लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

Posted On by &filed under विविधा, सिनेमा.


कलाकार: रितेश देशमुख, पुलकित सम्राट, जैकलीन फर्नांडीस, कुमुद मिश्रा
निर्देशक: करण अंशुमान
संगीतकार: राम सम्पत
स्टार: 2.5

‘मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर करना’ कानों में पड़ते ही दिमाग सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या इसे सच मानें? मजहब कोई भी हो, बैर नहीं सिखाता पर उसके कथित ठेकेदार खून में नफरत का ज़हर घोलकर मजहब को बदनाम करते हैं। दुनिया के हज़ारों धर्मों के करोड़ों अनुयायियों की आस्था अलग-अलग हो सकती है पर सर्वशक्तिमान तो एक ही है फिर चाहे उसे किसी भी नाम, धर्म, मजहब, देश, आस्था से पुकारा जाए। पत्रकार से निर्देशक बने करण अंशुमान ने एक ऐसे विषय पर हाथ आजमाया है जिसपर अमूमन विवाद की आशंका रहती है। हालांकि वे भी इससे चिंतित दिखे क्योंकि जिस कहानी को वे कहना चाहते थे, उसमें कई झोल हैं। फिर भी करण का पहला प्रयास ‘बैंगिस्तान’ गुदगुदाता है और सोचने पर मजबूर करता है कि शांति-अमन की दुनिया आखिर क्यों ‘लाल’ होती जा रही है?

कहानी: हिन्दुस्थान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे हालात दिखाने के लिए बैंगिस्तान नामक काल्पनिक जगह बनाई गई है जिसके उत्तरी और दक्षिणी भाग दो समुदायों की आपसी नफरत के कारण अमन-चैन से कोसों दूर हैं। उत्तरी बैंगिस्तान में हाफिज बिन अली अपनी कॉल सेंटर की नौकरी सिर्फ इसलिए छोड़ देता है क्योंकि एक गोरा उसे मुसलमान होने की वजह से ओसामा जैसी मौत मारने की बात करता है। दक्षिणी बैंगिस्तान ने पवन चतुर्वेदी पक्का हनुमान भक्त है और मुसलमानों से नफरत करता है। ‘अल काम तमाम’ और ‘मां का दल’ जैसे संगठन दोनों की मानसिक अवस्था का फायदा उठाते हैं और उसके वर्ल्ड रिलिजियस कॉन्फ्रेंस में धमाका करने को उकसाते हैं। कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब हाफ़िज़ बिन अली ईश्वरचंद शर्मा बन जाता है और पवन चतुर्वेदी बनता है अल्लारखा खान। दोनों का मकसद है, एक-दूसरे के धर्म को वैश्विक स्तर पर बदनाम करना। फिल्म इसी लीक पर आगे बढ़ती है और एक ऐसा संदेश देती है जिसकी जरुरत आज की पीढ़ी को सर्वाधिक है।

bangistanनिर्देशन: करण ने सीधे-सीधे न सही पर हिंदू-मुस्लिम वैमनस्यता को आधार बनाकर काल्पनिकता के सांचे में ढाला है। ‘गीता’ और ‘कुरान’ के मानवता के संदेश से दोनों पक्षों को हमदर्द बनते दिखाना करण की दूर की सोच ही कही जाएगी। हालांकि करण जो कहना चाहते थे उसमें पूरी तरह कामयाब नहीं हुए हैं। एक संजीदा विषय कॉमेडी के झोल में उलझ गया है। अंत में अति भाषणबाजी से भी बचा जा सकता था।

अभिनय: हाफिज बिन अली के किरदार में रितेश देशमुख बेमिसाल हैं। धर्म का मर्म समझने के बाद उनकी सहृदयता भा जाती है। पवन चतुर्वेदी उर्फ़ पुलकित सम्राट ने निराश किया है। कहीं-कहीं उनकी ओवरएक्टिंग असहनीय हो जाती है। रितेश फिल्म में एक जगह पुलकित से कहते हैं कि तुम्हें एक्टिंग नहीं आती, उनपर सटीक बैठता है। सलमान पुलकित को इंडस्ट्री में स्थापित करने के लिए जो कर रहे हैं, उन्हें उससे पहले एक्टिंग सीखनी होगी। जैकलीन फर्नांडिस का फिल्म में कैमियो रोल है और क्यों है यह समझ नहीं आया। कुमुद मिश्रा दोहरे किरदार में हैं और ठीक-ठाक हैं। बाकी कलाकार बस मौजूदगी दर्ज़ करवाते हैं।

गीत-संगीत: संगीतकार राम सम्पत का संगीत फिल्म के मूड के हिसाब से ठीक है। ‘होगी क्रांति’, ‘मौला’, ‘इस दुनिया से लड़ना है’ जैसे गीत कर्णप्रिय हैं। ‘सैटरडे नाईट’ ने आइटम सांग की कमी को पूरा किया है।

सारांश: ‘बैंगिस्तान’ आज की परिस्थितियों को मद्देनजर रखते हुए एक पॉलिटिकल और कॉमिकल प्रस्तुति है जिसे एक बार देखा जा सकता है। पहले हाफ तक फिल्म गुदगुदाती है पर दूसरे हाफ में यह भटकी हुई नज़र आती है। हां, धर्म-संप्रदाय और मानवता का पाठ पढ़ना हो तो ‘बैंगिस्तान’ से अपच नहीं होगी। पाकिस्तान और अरब में इसका बैन होना भी दर्शकों की संख्या बढ़ाएगा।

सिद्धार्थ शंकर गौतम

Leave a Reply

1 Comment on "और मारक हो सकती थी ‘बैंगिस्तान’"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
डॉ. राजेश कपूर
Guest
सिद्सर्थ जी लेखनी से आपकी सदाशयता साफ़ झलकती है। अर्थात आप भले पत्रकार और सज्जन इंसान हैं। पर इतना होना लेखन के लिये पर्याप्त नहीं।केवल भ्रमण से अर्जित ज्ञान पूर्णता नहीं दे सकता, मूल साहित्य, संदर्भ सामग्री का अध्ययन जरूरी है। जरा एक बार कुरानशरीफ़ का प्रमाणिक हिन्दी अनुवाद पढ़िए। कुरान को न मानने वाले काफ़िरों के साथ सम्बन्ध रखने की, समानता का व्यवहार करने की इजाज़त कहीं नहीं है। काफिरों को कत्ल करने, जजिया वसूल करने, यातना देने, सताने के स्पष्ट निर्देश हैं। पूछलो किसी सच्चे, पक्के मुसलमान से। नासमझ, नालायक, विदेशी शक्तियों के एजेण्ट पत्रकार तथा फ़िल्मकार तो… Read more »
wpDiscuz