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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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अनीसुर्रहमान खान 

आजकल हमारा देश पूरी दुनिया में सस्ता लैपटॉप लांच करने की वजह से सुर्खिंयां बटोर रहा है। 5 अक्टूबर को मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने छात्रों के लिए सबसे सस्ता लैपटॉप ‘आकाश’ लांच किया। इसे कुछ साल पहले भी भारत ने दुनिया की सबसे सस्ती कार ‘नैनो’ प्रस्तुत कर विश्‍व को हैरत में डाल दिया था और अब विज्ञान और टेक्नॉलाजी में अपने बढ़ते कदम की तरफ समुचे विश्‍व का ध्यान आकर्शित करने में सफलता पाई है। यही कारण है कि न चाहते हुए भी दुनिया को भारत की सफलताओं के कसीदे पढ़ने पड़ रहे हैं। इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है कि 65 वर्ष पूर्व जिस ब्रिटेन ने हमें 200 साल तक अपना गुलाम बनाए रखा आज उसी देश के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन विश्‍व को आर्थिक मंदी से बचने के लिए भारत के आर्थिक नीति को अपनाने की सलाह दे रहे हैं। अपने नागरिकों से संबोधन में भारत का जिक्र करते हुए कहा कि इस वर्श 2008 से भी ज्यादा भंयकर आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ेगा लेकिन इसके बावजूद भारत के आर्थिक विकास में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यदि आप को विश्‍वास नहीं होता है तो आप भारत भ्रमण करें और देखें कि वहां के नागरिकों में कितना जोश है। उनमें आगे बढ़ने और विकास करने का कितना जज्बा है। वास्तव में यह बात हमारे देश, इसके नागरिकों और रहनुमाओं के लिए विश्‍व के द्वारा उसकी मेहनत को सलाम है। जो परोक्ष रूप से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के माध्यम से स्वीकार की गई है।

‘आकाश’ आईआईटी राजस्थान और मंत्रालय के राष्‍ट्रीय सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी शिक्षा मिशन द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया है। सात इंच के इस टच स्क्रिन लैपटॉप में दो जीबी मेमोरी कार्ड उपलब्ध है जबकि 32 जीबी के बाहरी हार्ड ड्राइव से जोड़ा जा सकता है। विशेष बात यह है कि तीन घंटे बैटरी से चलने वाला यह लैपटॉप सौर उर्जा से भी चल सकता है। सरकार इस पर पचास फीसदी सब्सिडी देगी तथा यह छात्रों को 1100 रूपए में उपलब्ध होगा। प्रत्येक राज्य को प्रथम चरण में 3300 लैपटॉप मुहैया कराए जाएंगे। लांच के साथ ही सरकार ने इसे कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियों को इसे बनाने और बेचने का अधिकार देने की बात कहकर और भी सस्ता करने का इशारा दे दिया है। इस अवसर पर कपिल सिब्बल ने देश के लिए इसे मील का पत्थर बताते हुए आशा व्यक्त की कि यह लैपटॉप न सिर्फ भारत बल्कि विष्व भर के छात्रों के लिए भी बहुमुल्य साबित होगा। कपिल सिब्बल द्वारा इस लैपटॉप को भारत के अलावा दूसरे देशों के छात्रों के लिए भी उपलब्ध करवाने की मंशा सराहनीय है। इससे एक तरफ जहां भारतीय छात्रों की प्रतिभा निखर कर सामने आएगी वहीं सांइस और टेक्नॉलाजी के क्षेत्र में भी भारत के कामयाबी से विश्‍व को करीब से जानने का एक और मौका मिलेगा।

परंतु मैं पूरे आदर के साथ उन भारतीय छात्रों और बेरोजगार प्रशिक्षित शिक्षकों की तरफ से एक सवाल माननीय मंत्री जी से करना चाहता हूं कि छात्रों को सांइस और टेक्नलॉजी से जोड़ने पर आप जितनी प्राथमिकता दे रहे हैं कभी देश भर में लाखों की संख्या में वर्षों से खाली पड़े स्कूली शिक्षकों के पद को भरने के लिए आप इतने ही गंभीर क्यूं नहीं हैं? जबकि हजारों की संख्या में बीएड उम्मीदवार रोजगार की तलाश में कम वेतन पर प्राइवेट स्कूलों और टयूशन पढ़ाने पर मजबूर हैं। दूसरी तरफ देश में हजारों की संख्या में ऐसे बच्चे भी हैं जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा है। कई ऐसे बच्चे भी हैं जिनके अंदर प्रतिभा उन बच्चों से कहीं ज्यादा हैं जो महंगी फीस देकर नामी-गिरामी स्कूलों में पढ़ रहे हैं और वह सिर्फ इसलिए वंचित हैं क्योंकि उनके अभिभावक के पास उन स्कूलों में फीस भरने के लायक पैसे नहीं होते हैं। ऐसे बच्चों की प्रतिभा को बचाने के लिए आप के पास क्या प्लान है? फीस के रूप में एक मोटी रकम वसूलने वाले स्कूल जब हाईकोर्ट की फटकार के बावजूद गरीब बच्चों को दाखिला देने से साफ इंकार कर जाते हैं तब आपका सभी को समान शिक्षा नीति का फार्मुला कहां फिट होता है? एक देश के अंदर दो तरह की शिक्षा प्रणाली पर कभी आपका मंत्रालय क्यूं नहीं गंभीरता से विचार कर पाता है? क्या शिक्षा का अधिकार बिल पारित करवा लेने भर से ही जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? ग्रामीण भारत की शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा तो बहुत दूर की बात है मैं सिर्फ राजधानी दिल्ली की ही बात करूं तो पुरानी दिल्ली में सरकार द्वारा संचालित ऐसे कई उर्दू स्कूल मिल जाएंगे जहां उर्दू शिक्षकों का पद वर्षों से खाली पड़ा है जबकि उन स्कूलों में ऐसे प्रिंसिपलों की नियुक्ति है जो गैर उर्दू क्षेत्र से आते है।

बात सिर्फ शिक्षकों के पद की नहीं है बल्कि कई ऐसे छात्रों के उदाहरण भी हैं जिन्हें स्कूल और कॉलेज स्तर पर अपनी प्रतिभा को निखारने का उचित मंच नहीं मिल पाता है। हाल ही में मुझे बिहार के बाढ़ग्रस्त क्षेत्र दरभंगा के एक गर्ल्स कॉलेज जाने का अवसर प्राप्त हुआ जहां छात्राओं से मुलाकात के बाद यह महसूस किया कि उनकी प्रतिभा उनके अंदर घुट कर सिर्फ इसलिए रह जाती है क्योंकि उन्हें अवसर नहीं मिल पाता है। एक छात्रा ने बताया कि उसे पेंटर बनने का बहुत शौक था और वह इसी में अपना कैरियर बनाना चाहती थी परंतु कॉलेज स्तर पर न तो फाइन आटर्स की सुविधा और न ही पारिवारिक बंदिशों के कारण वह अन्य लड़कियों की तरह दिल्ली जाकर इस क्षेत्र में कैरियर बना सकती है। उस छात्रा ने मुझसे प्रष्न किया कि क्या एक छोटे से शहर में रहने के कारण मुझे छोटे सपने देखने चाहिए? सिर्फ डाक्टर और इंजीनियर बनना ही हर किसी के जिंदगी का मकसद तो नहीं हो सकता है। मैंने महसूस किया कि आज उस छोटे से शहर के बच्चे महानगरों में रहने वाले बच्चों की तरह डॉक्टर और इंजीनियर के अलावा फैशन डिजाइनर, गायक, पेंटर और कलाकार जैसे क्षेत्र में अपना कैरियर बनना चाहते हैं। लेकिन वहां के कॉलेजों में इस तरह के कोई कोर्स होते ही नहीं हैं।

माननीय मंत्री जी भारत सहित सारी दुनिया के छात्रों को सस्ता लैपटॉप मुहैया करवाने की आपकी सोच काबिलेतारीफ है। लेकिन उन बच्चों और बेरोजगार प्रशिक्षित शिक्षकों का क्या कसूर है कि आपको उनकी समस्या गंभीर नहीं लगती है? कहीं ऐसा न हो कि उनके सपने पूरे होने से पहले टूट कर बिखर जाएं। जरूरत है इस बात पर गंभीरता से विचार करने का, कि देश में शिक्षा की इतनी गहरी होती खाई को किस तरह पाटा जाए। शिक्षकों की कमी को पूरा किए बगैर छात्रों को सांइस और टेक्नलॉजी से जोड़ देना ही उनके बेहतर शिक्षा का विकल्प नहीं हो सकता है और न ही दरभंगा जैसे छोटे शहरों में सीमित कैरियर के कारण अपने सपनों को बिखरते देखने वाले छात्रों को नजरअंदाज कर उन्नत शिक्षा का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। (चरखा फीचर्स)

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1 Comment on "दुनिया का सबसे सस्‍ता लैपटॉप और हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था"

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Anil Gupta,Meerut,India
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Anil Gupta,Meerut,India

आकाश का विकास निःसंदेह भारत के वैज्ञानिकों और टेक्निशियनों के द्वारा सस्ती चीजें विकसित करने की सिद्धता को प्रमाणित करता है. नेनो के बाद आकाश का विकास इसका ज्वलंत उदाहरण है. हालाँकि चीन का रिकार्ड नयी चीजें बनाने में काफी अच्छा है. लेकिन आपके द्वारा जिस पहलु की और इंगित किया है वह बहुत महत्वपूर्ण है.और कहीं न कहीं इस और इशारा करता है की आकाश का विकास व बल्क उत्पादन करोड़ों के वारे न्यारे करने का अवसर प्रदान करता है जबकि शिक्षक विहीन विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति से कोई लाभ हमारे वर्तमान शाशकों को नहीं दिखाई देता है.

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