लेखक परिचय

लालकृष्‍ण आडवाणी

लालकृष्‍ण आडवाणी

भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उपप्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर। प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व। वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।

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लालकृष्ण आडवाणी

विगत् तीन दशकों में मैंने असंख्य पुस्तक विमोचन कार्यक्रमों में भाग लिया है। पुस्तक विमोचन से पूर्व अपनी शुरुआती टिप्पणियों में अक्सर मैं यह कहता हूं कि आपातकाल के उन्नीस महीने जो मैंने बंगलूर सेंट्रल जेल और कुछ रोहतक जेल में बिताए, उस समय सलाखों के पीछे बंद सभी राजनीतिक बंदियों के लिए ‘रिलीज‘ (छूटना) शब्द आनन्ददायक होता था। 18 जनवरी, 1977 में मेरी रिहाई जोकि 26 जून, 1975 में गिरफ्तारी के बाद हुई थी। अत: जब भी किसी लेखक मुझे अपनी पुस्तक ‘रिलीज‘ करने का अनुरोध किया तो शायद ही मैंने उसे निराश किया हो।

एक महीना पूर्व मुझे एक अत्यन्त प्रभावी पुस्तक के विमोचन में भाग लेने का मौका मिला जिसमें उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एम.जे. अकबर की पुस्तक टिंडरबॉक्स (Tinderbox) विमोचित की। पुस्तक का उप शीर्षक है: ‘पाकिस्तान का अतीत और भविष्य‘ (The Past and Future of Pakistan) सम्मानीय अंसारी ने स्वंय पुस्तक को ‘श्रेष्ठ एम.जे. अकबर‘ के रुप में निरुपित किया, जो पुस्तक के साथ-साथ लेखक की प्रशंसा भी है। पुस्तक न केवल पाकिस्तान नाम के एक कृत्रिम देश बनाने की प्रेरणा का ज्वलंत विश्लेषण्ा करती है अपितु उन पर भी प्रकाश डालती है जिनके चलते एम.जे. ने इसे ‘जेली स्टेट‘ कहा। अकबर कहते हैं ”……..यह न तो स्थिरता हासिल कर पाएगा और न ही विघटन। परमाणु हथियारों के विशाल जखीरे ने इसे एक विषैली ‘जेली‘ बना दिया है और वह भी एक ऐसे क्षेत्र में जो लगता है संकीर्णता, भाई-भाई की हत्या और और अंतरराष्ट्रीय युध्दों से दोषित है। यह विचार सकून देने वाला नहीं है।”

ह्यात रीजेन्सी होटल में सम्पन्न हुए इस भव्य पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में प्रमुख विद्वान और प्रतिष्ठित महानुभाव उपस्थित थे। अकबर की पुस्तक उस समय विमोचित हुई जब पाकिस्तान में एक जघन्य दु:खद घटना घटी थी। पाकिस्तान के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की उनके ही सुरक्षा गार्ड मलिक मुमताज कादरी ने हत्या कर दी। तासीर को यह कीमत एक ईसाई महिला आयशा बीबी जो वर्तमान में ईशनिंदा के आरोपों में मृत्युदण्ड की सजा काट रही, के मुखर समर्थन में बालने के कारण चुकानी पड़ी। तासीर ईशनिंदा कानून बदलने की निडरतापूर्वक वकालत कर रहे थे।

पुस्तक के परिचय में अकबर लिखते हैं:

”ब्रिटिश भारत के मुस्लिमों ने एक सेकुलर भारत की संभावनाओं को नष्ट करते हुए जिसमें हिन्दू और मुस्लिम सह-अस्तित्व से रह सकते थे को छोड़ 1947 में पृथक होमलैण्ड चुना। क्योंकि वे मानते थे कि एक नए राष्ट्र पाकिस्तान में उनकी जान-माल सुरक्षित रहेगी और उनका मजहब भी सुरक्षित रहेगा। इसके बजाय, छ: दशकों के भीतर ही पाकिस्तान इस धरती पर सर्वाधिक हिंसक राष्ट्रों में एक बन गया है, इसलिए नहीं कि हिन्दू मुस्लिमों की हत्या कर रहे थे अपितु इसलिए कि मुस्लिम मुस्लिमों को मार रहे थे।”

उनकी इस मान्यता की पृष्ठिभूमि में ही उन्होंने अपने संक्षिप्त भाषण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि ”यदि सलमान तासीर भारत में होते तो उन्हें मरना नहीं पड़ता!”

एम.जे. की पुस्तक की विषय वस्तु ऐसी थी कि उस दिन जो-जो भी बोले – मुख्य अतिथि हमीद अंसारी के अलावा, हारपर कॉलिन्स पब्लिकेशंस के चेयरमैन अरूण पुरी और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी – भारत और पाकिस्तान की कुछ न कुछ तुलनात्मक विशेषताएं गिना रहे थे जो उनकी वर्तमान स्थितियों तथा सफलताओं और असफलताओं को बताती हैं।

जब इस अवसर पर मुझे कुछ शब्द बोलने को कहा गया तो मैंने सन् 2005 में अपनी पाकिस्तान यात्रा के समय वहां के कुछ प्रमुख राजनीतिज्ञों से हुई संक्षिप्त बातचीत का स्मरण दिलाया। उस समय पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त द्वारा आयोजित स्वागत में, बीच की मेज पर उच्चायुक्त और मैं बैठे थे, साथ ही सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि तथा तीन या चार मंत्री भी मौजूद थे। अनेक राजनीतिज्ञों द्वारा सीधे-सीधे एक सवाल मुझसे पूछा गया: ‘मि0 आडवाणी, आप एक सिंधी हैं जिसका जन्म और शुरू के बीस वर्ष करांची में बीते। आज, आप भारत की राजनीति में इतने ऊपर तक गए कि उप-प्रधानमंत्री भी बने! क्या आपका मूल, आपका जन्म इत्यादि आपके राजनीतिक कैरियर में बाधा नहीं बना?’ मेरा उत्तर था: बिल्कुल नहीं। भारतीय राजनीति में, वे सभी जो ंसिंध, नार्थ वेस्टर्न प्रोविंस, पंजाब, पूर्वी बंगाल इत्यादि से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल इत्यादि गए; सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी इत्यादि में शामिल हुए और राजनीतिक मुख्यधारा का अंग बने। वास्तव में यह आपके सोचने का विषय है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, बिहार इत्यादि से पाकिस्तान आए मुस्लिम, पचास वर्ष से ज्यादा समय के बावजूद अभी भी मुहाजिर (शरणार्थी) हैं और उन्हें अपना अलग दिल एम क्यू एम बनाना पड़ा)!

मैंने उन्हें बताया कि भारत का लोकाचार सदैव समावेशी रहा है जबकि पाकिस्तान का लोकाचार गैर-समावेशी!

वस्तुत:, ‘टिंडरबॉक्स‘ बार-बार इस पर जोर देती है कि अपने समय के प्रमुख सुन्नी धर्मगुरू और बुध्दिजीवी शाह वलीउल्लाह ने एक ऐसे समुदाय जो उनके हिसाब से काफिरों की सांस्कृतिक शक्ति और सैन्य बल से अपने को खतरे में महसूस करती है, के लिए ‘इस्लामिक पवित्रता‘ की विशिष्टता और सुरक्षा का सिध्दांत प्रतिपादित किया।

यह पुस्तक यह अनुबोधक टिप्पणी करती है:

”राजनीति में इस्लाम की भूमिका के बारे में पाकिस्तान में बहस तभी शुरू हो गई थी जब जिन्ना जीवित थे। पाकिस्तान के पिता को पाकिस्तान के पितामह मौलाना मौदूदी, जमायते-इस्लामी के संस्थापक और दक्षिण एशिया में इस्लामिक आंदोलन के शिल्पी और इससे सम्बन्धित विश्वव्यापी घटनाक्रम पर सर्वाधिक शक्तिशाली प्रभाव रखने वाले, ने चुनौती दे दी थी। इस्लामवाद को कभी पाकिस्तान में जन समर्थन नहीं रहा, यहां जब कभी चुनाव हुए, उनसे यह सिध्द हो गया। लेकिन कानून और राजनीतिक जीवन पर इसका प्रभाव जबरदस्त था। मौदूदी शिष्य, जनरल जियाउल हक, जिन्होंने 1976 से पाकिस्तान पर एक दशक तक निरंकुशता से शासन किया ने पंगु हो चुके उदारवादियों से एक सवाल पूछा: यदि इस्लाम के लिए पाकिस्तान नहीं बनाया गया होता तो यह मात्र दोयम दर्जे का भारत होता?

अपनी प्रस्तावना को अकबर ने इन शब्दों में निष्कर्ष रूप में लिखा है:

”पाकिस्तान एक स्थिर, आधुनिक राष्ट्र बन सकता है लेकिन सिर्फ तभी ही जब पाकिस्तान के पिता के बच्चे पितामह मौदूदी के वैचारिक उत्तराधिकारियों को परास्त कर सकें।”

अकबर की पुस्तक में शिवाजी द्वारा औरंगजेब को लिखा गया एक असाधारण पत्र प्रकाशित किया गया है। जो पहले कभी मेरी नजर में नहीं आया। उसे यहां उदृत करना समाचीन होगा। अकबर कहते हैं:

चमत्कारिक मराठा शासक शिवाजी जिनकी मुगल सल्तनत को चुनौती, अक्सर उसके पतन के मुख्य कारणों के रूप में गिनी जाती है, ने जजिया के विरूध्द विरोध करते हुए एक असाधारण पत्र औरंगजेब को लिखा: ‘यदि आप सच्ची दिव्य पुस्तक और ईश्वर के शब्दों (कुरान) में विश्वास रखते हो तो आप उसमें पाएंगे रब्ब-उल-अलामीन, सभी मनुष्यों का मालिक न कि रब्ब-उल-मुसलमीन, सिर्फ मुस्लिमों का मालिक। इस्लाम और हिन्दू परस्पर तुल्नात्मक हैं। उनको नाना प्रकार के रंग सच्चे दिव्य चित्रकार रेखाओं में रंग करने और भरने में उपयोग करता है; यदि यह मस्जिद में है तो अजान को उसकी याद में स्मरण किया जाता है। यदि यह मंदिर है तो घंटियां सिर्फ उनके लिए बजती हैं, किसी व्यक्ति की अपनी जाति और वर्ण के प्रति पक्षपात किया जाता है तो यह पवित्र पुस्तक के शब्दों को बदलने जैसा है……‘ यही वह दर्शन था जिसे शिवाजी ने उल्लिखित किया जिसने अकबर को सुलह-ए-कुल की ओर प्रेरित किया तथा जहांगीर और शाहजहां को हिन्दुओं को पृथक होने से रोका‘। शिवाजी लिखते हैं, उनके पास भी जजिया लगाने की शक्ति थी लेकिन उन्होंने अपने दिलों में धर्मान्धता को स्थान नहीं दिया।‘

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