लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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ma-durgaडा.राधेश्याम द्विवेदी
मां दुर्गा की आस्था में लीन भक्तों के त्याग और बलिदान की गाथाएं तो सभी ने सुनी है. गोरखपुर के बांसगांव तहसील कस्बा में एक ऐसा दुर्गा मंदिर है जहां पिछले तीन सौ साल से शरीर के अंगों से मां दुर्गा को रक्त चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है. इसमें 12-15 दिन के नवजात से लेकर 100 साल के बुजुर्ग तक का रक्त चढ़ाया जाता है. मान्यता है कि जिन नवजातों के ललाट (लिलार) से रक्त निकाला जाता है वे भी इसी मां की कृपा से प्राप्त हुए होते. हैं।गोरखपुर के बांसगांव तहसील में श्रीनेत वंश के लोगों द्वारा नवरात्र में नवमी के दिन मां दुर्गा के चरणों में रक्त चढ़ाने की अनोखी परंपरा है. यह पिछले 300 साल से चली आ रही है। देश-विदेश में रहने वाले लोग यहां नवमी के दिन मां दुर्गा को अपना रक्त अर्पित करते हैं. खास बात यह है कि यहां नवजात के जन्म लेने के 12 दिन (बरही का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद) बाद से ही उनका रक्त मां के चरणों में अर्पित किया जाता है. इन नवजातों को मां के दरबार में लेकर श्रद्धालु पहुंचते हैं. उस नवजात के पिता या मां, जवान और बुजुर्ग भी इस परंपरा का निर्वहन करते हैं. दुर्गा मंदिर में नवरात्र पर एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें मां खुद नवजात को रक्तबलि के लिए पेश करती हैं. इस परंपरा को निभाने के लिए एक मां अपने कलेजे पर कितना बड़ा पत्थर रखती होगी? इस परंपरा पर हैरत इस बात को लेकर भी होती है कि मां कही जाने वाली देवी दुर्गा भला अपनी संतान को दुख पहुंचाकर कैसे खुश हो सकती है? गोरखपुर के बांसगांव इलाके के लोगों की मान्यता है कि मां दुर्गा नवरात्र में नवजात की रक्तबलि से ही प्रसन्न होती हैं और अपनी कृपा बनाए रखती हैं.
राजपूत चढ़ाते हैं मां को रक्त:- बांसगांव कसबे में मां दुर्गा का प्राचीन मंदिर है. बताया जाता है कि इसकी स्थापना श्रीनेत वंश के लोगों ने की थी. हर साल नवरात्र में यहां पर रक्त पूजा का प्रचलन है. बच्चे से बुजुर्ग तक शरीर के पांच जगहों से रक्त निकालकर मां को अर्पित करते हैं. इसके लिए देश- विदेश में रहने वाले लोग जुटते हैं. मान्यता है कि रक्तदान में शामिल हुए बिना कोई भी बच्चा नया कपड़ा नहीं पहनता है. खास बात यह है कि उसी दिन पैदा हुए बच्चे का रक्त भी मां को चढ़ाया जाता है. उपनयन संस्कार के पूर्व तक एक जगह ललाट (लिलार) और (जनेऊ धारण करना-14 वर्ष की उम्र) हो जाने के बाद युवकों-अधेड़ों और बुजुर्गों के शरीर से नौ जगहों से रक्त निकाला जाता है. उसे बेलपत्र में लेकर मां के चरणों में अर्पित किया जाता है. खास बात ये है कि एक ही उस्तरे से विवाहितों के शरीर के नौ जगहों पर और बच्चों को माथे पर एक जगह चीरा लगाया जाता है. बेलपत्र पर रक्त को लेकर मां के चरणों में अर्पित कर दिया जाता है। इसके बाद धूप, अगरबत्ती और हवनकुंड से निकलने वाली राख को कटी हुई जगह पर लगा लिया जाता है. पहले यहां पर जानवरों की बलि दी जाती थी पर अब मंदिर परिसर में पशु बलि को रोककर रक्त चढ़ाई जाती है. पुजारी श्रवण पाण्डेय ने बताया कि लोगों का मानना है कि ये मां का आशीर्वाद ही है कि आज तक इतने सालों में न तो किसी को टिटनेस ही हुआ न ही घाव भरने के बाद कहीं कटे का निशान ही पड़ा. यहां के लोग मानते हैं कि मां को रक्त चढ़ाने से मां खुश होती है. श्रद्धालु का परिवार निरोग और खुशहाल होता है. पिछले कई सौ साल से बांसगांव में इस परंपरा का निर्वाह ठीक उसी तरह किया जा रहा है, जैसा उनके पुरखे किया करते थे. सभी का मानना है कि क्षत्रियों द्वारा लहू चढ़ाने पर मां का आशीर्वाद उन पर बना रहता है.
15 दिन के बच्चों के काटे जाते हैं अंग:- यहां पर हर साल नवरात्रि के नवमी तिथि को पूरे इलाके के हजारों क्षत्रिय दुर्गा मंदिर में अपने शरीर का रक्त मां को चढाते है. रक्त का यह चढ़ावा 15 दिन के बच्चे से लेकर 100 साल तक के बुजुर्गों तक के शरीर के पांच जगहों से काटकर दिया जाता है. कटने पर शरीर के कई जगहों से रक्त निकलने से मासूम बच्चे रोते बिलखते हैं पर आस्था के नाम पर उनके घाव पर किसी दवा को नहीं बल्कि भभूत मल दिया जाता है.
हर साल दी जाती है रक्तबलि:-यह है गोरखपुर के बांसगांव क्षेत्र का दुर्गा मंदिर. शहर से 40 किमी दूर स्थित इस मदिर में यूं तो हर समय भक्तों की भीड़ लगी रहती है पर शारदीय नवरात्र के नवमी तिथि को यहां पर पूरे इलाके के हजारां क्षत्रियों का जमावड़ा होता है और शुभ मुहुर्त के बाद हर व्यक्ति के शरीर से काट कर रक्त निकाला जाता है और मां को चढाया जाता है. चाहे 15 दिन का नवजात बच्चा हो या फिर 100 साल का बुजुर्ग सभी अपने खून का दान मां को चढ़ाते है. अंधविश्वास की पराकाष्ठा के रूप में यह रक्तबलि यहां हर साल देना अनिवार्य माना जाता है.
सात जगह से काटे जाते हैं शरीर:- कई सौ साल से चली आ रही इस परंपरा में इस क्षेत्र के हर परिवार के पुरुष को रक्त का चढ़ावा अनिवार्य माना जाता है. 18 साल के ऊपर के पुरुषों को शरीर से सात जगहों पर काटा जाता है और रक्त को बेलपत्र के जरिये माता दुर्गा की मूर्ति पर चढाया जाता है. कई दशकों पहले इस मंदिर पर जानवरों की बलि प्रथा काफी प्रचलित थी पर पिछले पचास सालों से यहां के क्षत्रियों ने मंदिर में बलिप्रथा बंद करवा दिया और अब यहां पर उनके खून से मां का अभिषेक होता है.
घाव पर दवा की जगह मले जाते हैं भभूत:- हर साल हजारों लोगों के शरीर से काट कर रक्त मां के चढ़ाया जाता है. एक ही उस्तरे से सभी के शरीर को काटा जाता है, और निकले रक्त को बेलपत्र के उपर लगाकर इस मंदिर में चढ़ाया जाता है. सबसे खौफनाक मंजर उस समय होता है जब एक माह के मासूम बच्चों के कोमल शरीर को भी आस्था के नाम पर पांच जगह से काटकर उनका रक्त यहां पर चढ़ाया जाता है. काटे गए स्थान पर कोई दवा नहीं लगाया जाता, बल्कि मंदिर के भभूत को मल दिया जाता है. अपनी दबंगई दिखाने के चक्कर में यहां के ठाकुरों द्वारा हर साल यह प्रथा आयोजित करवाया जाता है. ऐसा नहीं है कि इस प्रथा को सिर्फ गांव के ही लोग करते हैं, बल्कि जाने माने डॉक्टर भी इस अंधविश्वास की चपेट में आकर यहां पर अपना रक्त चढ़ाते हैं और इस प्रथा को सही मानते हैं.
डाक्टरों की ओर से विरोध:- इस रक्तबलि को डाक्टरों की ओर से विरोध भी किया जाता है, क्योंकि एक ही उस्तरे से सबके शरीर से खून निकालने के कारण हेपेटाइटस बी और एड्स जैसी कई खतरनाक बीमारियां भी होने की संभावना बनी रहती है और जिस भभूत को इलाज मानकर कटे जगह पर मला जाता है वह भी घाव को बढ़ाता है पर अंधविश्वास में अंधे लोगो के कुछ भी नहीं सूझता.
सैकड़ों सालों से अंधविश्वास की परंपरा का निर्वाह:- यहां के लोग मानते हैं कि रक्त चढ़ाने से मां खुश होती हैं और उनका परिवार निरोग और खुशहाल रहता है. सैकड़ों सालों से बांसगाव में अंधविश्वास की इस परंपरा का निर्वाह आज की युवा पी़ढ़ी भी उसी श्रद्धा से करती है जैसे उनके पुरखे किया करते थे. सभी का मानना है कि क्षत्रियों का लहू चढ़ाने से मां दुर्गा की कृपा उनपर बनी रहती है. इस रक्त बलि से ना जाने कितने मासूम हर साल अनेक बीमारियों का शिकार होते होंगे, पर देवी नाराज ना हो जाए इसलिए कोई किसी से कुछ नहीं कहता. हर साल बांसगांव के इस मंदिर में आस्था का खूनी खेल खेला जाता है और न जाने कितने नवजातों के साथ सैकड़ों बच्चों के शरीर का लहू इस मंदिर की भेंट चढ़ जाता है. यहां के क्षत्रियों की आस्था पर अंधविश्वास इतना हावी है कि इन मासूमों की चीख पुकार भी मंदिर की घंटियों में दबकर दम तोड़ देती है.

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