लेखक परिचय

डॉ. सुभाष राय

डॉ. सुभाष राय

जन्म जनवरी 1957 में उत्तर प्रदेश में स्थित मऊ नाथ भंजन जनपद के गांव बड़ागांव में। शिक्षा काशी, प्रयाग और आगरा में। आगरा विश्वविद्यालय के ख्यातिप्राप्त संस्थान के. एम. आई. से हिंदी साहित्य और भाषा में स्रातकोत्तर की उपाधि। उत्तर भारत के प्रख्यात संत कवि दादू दयाल की कविताओं के मर्म पर शोध के लिए डाक्टरेट की उपाधि। कविता, कहानी, व्यंग्य और आलोचना में निरंतर सक्रियता। देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं, वर्तमान साहित्य, अभिनव कदम,अभिनव प्रसंगवश, लोकगंगा, आजकल, मधुमती, समन्वय, वसुधा, शोध-दिशा में रचनाओं का प्रकाशन। ई-पत्रिका अनुभूति, रचनाकार, कृत्या और सृजनगाथा में कविताएं। अंजोरिया वेब पत्रिका पर भोजपुरी में रचनाएं। फिलहाल पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय।

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-डा. सुभाष राय

फरहा पंडित भारतीय मूल की अमेरिकी मुसलमान हैं। उन्हें ओबामा ने बहुत महत्वपूर्ण काम सौंपा है। उन्हें दुनिया को यह समझाना है कि अमेरिका मुसलमानों का दुश्मन नहीं है। अमेरिका में मुसलमानों को उतना ही सम्मान मिलता है, जितना किसी अमेरिकी को। वह न तो मुसलमान कौम को आतंकवादी मानता है, न ही इस्लाम को। अमेरिका जो कर रहा है, उसे देखते हुए यह बड़ा कठिन काम है। पर फरहा पंडित ने ठान लिया है कि वे यह असम्भव भी सम्भव कर दिखायेंगी। वे फरहा भी हैं और पंडित भी, शायद इसलिये उन्होंने इतनी हिम्मत की है। 25 देशों की यात्रा करने और हजारों मुस्लिम युवाओं, बुद्धिजीवियों से मुलाकात करने के बाद उन्हें इलहाम हुआ है कि यह समझना गलत होगा कि भारत के सभी 16 करोड़ मुसलमान आतंकवादी हैं। गिने-चुने लोगों के गलत रास्ते पर चले जाने से किसी को यह कहने का आधार नहीं मिल जाता कि मुस्लिम कौम आतंकवादी हैं। समझ में नहीं आता कि उन्हें भारत के मुसलमानों को लेकर इतनी बेचैनी क्यों हुई? क्या वे भारत के मुसलमनों को ही सबसे ज्यादा परेशान देख रहीं हैं? क्या पकिस्तान के मुसलमान बहुत कुशल से हैं, उन्हें अमेरिका से कोई गिला नहीं? क्या ईरान, इराक, अफगानिस्तान, यमन, फलस्तीन के मुसलमान दादा ओबामा से बहुत प्रसन्न हैं? क्या उन्हें भूल गया कि जार्ज बुश पर जूता कहां फेंका गया था और किन लोगों ने जूते फेंकने वाले पत्रकार को मुस्लिम जगत का हीरो बना दिया था? और क्यों?

दरअसल अमेरिका के कई चेहरे हैं। आतंकवाद और मुसलमानों को लेकर वह दुनिया के अलग-अलग इलाकों के लिए अलग-अलग मानक रखता है। वह तालिबान से तो लड़ता हुआ दिखता है पर भारत में दहशतगर्दी के लिए जिम्मेदार आतंकवादी संगठनों के बारे में परम मौन बनाये रखता है। वह भारत को खुश रखना चाहता है क्योंकि भारत उसके अनुपयोगी और बेकार माल का सबसे बड़ा खरीदार है, लेकिन पाकिस्तान को भी नाराज नहीं करना चाहता क्योंकि पाकिस्तान की मदद के बिना वह तालिबान से लड़ नहीं सकता। वह मंदी की मार से भयानक रूप से त्रस्त है लेकिन अभी भी वह अपने को दुनिया का सबसे बड़ा दादा समझने का भ्रम छोड़ नहीं पाया है। इतिहास ने कई बार उसे मनमानी करते देखा है। उसने जिस तरह मुस्लिम जगत में एक बहादुर बादशाह के रूप में विख्यात सद्दाम हुसैन को मार-मार कर कर गड्ढे में छिपने के लिए मजबूर कर दिया, बाद में उन्हें खोदकर निकाला और इराक की सत्ता में बैठाये गये अपने ही भाड़े के हत्यारों के हवाले कर दिया, वह आखिर मुसलमनों को कैसे भूल सकता है? हो सकता है सद्दाम बहुत न्यायप्रिय और लोकप्रिय शासक न रहे हों, हो सकता है कि उनकी तानाशाही से इराक के लोग तंग आ गये रहे हों, पर इस नाते अमेरिका को यह अधिकार कैसे मिल सकता है कि वह उनका सफाया कर दे। मानव संहारक अस्त्र होने के जिस अन्देशे को आधार बनाकर सद्दाम और उनके देश को तबाह कर दिया गया, वे निराधार निकले। क्या यह मनुष्यता के प्रति अपराध नहीं है? क्या इसका सौ प्रतिशत कुसूर अमेरिका पर नहीं मढ़ा जाना चाहिये?

अमेरिका की फरहा पंडित जिस भाषा में बोल रहीं हैं, उससे लगता है कि या तो अमेरिका मुसलमानों से अचानक रीझ गया है या फिर लड़ते-लड़ते थक गया है। सच क्या है, समझ में नहीं आता। एक तरफ तो अमेरिकी अफसरान आम मुस्लिम यात्रियों को भी अमेरिका में घुसने देने से रोकने की पूरी कोशिश करते हैं, हर मुसलमान पर आतंकवादी होने का शक करते हैं और अगर किसी को प्रवेश मिलता भी है तो भारी अपमान सहकर, वहीं दूसरी तरफ वे ऐसी बातें करते हैं, जैसे मुसलमानों के लिये उनके मन में प्रेम का महासागर उमड़ रहा हो। किसे नहीं मालूम है कि भारत के विख्यात फिल्म कलाकार और लगभग सारी दुनिया में मशहूर शाहरुख खान को अमेरिका में प्रवेश के पहले किस तरह अपमानित होना पड़ा था? किसे नहीं याद है कि भारत के राष्ट्रपति पद पर रह चुके और विश्व के शीर्ष नाभिकीय वैज्ञानिकों में शुमार किये जाने वाले अब्दुल कलाम को अमेरिका यात्रा के दौरान जामा तलाशी देनी पड़ी थी? किसे नहीं पता कि भारत के एक मुसलमान संपादक को अमेरिका ने तमाम प्रयासों के बाद भी वीजा जारी नहीं किया, जबकि उनके कागजात भारत सरकार की ओर से जांचे जा चुके थे। मुसलमानों के प्रति इतने संदेहों से भरा अमेरिका न केवल भारत को बल्कि दुनिया भर को मुसलमानों के बारे में अपना सोच बदलने की सीख देने की कोशिश कर रहा है।

ओबामा ने फरहा पंडित को दुनिया भर के मुसलमानों के मन से अमेरिका के प्रति भय और घृणा निकालने का जिम्मा सौंपा है। उनसे यह भी कहा गया है कि वे मुसलमानों के भीतर अमेरिका के प्रति बनी शत्रुवत धारणा को भी कम करने की कोशिश करें। वे अब तक 25 देशों की यात्रा कर चुकीं हैं, भारत के भी तमाम मुसलमानों से उन्होंने बात की है। अब वे कह रहीं हैं कि कोई भी यह न समझे कि भारत के 16 करोड़ मुसलमान आतंकवादी हैं। समझ में नहीं आ रहा कि वे यह बात किसे बता रही हैं? ऐसा भारत में तो कभी समझा नहीं गया। अगर किसी ने कभी ऐसा समझा तो वह अमेरिका के अलावा कोई और देश नहीं हो सकता है। फरहा पंडित अगर भारत के छोटे-छोटे कस्बों या शहरों में जाती, वहां ढाबों पर बैठतीं, वहां की फैक्ट्रियों में जाती, स्कूलों में जातीं या सार्वजनिक समारोहों में शिरकत करतीं तो उन्हें पता चलता कि भारत में हिंदू और मुसलमान में फर्क करना कितना मुश्किल होता है। यहां के हिंदू और मुसलमान, दोनों ही अब इस बात को ठीक से समझते हैं कि उन्हें लड़ाने का काम कौन कर रहा है, मुसलमानों की पूरी कौम को आतंकवादी के रूप में पहचान देने का षड्यंत्र कौन कर रहा है।

बेशक भारत में कुछ अतिराष्ट्रवादी ताकतें हैं जो मुस्लिम विरोधी माहौल बनाने का प्रयास करती रहती हैं लेकिन हाल के वर्षों में उनके चेहरे से भी नकाब उठ गयी है। वे कटघरे में हैं, उन्हें कई मौकों पर पहचाना गया है, रंगेहाथ पकड़ा गया है और अब उनके माथे में भी यह बात आने लगी है कि केवल लोगों को भड़काकर, लड़ाकर बहुत लम्बे समय तक फायदा नहीं लिया जा सकता। आम भारतीय सांप्रदायिक नहीं है, बस उसमें इतनी कमी है कि वह कई बार षड्यंत्रकारी इरादों वाले दुराग्रही लोगों के हाथों इस्तेमाल हो जाता है। पर अब उसकी आंखें भी खुल गयी है, वह भी अपने दुश्मनों को पहचानने लगा है। भारत में मुसलमानों को लेकर उनकी पूरी कौम के बारे में या इस्लाम के बारे में कोई ऐसी छवि नहीं है जैसे सारे के सारे मुसलमान आतंकवादी हों। मुसलमान भी इस सच को जानता है। इसीलिए आतंकवादियों को शायद उस तरह का समर्थन और सहयोग कम से कम मैदानी भारत में तो अब नहीं मिलता, जैसा कश्मीर में संभव हो पाता है। कश्मीर के लोग अभी पाकिस्तानपरस्त अलगाववादी तत्वों के इरादों को ठीक से समझ नहीं पाये हैं। जिस दिन वे सचाई को समझ लेंगे, वहां भी हालात सामान्य हो जायेंगे।

अमेरिका की हकीकत सारी दुनिया जानती है। सोवियत संघ के विघटन के बाद वह जिस एकध्रुवीय दुनिया की कल्पना कर रहा था, वह वास्तव में उसका सपना हो जाने वाला है। चीन जिस आर्थिक और सामरिक चुनौती के अन्दाज में उभर रहा है, उससे सबसे ज्यादा अगर किसी को चिंता है तो वह अमेरिका को है। इराक और अफगानिस्तान में अपनी करतूतों के कारण उसने न केवल दुनिया भर के मुसल्मानों को नाराज कर लिया है बल्कि तर्किक और सही सोच वाले लोगों को भी अपना वैचारिक दुश्मन बना लिया है। मन्दी ने उसकी कमर तोड़ दी है, पर विश्वविजय का दर्प अभी भी टूटा नहीं है। मुसलमानों के नाम पर भारत को कटघरे में खड़ा करके वह जिस तरह अपने मुंह की कालिख साफ करना चाहता है, वह व्यर्थ की कसरत के अलावा कुछ और नहीं है। बेहतर होता अगर अमेरिका दुनिया को उपदेश देने की जगह खुद मुसलमानों के प्रति अपना नजरिया बदल लेता।

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1 Comment on "मुस्लिमों के प्रति अमेरिकी रवैया दुर्भाग्‍यपूर्ण"

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SARKARI VYAPAR BHRASHTACHAR
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SARKARI VYAPAR BHRASHTACHAR
बहुत से लोग ये सवाल करते हैं की हम लोग कार्यालयों में जाकर अधिकारियों एवं कर्मचारियों से घूस न लेने की शपथ दिलवाकर क्या करना चाहते हैं. हमारा जवाब यह है की हमारा लक्ष्य अन्ना के ५ आदर्शों: १-शुद्ध आचार, २- शुद्ध विचार, ३-निष्कलंक जीवन, .४-अपमान सहने की शक्ति ५- थोडा सा त्याग क्षमा करे अन्ना ….भारतीय संस्कृति में अमेरिकी भ्रष्ट आतंकवादी,और गुंडे पलने वाली संस्कृति का कब्ज़ा हो चूका है इन ६५ वर्षो में ….. देश के भ्रष्ट नेताओं,मंत्रियो,संतरियो और अधिकारिओ के ५ आदर्श है १-चोरी २- चुगली ३- कलाली ४- दलाली ५- छिनाली इसलिए ये और इनकी हराम… Read more »
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