लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

अन्ना दल की हिसार-हुंकार ने कांग्रेस को असमंजस में डाल दिया है। हिसार में निर्वाचन का ऊंट किस करबट बैठेगा यह तो फिलहाल वोटिंग-मशीनों के गर्भ में है। अलबत्ता इतना जरूर है कि अन्ना दल के सहयोगियों ने हिसार निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस उम्मीवार के खिलाफ जो प्रचार किया है, उसकी प्रतिच्छाया में कांग्रेस जरूर अनिश्चय और अनिर्णय के भ्रमजाल में भटक गई है। यह स्थिति भी तब है, जब अन्ना खुद चुनाव मैदान में नहीं आए। इस संकट से निजात के लिए दिग्विजय सिंह अन्ना की मुहिम को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सुनियोजित हिस्सा बताने में लगे हैं। वे इस बाबत बतौर प्रमाण संघ के सुरेश जोशी की अन्ना को समर्थन के संदर्भ से जुड़ी चिट्ठी का भी हवाला दे रहे हैं। दूसरी तरफ कानून मंत्री सलमान खुर्शीद लोकपाल विधेयक को संवैधनिक दर्जा देने की बात कहकर परोक्ष रूप से इसे टालने की कवायद में लगे हैं। हालांकि बाद में खुर्शीद ने दिए इस बायान की नजाकत को समझा तो वे मीडिया पर बयान तोड़-मरोडकर पेश करने का ठींकरा फोड़कर मुकर भी गए। इससे जाहिर होता है कि कांग्रेस के रणनीतिकार गफलत में हैं। वे अन्ना से निपटने का कोई ऐसा मारक मंत्र नहीं खोज पा रहे हैं जिसकी सिध्दि अचूक हो।

अन्ना एक ऐसे समझदार समाज सेवी हैं जो कांग्रेस पर दबाव बना लेने के हर अवसर को दबोच लेना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने हिसार उपचुनाव में खंब ठोकने का जोखिम उठा लिया। यदि चुनाव परिणाम के पहले आए आंकलन को सही मानें तो अन्ना दल ने करीब 30 फीसदी मतदाताओं को प्रभावित कर कांग्रेस उम्मीदवार जयप्रकाश को तीसरे नंबर पर खदेड़ दिया है। यह अनुमान यदि मतगणना में भी सही उतरता है तो यह कांग्रेस व उसके सहयोगी दलों के लिए तो सबक होगा ही, अन्य सभी राजनीतिक दलों को भी एक ऐसी नसीहत होगी, जिसके पिरप्रेक्ष्य में अन्ना की बात को कालांतर में किसी भी दल को टालना मुश्किल होगा। यह परिणाम अन्ना आंदोलन की दिशा भी तय करेगा। हो सकता है यह रणनीति कल एक नए राजनीतिक दल के अस्तित्व के रूप में पेश आए। वैसे भी बदलाब के पैरोकारों को जोखिम तो उठाने ही पड़ते हैं। यह परिणाम कांग्रेस के खिलाफ जाता है तो छह माह के भीतर पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की दिशा भी ये नतीजे तय करेंगे। साथ ही इसी शीतकालीन सत्र में एक मजबूत लोकपाल का भी पारित हो जाना सुनिश्चित हो जाएगा। पर्याप्त दबाव बनाए बिना संप्रग सरकार लोकपाल को पास करवाना राष्ट्रीय हित व दायित्व समझने वाली नहीं है।

अन्ना दल के इस अभियान को लेकर नैतिकता के सवाल भी उठाए जा रहे हैं। यह दलील भी दी जा रही है कि एक सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा किसी राजनीतिक दल विशेष के खिलाफ वोट न डालने की अपील करना कहां तक उचित है। क्योंकि अन्ना-आंदोलन का बुनियादी आधार नैतिक था और वह दलगत राजनीति से ऊपर था। लोग अन्ना में महात्मा गांधी की छवि देख रहे थे और गांधी ने दलगत राजनीति को अपने आंदोलन में कभी तरजीह नहीं दी। ये दलीलें बचकानी हैं। गांधी के आंदोलनों पर नैतिकता का प्रभाव तो था ही, लेकिन उनके सभी आंदोलन राजनैतिक बदलाव के लिए राजनीति से ही प्रेरित थे। जिस अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का वे हिस्सा थे, वही आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाला एकमात्र अखिल भारतीय चरित्र का राजनीतिक दल था। जबलपुर में संपन्न हुए कांग्रेस अधिवेशन के दौरान कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का भी चुनाव होना था। इसमें नेताजी सुभाष चन्द्र बोष और पट्टाभि सीतारमैया आमने-सामने थे। इस समय महात्मा गांधी ने सीधे चुनाव में दखल देते हुए सीतारमैया को वोट देने की अपील की थी। हालांकि रमैया हार गए थे। इसलिए गांधी के बारे में ये दलीले व्यर्थ हैं कि वे अनशन और उपवासों के जरिए केवल रचनात्मक राजनीति को महत्व देते थे। लिहाजा हिसार में हुंकार भरना अन्ना की मजबूत नैतिक इच्छाशक्ति की ही परिणति है।

यहां अन्ना दल पर ये सवाल भी उठाए जा रहे हैं कि अन्य दलों के जो उम्मीदवार हैं वे पाक-साफ नहीं हैं। ऐसे में किसी एक दल के विरोध में जाने से उनकी करिश्माई छवि धूमिल होगी। क्योंकि अन्ना ईमानदार चरित्र के उम्मीदवारों को वोट देने की पैरवी करते रहे हैं। लेकिन जब सभी प्रमुख दलों ने ही भ्रष्ट व आपराधिक छवि के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा हो तो मतदाता की चुनने की मजबूरी तो उन्हीं में से किसी एक उम्मीदवार की होगी। इसीलिए अन्ना चुनाव सुधारों के परिप्रेक्ष्य में उम्मीदवार को नकारने का संवैधानिक अधिकार देने की मांग कर रहे हैं।

अब तो उम्मीदवारों की यह विवशता भी हो गई है कि उनकों निर्वाचन नामांकन के समय एक हलफनामा भी देना होता है, जिसमें यह उल्लेख करना जरूरी होता है कि आपकी चल-अचल संपत्तिा कितनी है और आप पर कोई पुलिस प्रकरण तो पंजीबध्द नहीं है। यहां गौरतलब है कि जयप्रकाश के अलावा जो दो अन्य प्रमुख उम्मीदवार कुलदीप विश्नोई और अजय चौटाला हैं, उन दोनों ने ही हलफनामें के साथ जो दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं, उनमें अपने दामन पर लगे दागों का उल्लेख किया है। ये मामले आपराधिक दुष्कृत्यों और भ्रष्टाचार से जुड़े हैं। ये सभी उम्मीदवार ‘आयाराम-गयाराम’ की राजनीति में भी बड़-चढ़कर हिस्सा लेते रहे हैं। यही नहीं यदि इन उम्मीदवारों द्वारा 2009 के लोकसभा चुनाव में और इस चुनाव में दिए शपथ-पत्र में घोषित संपत्तियों की ही तुलना की जाए तो इन दो सालों में इन उम्मीदवारों की संपत्ति चौहदवीं के चांद की तरह परवान चढ़ी है। 2009 में कुलदीप सिंह ने अपनी संपत्ति 17 करोड़ 30 लाख बताई थी, जबकि दो साल के भीतर ही यह बढ़कर 48 करोड़ 58 लाख हो गई। इसी तर्ज पर अजय चौटाला की संपत्ति 29 करोड़ 97 लाख से बढ़कर अब 40 करोड़ 16 लाख हो गई। राजनीति में समय देने के बावजूद संपत्ति में यह इजाफा किन व्यापारिक समीकरणों के बूते हुआ यह अलग अनुसंधान का विषय है। हालांकि चौटाला परिवार पर तो पहले से ही आय से अधिक संपत्ति होने के मामले पहले से ही सीबीआई ने दर्ज किए हुए हैं।

अन्ना दल पर एक बड़ा आरोप दिग्विजय सिंह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का मुखौटा होने का लगाते रहे हैं। हाल ही में उन्होंने सुरेश जोशी की एक चिट्ठी भी मिडिया को पेश की है, जिसमें अन्ना को समर्थन देने की बात लिखी है। यहां सवाल उठता है कि अन्ना को समर्थन न देने की चिट्ठी कोई भी लिख सकता है। अन्ना संघ का हिस्सा हैं यह साबित तो तब होता जब अन्ना संघ या अन्य किसी संगठन से समर्थन मांगते ? दिग्विजय सिंह अन्ना द्वारा संघ प्रमुख को लिखी चिट्ठी पेश करते ? यहां सवाल यह भी उठता है कि यदि अन्ना संघ का सहयोग व समर्थन परोक्ष रूप से ले भी रहे हैं तो भी कौनसा गुनाह कर रहे हैं ? क्या संघ कोई आंतकवादी संगठन है ? या वह प्रतिबंधित कोई गैर कानूनी संगठन है ? आखिर संघ को किस बिना पर कठघरे में खड़ा किया जा रहा है ?

बहरहाल इतना तय है कि हिसार में कांग्रेस हारती है तो केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ बनने जा रहे लोकपाल विधेयक को आसानी से निगल नहीं पाएगी और लोकपाल का मसौदा भी वही कानूनी रूप लेगा, जैसा अन्ना चाहते हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अन्ना को चिट्ठी लिखकर भरोसा जताया है कि उनकी सरकार लोकपाल से और आगे जाकर भ्रष्टाचार के संबंध में व्यापक अजेंडे पर काम कर रही है। इस अजेंडे पर ठीक काम नहीं हुआ तो पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव का अजेंडा बिगड़ जाने का खतरा भी कांग्रेस अनुभव कर रही है। कांग्रेसी राजकुमार राहुल गांधी की बात बनी रहे इसलिए कानून मंत्री चाहते हैं कि लोकपाल को किसी तरह संवैधानिक दर्जा हासिल हो जाए। ऐसा होता है तो मजबूत लोकपाल के लिए यह और अच्छी बात होगी।

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2 Comments on "सवालों के घेरे में अन्ना और असमंजस में कांग्रेस"

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आर. सिंह
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अब जब हिस्सार के चुनाव का परिणाम सामने आ चुका है तो नहीं लगता कि हार जीत का फैसला अन्ना दल के अभियान द्वारा हुआ है,यह भले ही होसकता है कि अन्ना के टीम का पदार्पण वहां नहीं होता तो शायद कांग्रेस उम्मीदवार कि जमानत बच जाती.

SARKARI VYAPAR BHRASHTACHAR
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SARKARI VYAPAR BHRASHTACHAR
‎||ॐ साईं ॐ|| सबका मालिक एक *************************************************** हे मेरे बाबा मेरे मालिक मेरे देश के युवाओ की आत्मा में बसे भगतसिंह,चन्द्र शेखर आजाद,राज गुरु,सुभाष चन्द्र बोस ,खुदीराम बोस ,झाँसी की रानी,माता अहिल्या……..को जगा दो….दया.करो……. ************************************************** ६५ बरस होने को आये रूख नहीं बदला हालात का ,आजादी हमें रात में मिली थी सिलसिला अभी तक जारी है रात का……. ****************************************************आपको सारा षड़यंत्र समझ मे आएगा भारत की दुर्दशा का की कांग्रेस के नाजायज़ बाप अंग्रेज मैकॉले ने क्या कहा था, यह भी समझ मे आएगा की लोग विदेशी कंपनियों के तलवे क्यों चाटते है क्यों उनके सामान,भाषा,संस्कृति को दुनिया मे सबसे… Read more »
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