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डॉ. अनुराग दीप

 

संविधान को लोकतंत्र की गीता कहा जाता है। भारत के संविधान के निर्माण में कई विधि विशेषज्ञों ने योगदान दिया जिसमें सर्वप्रमुख थे बाबा साहब अंबेडकर। उनके नेतृत्व में भारत के संविधान का निर्माण एक अतुलनीय उपलब्धि था जिस कारण उन्हें संविधानशिल्पी भी कहा जाता है। वह संविधान निर्माण की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने देश के संविधान के मसौदे में संविधान की प्रकृति को अत्यंत महत्वपपूर्ण स्थान दिया। संविधान की प्रकृति इस मामले में महत्वपूर्ण है कि यह केंद्र व राज्य के बीच संबंधों को तय करती है।

 

वर्तमान में इस बात का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि गठबंधन राजनीति ने ऐसे समीकरणों को जन्म दिया है जो अंबेडकर व संविधान की भावना के विरूद्ध है। छोटे-छोटे दलों की मजबूत उपस्थिति का प्रभाव केवल चुनाव, नीति निर्माण और कानून तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे सरकार के गठन में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। लोकतंत्र में यह अच्छा प्रतीत होता है, क्योंकि गठबंधन की राजनीति कमजोर लोगों की भागीदारी को बढ़ाती है। बहुदलीय राजनीति के उभार ने बड़े लोकतांत्रिक खिलाड़ियों के एकाधिकार को चुनौती दी है। छोटे दलों के जन प्रतिनिधियों को अब अपनी जनता के दुख-दर्द की अभिव्यक्ति के लिए ज्यादा अवसर है। शक्ति का संतुलन अब राज्य व क्षेत्रीय दलों की ओर झुक रहा है।

 

केंद्र अपने महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए छोटे दलों व राज्यों के मुखिया की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं। ए. राजा का इस्तीफा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तब ले पाए जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने हरी झंडी दिखा दी। संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल में मंत्री बनाने का एकाधिकार रखता है, लेकिन गठबंधन राजनीति ने संसदीय व्यवस्था में सेंध लगा दी है। प्रधानमंत्री अब संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार व शक्ति का प्रयोग करने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। इस प्रकार हमारे संविधान में दी गई संसदीय प्रणाली गठबंधन राजनीति का शिकार बन रही है। इसी गठबंधन राजनीति का दूसरा शिकार है केंद्र राज्य संबंधों में बदलाव। भारत के संविधान में शक्तियों को केंद्र व राज्य के बीच विभाजित किया गया है। इस विभाजन में केंद्र को ज्यादा बलशाली बनाया गया है।

 

संविधान राज्यों को जान बूझकर कम शक्ति प्रदान करता है। संविधान सृजन के समय यह बात साफ कही गई थी। नवंबर 1948 को सांविधानिक दस्तावेज के संकल्प को प्रस्तुत करते हुए डॉ. अंबेडकर ने कहा कि यदि कानून के किसी विद्यार्थी को संविधान दी जाए तो वह दो प्रश्न अवश्य करेगा कि संविधान के अंतर्गत किस प्रकार के शासन का (संसदीय या राष्ट्रपति) स्वरूप सोचा गया है और यह कि संविधान का स्वरूप या प्रकृति (ऐकिक या परिसंघीय) कैसा है? पहले प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि हमारा शासन संसदीय होगा, क्योंकि लंबे समय से हम इसके आदी हैं। दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि इस संवैधानिक प्रारूप में एक परिसंघीय संविधान परिकल्पित है, क्योंकि यह द्विस्तरीय शासन प्रणाली का सृजन कर रहा है।

 

इस संविधान में द्विस्तरीय शासन प्रणाली के अंतर्गत केंद्र में संघ व उसकी परिधि में राज्यों को रखा गया है। दोनों संविधान द्वारा प्रदत्त अपने-अपने क्षेत्रों में संप्रभु शक्तियों का प्रयोग करेंगे। उन्होंने भारत व अमेरिका के संविधान की भी तुलना की। कई संविधानविद् अमेरिकी संविधान को विश्व के परिसंघीय संविधानों का आदर्श मानते हैं। उनके अनुसार भारत का संविधान अमेरिका से दो प्रकार से समरूपता रखता है। एक यह कि वहां भी द्विस्तरीय व्यवस्था है तथा दूसरे कि संविधान राज्यों का लीग नहीं है और न ही राज्य संघीय सरकार की प्रशासनिक इकाई या एजेंट है। कई बिंदुओं पर दोनों में अंतर भी है। जैसे यहां द्वैध नागरिकता, दो संविधान, दो न्यायपालिका, विधिक संहिताओं (जम्मू-कश्मीर के दुर्भाग्यपूर्ण अपवाद को छोड़कर) या लोक सेवाओं में दोहरापन नहीं है, जो कि द्विस्तरीय व्यवस्था की तार्किक परिणति होती है। ऐसी दोहरी व्यवस्था के लिए भारत के संविधान में कोई जगह नही है।

 

भारत में न्यायिक स्तर पर एकल न्यायपालिका है, जो श्रृंखलाबद्ध है, जिसमें शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय है। अखिल भारतीय स्तर पर एक अखिल भारतीय सेवा है। यद्यपि कि राज्यों को स्वयं की लोक सेवा बनाने का अधिकार है। इसके अलावा हमारी संविधान संशोधन की प्रक्रिया अमेरिका की तुलना में काफी लचीली है। अपने सारगर्भित भाषण में अंबेडकर ने यह स्वीकार किया कि राज्यों की तुलना में केंद्र बलशाली है, क्योंकि आधुनिक विश्व में परिस्थितियां इस प्रकार की हैं कि शक्ति का केंद्रीकरण अपरिहार्य हो गया है। उन्होंने संविधान की रचना इस बुद्धिमत्ता से की कि शक्ति के अत्यधिक व अनुचित केंद्रीकरण को टाला जा सके। इसकी विलक्षणता इस तथ्य में निहित है कि युद्ध के समय यह ऐकिक संविधान की भांति कार्य करने लगता है।

 

अंबेडकर ने स्वीकार किया कि जो दस्तावेज वह रख रहे हैं, वह संविधान के परिसंघीय ढांचे को प्रस्तुत करता है। किंतु रोचक बात यह है कि इतने बड़े संविधान में इस बात को कहीं भी साफ-साफ लिखा नहीं गया है और न ही शब्द परिसंघ या परिसंघीयता का कोई जिक्र लिखित रूप में कहीं किया गया है। इसके विपरीत जिस पदावली का प्रयोग किया गया है उसमें अनु. एक में भारत को राज्यों का संघ बताया गया है। इतना ही नहीं राज्यों की सीमा, नाम व क्षेत्र परिवर्तन करने के सिलसिले में अन्य संबंधित राज्यों की सम्मति आवश्यक थी, जबकि अब केवल उनका विचार जान लेना ही पर्याप्त है जिसे मानने के लिए केंद्र बाध्य नहीं हैं। प्रारूप समिति द्वारा संविधान के प्रथम दस्तावेज को स्वीकार नहीं किया गया जो बी.एन. राऊ ने तैयार किया था। ऐसे में किसी को भी अचरज हो सकता है कि एक तरफ तो अंबेडकर भारत को फेडरल संविधान देना चाहते थे, दूसरी तरफ भारत को राज्यों का फेडरेशन कहने की बजाय यूनियन कह रहे थे। यह अंतर्विरोध क्यों था?

 

वस्तुत: यह अंबेडकर की दूरदर्शिता व देश की एकता-अखंडता को सुनिश्चित करने लिए उठाया गया अनुपम उदाहरण है। राज्यों का परिसंघ पदावली के दो निहितार्थ हैं। पहला, हमारा परिसंघ राज्यों की किसी संधि या करार की उत्पत्ति नहीं है और दूसरा, कोई प्रदेश इससे पृथक होने के अधिकार का दावा नहीं कर सकता। इस प्रकार अंबेडकर की दृष्टि व्यापक व सोच प्रगतिपूर्ण थी। अनेकता में एकता की स्थापना के लिए संविधान की भूमिका किस प्रकार सकारात्मक होनी चाहिए, यह भलीभांति जानते थे।

 

बाबा साहब अंबेडकर को मालूम था कि एक मजबूत केंद्र ही विभाजनकारी प्रवृत्तियों को उत्तेजित करने वाली प्रेरणा को प्रारंभ में ही नष्ट करने का नैतिक व संवैधानिक साहस कर सकता है। एक शक्तिशाली केंद्र ही कठोर निर्णय ले सकता है। यदि केंद्र शक्तिशाली होता और राज्य आधारित दलों पर निर्भर नहीं होता तो कांधार कांड, आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार पर ज्यादा कठोरता से निर्णय हो पाता। हमारा देश डॉ. अंबेडकर की दूरदर्शी सोच और समग्र चिंतन को आज अधिक प्रासंगिक पाता है।

 

(लेखक दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विवि में विधि प्रवक्ता एवं विश्व संवाद केंद्र, गोरखपुर से जुड़े हैं।)

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