाजिक परिवर्तन नहीं किया जा सकता, लेकिन तब तक कांग्रेस में दलितों का प्रतिनिधित्व तैयार हो चूका था ,अब आंबेडकर के मुकाबले गाँधी का हरिजन सेवक संघ था ।इस प्रकार पूना पैक्ट के बाद से ही दलित वर्गो को राजनीतिक रूप से संगठित करने की शक्ति डॉ आंबेडकर के हाथों से निकल गयी थी। 80  के दशक में एक बार फिर दलित राजनीति का उभार हुआ और उसके नये नायक कांशीराम ने पूना पैक्ट के पचास साल पूर्ण होने पर 24सितम्बर 1982 को अपने राजनीतिक अभियान की शुरुआत करते हुए पूना पैक्ट धिक्कार रैली निकाली जो देश के विभीन्न क्षेत्रों से गुजरती हुई  पूना में जाकर समाप्त हुई। ये बात और है की उन्हीं की पार्टी ने जातीय उन्मूलन को अपना ध्येय बनाने के स्थान पर इसे जातीय उभार का माध्यम बनाया जिससे उन्हें एक बड़े राज्य की सत्ता तो मिल गयी, लेकिन जिस सामन्ती समाज व्यवस्था को उखाड फेकना चाहिए उसके बीज उन्हीं की पार्टी में देखने को मिल गये। बहरहाल आंबेडकर को ये एहसास था की समूचे समाज के उद्धार के लिए दलितों में अलग अलग वर्ग नही होना चाहिए ,लेकिन अपने अपने आंबेडकर के नाम पर दलितों में राजनीतिक अवसरवाद गहरी पैठ बना गया है। आज इस वर्ग में नव धनाड्य वर्ग भी है, राजनीतिक वंशवाद भी है ,सामाजिक समरसता की चाटुकारिता भी है, लेकिन उस मूल भावना का गहरा अभाव है जो वंचितों को आत्मविश्वास दे सकता है ।देश के महत्वपूर्ण लोगो में शुमार और अपने को  दलित आकांक्षाओ के प्रतीक बताने वाले प्रतिनिधियों में आत्मविश्वास की कमी साफ दिखाई पड़ती है ,क्योंकि ये लोग सामाजिक उन्मूलन के लिए नहीं अपने निजी हितों के लिए तन्त्र का हिस्सा बने रहना चाहते है ।आंबेडकर आत्मविश्वास ही तो चाहते थे ,वे कभी सामंत या पूंजीवाद के हाथों का खिलौना नही बने,वे देश के करोड़ों वंचितों को कानूनी अधिकार तो दे गये लेकिन फिर भी आत्मविश्वास के शून्य को कैसे भरे ,जिसे मजबूत करने वाला कोई दलित नेता इस राजनीतिक परिदृश्य में कहीं नहीं है ,और न ही उसके उभरने की  सम्भावना दिखाई पडती है।

आंबेडकर के बौद्ध धर्म धारण में परिवर्तन को भी उनके राष्ट्रवाद का प्रमाण बताया जाता है, ये सच भी है क्योंकि वे स्वयं देश छोड़कर जा भी सकते थे लेकिन उन्होंने कहा हम आदि से अंत तक भारतीय है। आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य में छपे एक लेख में लिखा है, “आंबेडकर ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए जानबूझकर भारत की मिट्टी में पैदा हुआ बौद्ध धर्म स्वीकारणीय माना, इस्लाम और ईसाइयत का अनुगामित्व उन्होंने नहीं किया, कारण भारतीय भाव-विश्व से दगा करना उन्हें सर्वथैव नामंजूर था”।लेकिन वहीं देश के सबसे ख्यातनाम जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर दलितों को राष्ट्रद्रोही कहते है,ये राष्ट्रद्रोह दिल्ली से निकलकर हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के पीएचडी छात्र रोहित वेमुला की  फांसी लगाकर ख़ुदक़ुशी में भी दिखाई पड़ता है ,जो सामाजिक अलगाव से लड़ते लड़ते मर जाता है और अपनी अंतिम पंक्तियों में अपने दर्द को समेटते हुए कहता है -इस क्षण मैं आहत नहीं हूं, मैं दुखी नहीं हूं, मैं बस ख़ाली हूं, मुझे अपनी भी चिंता नहीं है, ये दयनीय है और यही कारण है कि मैं ऐसा कर रहा हूं।

सदियों से सामाजिक बदलाव की बांट जो रहा दलित आंबेडकर के कानूनी मान्यता वाले देश में बार बार सामाजिक मान्यता के लिए संघर्ष करने को मजबूर है ।गुजरात के उना में जब उसे  पीटा जाता है तो एक बार फिर एक नये राजनीतिक आन्दोलन की शुरुआत पदयात्रा से होती है, दलित अस्मिता के पदयात्री अहमदाबाद से उना जाकर 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाते हुए कहते है की अब हम आज़ाद हो गये। बाबा आंबेडकर ने तो बहुत पहले ही कहा था की हमारे पास यह आज़ादी इसलिए है ताकि हम उन चीजो को सुधार सके जो सामाजिक व्यवस्था, असमानता, भेद-भाव और अन्य चीजों से भरी है जो हमारे मौलिक अधिकारों के विरोधी हैं।इस देश में आंबेडकर  सबके साथ है ,लेकिन सबके अपने अलग अलग।आंबेडकर स्वाभिमान चाहते है जबकि उनके नाम का उपयोग करने वाले राजनीतिक सत्ता ।भारत में राजनीतिक सत्ता यहाँ के समाज को नहीं बदल सकती है ये बात अब भी देश का वंचित वर्ग समझने में नाकामयाब रहा है ,और कम से कम उस राजनीतिक लोकतंत्र से तो नही जिसे सामन्तवाद और पूंजीवाद संचालित करता है।/बाबा आंबेडकर ने इसीलिए अक्टुम्बर 1955  में शेड्यूलड कास्ट सम्मेलन में अनुसूचित जातियों के लिए सुरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग की थी ,लेकिन अब ये सुरक्षित सींटे सभी की राजनीतिक आवश्यकता बन गयी है ।

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