लेखक परिचय

जगमोहन फुटेला

जगमोहन फुटेला

लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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जगमोहन फुटेला

जिस तरह से अन्ना को तिहाड़ से छोड़ने से लेकर उन्हें रामलीला मैदान देने और फिर लगातार सरकार की तरफ से डरु बयान आ रहे थे, माना जा रहा था कि कांग्रेस घबराई हुई है, प्रधानमन्त्री के संसद में बयान को उनकी अन्ना बनाम संसद बनाने की कोशिश बताया गया. माना यही जा रहा था कि कांग्रेस खासकर युवाओं के अन्ना के साथ बह जाने से चिंतित है. उसे डर है कि राहुल की राजनीति तो अब गई. मगर लोकसभा में राहुल गाँधी के बयान से ये साफ़ हो गया था कि सरकार ये सारा सदाचार राहुल के दबाव में नहीं कर रही थी. इसके बरक्स कांग्रेस की रणनीति ये थी कि आन्दोलन के पीछे के खेल को संसद में साफ़ करना है. अन्ना से कोई सीधा पंगा लिए बगैर. कांग्रेस ने ये किया और जो चाहा, वो पाया.

अब इसे कोई चाहे जिसकी भी जीत बताए. सच ये है कि संसद में न कोई प्रस्ताव पास हुआ, न वोटिंग से, न ध्वनिमत से, न सरकार की तरफ से अधिकृत तौर पर अन्ना की शर्तों पर हामी भरी गई. भाजपा समेत सभी पार्टियों के स्पष्ट स्टैंड भी आ गए और अनशन भी टूटा. संसद की गरिमा भी बच गई. बहुत से लोग जिसकी उम्मीद लगाए बैठे थे, सरकार का अन्ना से वो सीधा टकराव भी और जो जलती आग में डालने को कटोरा थामे बैठे थे उनका वो घी भी. आप गौर से देखें तो महसूस करेंगे कि इस पूरे घटनाक्रम के ऐसे पटाक्षेप से चेहरे तो दरअसल कुछ टीवी चैनल वालों के मुरझाये हुए हैं. वही हैं जो परेशान हैं कि जैसा उन्होंने नहीं चाहा था वो हो कैसे गया.

मुझे करन थापर के आशुतोष से उन्हीं के चैनल पे उन्हीं के सम्पादक से पूछा वो सवाल याद आता है जिसमें उन्होंने जानना चाहा था कि क्या मीडिया ने इस आन्दोलन को ज़रूरत से ज्यादा महत्त्व नहीं दे डाला है. पर,यहाँ तो फिर गनीमत थी. कुछ दूसरों का तो बुरा हाल था. उनका रवैया तो मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त वाला सा था. उनकी भाषा, उनके शब्दों, उनके व्यवहार और उनकी बाडी लेंग्वेज से लगता ही नहीं था कि वे आन्दोलन की कवरेज कर रहे हैं. वे आन्दोलन को बनाते, बढाते लग रहे थे. सवाल पूछते थे, जवाब आने से पहले वैसा ही भड़काऊ सवाल किसी दूसरे पैनलिस्ट को परोस देते थे. उनके शब्द बताते थे लाखों की भीड़. मगर कैमरे वहीं तक पैन लगा के लौट आते थे जहां तक कि भीड़ होती थी.

जो पत्रकार रैलियाँ कवर कवर करते रहे हैं वो जानते हैं कि हर नेता अपनी कुछ हज़ार की भीड़ को लाखों बताता आया है.ये भी कि इसके अलावा और लाखों लोग रास्तों में जाम या पुलिस के नाकों पे रुके हैं. अपना सीधा सा अंकगणित है कि भीड़ बैठी हो तो हर आदमी को कम से चार फुट जगह चाहिए होती है और अगर चार एकड़ यानी सोलह हज़ार फुट भी जगह होतो उसमें आसानी से तो चार हज़ार लोग ही बैठ सकते हैं. लेकिन लाखों लाखों कह कह के जो हौव्वा मीडिया ने खड़ा रखा था सरकार उस से डरी नहीं. हाँ, उस ने बलप्रयोग नहीं किया, ये अलग बात है. और वो भी इस लिए नहीं कि वो डरी हुई थी. बलप्रयोग उसने इस लिए भी नहीं किया क्योंकि वो जानती थी कि इस आन्दोलन से राजनीतिक रूप से और भी बढ़िया तरीके से निबटा जा सकता है. उसने वही किया.

कुछ चैनल चिल्लाते रहे कि अनशन का तीसरा, चौथा, पांचवां दिन हो गया मगर सरकार बात नहीं कर रही. अन्ना की तबियत बिगड़ रही है, बेंगलूर से लेकर मुम्बई तक भीड़ बढ़ रही है, अन्ना की तबियत बिगड़ रही है मगर सरकार को चिंता नहीं है. ये चैनल ये मान के चल रहे थे कि जैसे सरकार को भीड़ या तबियत की कोई जानकारी ही नहीं है. इस लिए छठे और सातवें दिन उनका सुर और भी तेज़, तीखा और फिर कड़वा भी हो चला था. अब उन्हें कौन समझाए कि सरकार के पास भी भीड़ और दूसरी चिंताएं नापने के यन्त्र, तंत्र और संयंत्र होते हैं. वो भी तय करती है कि कब तक किसी भी आन्दोलन को थकाना है. कब आन्दोलनकारी मनाने से भी बातचीत के लिए तैयार नहीं होंगे और कब वे खुद आ के उनकी सुन लेने को कहने, कहलाने लगेंगे. आन्दोलन का भी एक मनोविज्ञान होता है. ऐसे हर द्वंद्व में उस मनोवृति को नापना और भांपना होता है. वो सरकार कर रही थी. याद करें एक समय पर सरकार ने मैदान में पुलिस और रैपिड एक्शन फ़ोर्स लगा दी. फिर रात में किसी ने ये भी कह दिया कि तीन बजे एक्शन होगा. वो उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश थी. अगर आप इमानदारी से अगली सुबह के शाट देखें तो आधी से ज्यादा भीड़ रात ही छंट ली थी. रामदेव की भीड़ के साथ जो हुआ उसकी यादें अभी बहुत पुरानी नहीं थी.

जिस समय अरविन्द केजरीवाल ने प्रणब मुखर्जी से पूछा कि आपने पुलिस क्यों लगाई. क्या आपका पुलिस एक्शन का इरादा है तो उसी समय सरकार समझ गई थी कि उसका फार्मूला काम कर गया. और फिर जब खुद केजरीवाल ने भीड़ को अपना ये डर बताया और भीड़ भी पतली हो गई तो सरकार शेर हो गई. तय तो उसने पहले भी कर रखा मगर अब उसने पक्का भी कर लिया कि संसद में कोई वोटिंग नहीं होगी. संसद के एक बयान के ज़रिये उसने अनशन तोड़ने के लिए एक सम्मानजनक अवसर ज़रूर दिया. वो माना नहीं गया. वही अनशन अब टूट भी रहा है. कोई बताएगा कि अब वो किस उपलब्धि पे? क्या क़ानून बन गया जो 30 अगस्त तक बना देने की जिद की जा रही थी. क्या सरकार का लोकपाल बिल वापिस हो गया जिसे वापिस लेने की शर्त रखी जा रही थी? क्या ये तय हो गया कि बहस सिर्फ जन लोकपाल बिल पर ही होगी? जिस स्टैंडिंग कमेटी को सुझाव देने से आप मना कर रहे थे क्या अब उसी सरकारी बिल के साथ वो सारा मामला आज उसी स्टैंडिंग कमेटी के पास नहीं है? चलिए अगर ये भी मान लें कि संसद में चर्चा तो हुई. पार्टियों के स्टैंड तो स्पष्ट हुए. तो भी, किस पार्टी ने मान लिया है कि सांसद संसद में अपने कार्यकलाप के लिए लोकपाल के दायरे में होंगे. हाँ, प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा और पब्लिक आर्डर के अलावा बाकी कार्यों के लिए लोकपाल के अधीन लाने की बात ज़रूर कही गई है मगर मैं बड़ी ही विनम्रता से कहना चाहूंगा कि अपने संसदीय कार्यों के लिए सांसद को जब लोकपाल से छूट होगी तो क्या प्रधानमन्त्री उस अर्थ में सांसद की परिभाषा में नहीं आएँगे? क्या सोच के खुश हो रहे हो आप? क्या पा के? रही जजों की बात तो एक भी सांसद या पार्टी ने उन्हें लोकपाल के घेरे में लाने की बात नहीं की है. सुषमा जी ने कहा भी है तो ये भी है कि भाजपा ज्यूडीशियल कमीशन के हक़ में है. वो आएगा तो मान के चलिए कि न्यायपालिका पूरी ही उसमें जाएगी. आधी को कोई बाहर रहने नहीं देगा. न तो संसद, और न कल को वो बिल चैलेन्ज हुआ तो सुप्रीम कोर्ट.

अपना ये मानना है कि राजनीति की काट राजनीति से ही होती है. दुर्भाग्य है कि अन्ना के साथ राज्नीतिग्य नहीं थे. थे भी तो किरण बेदी ने घूंघट की आड़ में सब गायब कर दिए. अपनी समझ, सोच और अनुभव से वैचारिक द्रष्टिकोण से लोहियावादियों को इस तरह के जनांदोलन के खिलाफ जाना नहीं चाहिए था. मगर शरद यादव से लेकर लालू यादव तक सभी को वे अन्ना से बहुत दूर ले गईं. ओमपुरी के मीडिया महारथियों पर बेमतलब के कटाक्ष ने मीडिया को भी अपनी गलती का एहसास करा दिया. उसे भी लगा कि अन्ना और उनके जिस आन्दोलन को सरकार, संसद और संविधान के साथ सीधे टकराव से बचा कर जो वो प्रमोट करता आ रहा है तो वो अब उसकी भी इज्ज़त उछालने लगा है. याद करिए ओमपुरी उवाच के बाद मीडिया का भी सुर बदला. अन्ना को उनके साथियों ने ही ‘मरवा’ डाला. ओमपुरी के हो जाने के बाद तो मीडिया ये भी कहने लग गया था कि अगर अनशन लम्बा खिंचने से अन्ना को कुछ हो गया तो कानूनन उन्हें अनशन पे बिठाए रखने वाले जिम्मेवार और सजा के भागीदार होंगे. सरकार की चालों से पहले ही मात खाई अन्ना टीम शनिवार तक मीडिया के भी बदले रुख से मानों पूरी तरह से टूट गई थी. अन्ना की कोई शर्त नहीं मानी जाने के बावजूद अन्ना के अनशन समाप्ति की घोषणा इसी लिए. जाते जाते अन्ना भी संयम खो बैठे. जिसने उनके आन्दोलन को देश नहीं, विश्वव्यापी बनाया खुद उसी मीडिया ने कहा कि उन्हें लालू यादव के खिलाफ उस तरह का कटाक्ष नहीं करना चाहिए था (अन्ना ने कहा कि दस बारह बच्चे पैदा करने वाला ब्रह्मचर्य की उनकी ताकत को नहीं पहचान सकता).

पर, इसका ये मतलब कतई नहीं है कि अन्ना असफल रहे. अच्छा किया अन्ना ने जो फिलहाल आन्दोलन को विश्राम दे दिया. आन्दोलन करने वाले मान के चलते हैं कि ज्यादा मांगो. जितना मिले, उतना ले लो और फिर आगे के लिए स्फूर्त हो के वापसी करो. इस अर्थ में अन्ना कामयाब हैं. उन ने जितना भी कर के जो भी पाया वही कुछ कम नहीं है. भ्रष्टाचार सिर्फ एक लोकपाल से ख़त्म हो जाएगा ऐसा मान लेना गलत होगा. मगर एक जाग्रति उन्होंने पैदा की है. जो सब से बड़ी बात है वो ये कि उनके इस परिश्रम से इस देश में राष्ट्रीयता की एक भावना पैदा हुई है. चलिए ये कामना करें कि अब किसी अन्ना को फिर इसी मुद्दे पर आन्दोलन नहीं करना पड़ेगा. दुबारा कभी कोई आन्दोलन किया भी तो वो इस से ज्यादा परिपक्व होगा.

मगर इस बीच एक आत्मचिंतन तो अन्ना को भी करना पड़ेगा. सोचना पड़ेगा कि एक अलख तो जगाई मगर जस्टिस संतोष हेगड़े जैसों को खोया क्यों?

(लेखक जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम के सम्पादक हैं)

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1 Comment on "अनाड़ियों के अन्ना"

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आर. सिंह
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आपलोगों से जैसी उम्मीद की जाती है आपने वैसा ही लिखा है.सबसे मजेदार तो आपका भीड़ का आकलन है.किसी भी भीड़ में किसी खुश नसीब को ही एक वर्ग फूट की भी जगह मिल पाती हैऔर आप चार फीट की बात कर रहे हैं.मैं मानताहूँ की आपलोगों को यह पच नहीं रहा है की अन्ना हजारे का आन्दोलन क्यों सफलता की और बढ़ रहा है..रामलीला मैदान में कितने लोग खड़े होसकते हैं या बैठ सकते हैं ,यह आंकडा एमसीडी के पास अवश्य होगा.आपने वहां से तो जांच पड़ताल किया नहीं होगा.बिना किसी जोर तोड़ के बारह दिनों तक इतनी भीड़… Read more »
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