लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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डॉ. आशीष वशिष्‍ठ

यूपी में राहुल के गुप-चुप दौरों और सक्रियता से बैचेन और घबराई मायावती ने राहुल के कदमों में बेड़ी डालने और मिशन 2012 में अड़ंगे लगाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन लाख कोशिशों और साजिशों के बाद भी मायावती को वांछित सफलता नहीं मिल पायी थी। भट्ठा पारसौल के घटनाक्रम के बाद राहुल की सक्रियता, पदयात्रा और अलीगढ़ के नुमाइश मैदान में किसान पंचायत ने माया सरकार के तंबू-कनात सब एक साथ उखाड़ दिये थे। एक समय ऐसा लगने लगा था कि मायावती राहुल से घबराने लगी हैं। राहुल के नेतृत्व में उत्साहित कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता दुगने जोश के साथ बरसों बाद सड़कों पर माया सरकार से मोर्चे लेते और संघर्ष करते दिखाई दिये। यूपी में बरसों से सुप्त और साइड में लगी कांग्रेस को पुनः जीवित और खड़ा करने का श्रेय राहुल के खाते में ही जाता है। राहुल की सियासी गतिविधियों से घबराई मायावती चाहकर भी राहुल के बढ़ते कदमों को रोक नहीं पायी। लेकिन जो काम यूपी की पावरफुल मुख्यमंत्री और उनके मुंहलगे अफसर मिलकर नहीं कर पाये वो काम अन्ना ने एक ही झटके में कर दिखाया। दिल्ली के रामलीला मैदान में 12 दिन के अनशन के दौरान कांग्रेस की जो भद्द अन्ना ने पिटी उसने पार्टी के लोकप्रियता के ग्राफ को धरातल पर ला दिया है।

 

अन्ना के अनशन से कांग्रेस बेकफुट पर है। कांग्रेसी नेताओं और मंत्रियों ने जिस बचकाने तरीके से अन्ना के अनशन को डील और हैंडल किया, उससे जनता के बीच कांग्रेस की नेगटिव छवि बनी है। राहुल की खामोशी, कांग्रेसी मंत्रियों और नेताओं की कार्यशैली एवं व्यवहार ने आग में घी का काम किया। जब देश के लाखों युवा सरकारी लोकपाल बिल के विरोध में सड़कों पर धरना, प्रदर्शन और अनशन कर रहे थे, उस समय राहुल का खामोश रहना कांग्रेस की राजनीतिक जमीन और सेहत दोनों को खराब कर गया। अनशन के लगभग एक हफ्ते बाद राहुल ने संसद में अपनी जुबान खोली और रटा-रटाया भाषण पढ़कर देश की जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया। अन्ना के अनशन से पहले राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा आम थी कि 2012 में यूपी के विधानसभा चुनावों में राहुल फैक्टर अपना असर दिखाएगा और कांग्रेस का परपंरागत वोट बैंक दलित, मुस्लिम, ब्राह्मण और पिछड़ी जातियां कांग्रेस की ओर लौट आएंगी। लेकिन अन्ना के अनशन ने कांग्रेसियों की उम्मीदों की गागर को फोड़ डाला। बदले हालातों और माहौल में राहुल से घबराई मायावती अब फ्रंटफुट पर है।

 

2009 के आम चुनावों में राहुल और उनकी टीम को यूपी में अच्छे काम का तोहफा सूबे की जनता ने दिया था। राहुल की सक्रियता की बदौलत ही लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के सांसदों की संख्या 9 से 21 पहुंची थी। लेकिन ये कड़वी सच्चाई है कि आम चुनावों के बाद राहुल फेक्टर यूपी के बाहर चूहिया बम ही साबित हुआ। यूपी में दलित गांवों की गुप-चुप यात्राओं और दलितों के यहां खाना खाकर और रात बिताकर राहुल ने पार्टी की छवि को सुधारा था। राहुल की गुपचुप यात्राओं से मायावती को खासी परेशानी थी। सुरक्षा और अन्य कारणों का हवाला देकर माया ने केंद्र सरकार से राहुल के व्यवहार और कार्यषैली की षिकायत की थी। लेकिन इन सब से बेरपरवाह राहुल मिशन यूपी 2012 में लगे रहे। राहुल के साथ उनकी टीम के सदस्य पीएल पुनिया, बेनी प्रसाद वर्मा, रीता बहुगुणा जोषी, दिग्विजय सिंह, प्रमोद तिवारी, जगदंबिका पाल और राजबब्बर राहुल के मिशन को कामयाबी तक पहुंचाने में दिन-रात एक किये हुये हैं। असल में मायावती को ये डर था कि कांग्रेस के प्रति रूझान बढ़ने से उनके किले में सेंध लगना तय है। जिस सोशल इंजीनियरिंग अर्थात दलित और ब्राह्मण वोटों की बदौलत माया ने सूबे में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, वही वोट बैंक किसी जमाने में कांग्रेस की पूंजी और धरोहर हुआ करता था। दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़ी जातियां आजादी के समय से ही कांग्रेस का पक्का और मजबूत वोट बैंक रही है। अस्सी के दशक में क्षेत्रीय राजनीति के पांव पसारने से कांग्रेस का वोट बैंक धीरे-धीरे उससे खिसकता चला गया।

 

दिल्ली के सिंहासन का रास्ता वाया यूपी होकर जाता है। हर दल को ये बात बखूबी पता है कि अगर केंद्र की सत्ता हासिल करने के लिए यूपी को फतह करना लाजिमी है। सोनिया और राहुल दोनों यूपी से ही सांसद हैं। राजनीतिक गुणा भाग और नफे-नुकसान को समझकर ही राहुल खास रणनीति के तहत यूपी में अपनी पूरी ताकत झोंके हुये हैं। राहुल के प्रयास रंग दिखाने भी लगे थे। राजनीतिक गलियारों से आम आदमी के बीच कांग्रेस की छवि धीरे-धीरे सुधरने लगी थी। सूबे की जनता और राजनीतिक समझ रखने वाले सूबे में कांग्रेस को टक्कर देने वाली पार्टी के तौर पर देखने लगे थे। भट्ठा पारसौल की घटना ने तो कांग्रेस को मायावती को घेरने का सुनहरा मौका दे दिया था। राहुल और कांग्रेस पार्टी ने भट्ठा पारसौल पर जमकर राजनीति की। भारी सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर राहुल का मोटरसाइकल से किसानों के बीच पहुंचना, पदयात्रा और किसान महापंचायत करके माया की मिट्टी पलीत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

पहले से ही घोटालों, घपलों, भ्रष्टचार, और अपनी पार्टी के सांसदों, विधायकों और मंत्रियों की करतूतों से परेशान मायावती की रात की नींदे राहुल ने हराम कर दी थी। प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था, दर्जनों बलात्कार की घटनाओं और सीएमओं हत्याकांड में बसपा सरकार के दो सीनियर मंत्रियों के नाम उछलने से सरकार की छवि को पूरी तरह धो कर रख दिया था। एकाएक बदले राजनीतिक माहौल ने बसपा और सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया था। माया के पास विपक्ष की ओर से हो रहे लगातार वार का जवाब देने की ताकत चुकती नजर आ रही थी। कांग्रेस ने माया सरकार को हर छोटे-बड़े मुद्दे पर घेरने की रणनीति बनायी थी।

अन्ना के अनशन के दौरान और उसके बाद उपजे हालातों ने कांग्रेस की साख को गिरा दिया है, जिसका सीधा असर यूपी में दिखाई देने लगा है। जो मायावती कल तक मुंह बंद किये बैठी थी अब वो कांग्रेस को घेरने और वार करने का मसाला जुटा चुकी है। ऐसा भी नहीं है कि माया अन्ना का समर्थन में खड़ी थी, बल्कि माया ने तो सिविल सोसायटी को चुनाव लड़ने की सलाह दी है। असल में अन्ना के अनशन के दौरान जो कुछ भी घटा उससे आम आदमी को ऐसा लगा कि कांग्रेस के मंत्री और नेता सिविल सोसायटी और देश की जनता के विरोधी हैं और उन्हें जनभावनाओं की कोई कद्र नहीं है। सिविल सोसायटी और सरकार के मंत्रियों के बीच जो वाकयुद्ध और शब्दबाण चले उसने सरकार की छवि को गहरी ठेस पहुंचाई है। यूपीए के घटक दलों की चुप्पी का नुकसान भी सीधे तौर पर कांग्रेस को पहुंचा। यूपीए का सबसे बड़ा घटक कांग्रेस के होने के नाते सारे किये धरे का ठीकरा कांग्रेस के माथे ही फूटा है। अन्ना के अनशन से कांग्रेस की जनविरोधी, हठी और तानाशाह छवि का निर्माण आम आमदी के बीच हुआ है।

कांग्रेस के लिये यूपी में मजबूत होना उसके वर्तमान और भविष्य दोनों के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। सन 2012 में यूपी के अलावा उत्तराखण्ड, पंजाब, गोवा और गुजरात में भी विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में यूपी के साथ दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। यूपी में तो कांग्रेस अपने को दूसरी पोजीशन पर समझ रही थी और कांग्रेसियों को उम्मीद थी कि वो बसपा और सपा को कड़ी टक्कर देकर धमाका करेगी। लेकिन अन्ना के अनशन ने उसकी बनी बनाई छवि और मेहनत पर पानी फेर दिया है। माया को इस बात का एहसास है। कांग्रेस डैमेज कंट्रोल की कार्रवाई में जुट चुकी है। अन्ना को गेटवेल सून और अस्पताल में फूल भेजकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की जनता को ये संदेश देने की कोषिश की थी सरकार आम आदमी के साथ खड़ी है करप्शन के साथ नहीं। लेकिन बीता हुआ समय वापिस नहीं आता है। अन्ना के अनशन को जिस नासमझी से सरकार ने डील किया वो कांग्रेस की छवि को जाने-अनजाने में धूमिल कर गया। यूपी में कांग्रेस की बढ़ती लोकप्रियता और रूझान से परेशान और चिंतित मायावती के लिये ये किसी गुड न्यूज से कम नहीं है कि कांग्रेस विरोधी देशभर में चल रही है, जिसका सीधे तौर पर लाभ आगामी विधानसभा चुनावों में बसपा को मिलेगा।

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2 Comments on "अन्ना ने मायावती की राह आसान कर दी"

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आर. सिंह
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आपलोगों को गलतफहमी है की अन्ना हजारे और उनकी टीम ने केवल केंद्र सरकार या कांग्रेस के विरुद्ध मोर्चा खोला है.उन्होंने तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा खोला है.यह तो कांग्रेस या केंद्र सरकार की नादानियत का परिणाम है की वे लोग सीधे इसके निशाने पर आगये हैं.कपिल सिब्बल या चिदम्बरम या मनीष तिवारी जब अन्ना या उनके टीम के विरुद्ध आग उगल रहे थे तो उन्होंने कैसे सोच लिया की वे खुद उसमे नहीं झुलस सकते है.अगर उन्होंने आरम्भ से ही सब राजनीतिक पार्टियों से मशविरा करके कदम बढाये होते आज हमाम में सब नंगे नज़र आते.बाद में अवश्य उन्होंने… Read more »
anil gupta
Guest

अन्ना हजारे और उनकी सिविल सोसायटी के लोगों ने केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता पैदा की है. लेकिन आज की तारीख में यु पी में जो नंगा नाच हो रहा है वह क्या उनको दिखाई नहीं दे रहा है या वो देखना नहीं चाहते हैं? यदि वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़नी है तो उत्तर प्रदेश में उसकी सबसे ज्यादा आवश्यकता है. अन्ना जी उत्तर प्रदेश का एक सघन दौरा कर लें साड़ी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी.

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