लेखक परिचय

श्याम नारायण रंगा

श्याम नारायण रंगा

नाथूसर गेट पुष्करना स्टेडियम के नजदीक बीकानेर (राजस्थान) - 334004 MOB. 09950050079

Posted On by &filed under विविधा.


श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’ 

पूरे देश में अभी अन्ना के आंदोलन की गूंज है। जिसे देखो वो अन्ना के समर्थन में नारे लगाता दिखाई दे रहा है। जनाब ये लोकतंत्र है यहॉं जनता का राज है सो आंदोलन होना और उसमें लोगों का जुड़ना लोकषाही का एक तरीका है। तंत्र की कोई व्यवस्था अगर लोक को पसन्द ना आए तो लोक को अधिकार है कि वह अपने ही तंत्र की खिलाफत कर सकता है। वर्तमान में विश्‍व के सबसे बड़े लोकतंत्र में अन्ना हजारे अपने ऐसे ही लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करके लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं।

वैसे कहने वाले लोकतंत्र को भीड़तंत्र भी कहते हैं और कभी कभी लगता है कि वास्तव में यह भीड़तंत्र ही है। संगठन और भीड़ में फर्क होता है। भीड़ भेड़ की तरह होती है जैसे कोई एक व्यक्ति करता है वैसे ही लोग करने लगते हैं सो अभी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है कि अन्ना हजारे के साथ यही भीड़ शामिल हो रही है। मेरे करने का मतलब यह कतई ना समझा जाए कि अन्ना का मुद्दा गलत है, मेरा कहना है कि अन्ना जो मुद्दा उठाया है भ्रष्टाचार का वास्तव में वह एक गंभीर और सही मुद्दा है जिससे वर्तमान में भारतीय लोकतंत्र को काफी नुकसान हो रहा है परन्तु यहॉं यह भी समझाना होगा कि हमारे देश में संविधान सबसे बड़ा है और संविधान से ऊपर कोई नहीं है। हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान का प्रारूप कुछ ऐसा बनाया कि संविधान की सर्वोच्चता ही सबसे ऊपर रखी गई, न कोई व्यक्ति, न कोई पद और न ही कोई संस्था संविधान से बड़ी है और न हो सकती है। यहॉं तक कि संविधान बनाने वाली भारत की जनता भी संविधान से ऊपर नहीं है। भारत के संविधान का निर्माण भारत की महान् जनता ने ही किया है और संविधान की प्रस्तावना में हम भारत के लोग ही भारत के संविधान को अंगीकार और स्वीकार करते हैं।

विभिन्न न्यायिक निर्णयों में समय समय पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारत के संविधान में परिवर्तन किया जा सकता है लेकिन किसी भी सूरत में इस संविधान की मूल भावना में परिवर्तन नहीं किया जा सकता और यहीं से शुरू होती है अन्ना हजारे की बात की अगर जनलोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट को ले लिया गया तो यह संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा। हमारे संविधान में किसी भी पद या व्यक्ति को सुप्रीम नहीं रखा गया है। हमारे संविधान का मूल भाव यह है कि हमारे देश में लोकतंत्र हर हाल में कायम रहे। हम किसी भी समस्या का सामना करने को तैयार है लेकिन किसी भी सूरत में लोकतंत्र पर हमला हो ऐसी कोई व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। हमारे संविधान में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि लोकतंत्र की रक्षा हर हाल में हो। विश्‍व के सबसे बड़े लिखित भारतीय संविधान में सामान्य तौर पर यह व्यवस्था देखने को मिलती है कि जो व्यक्ति किसी व्यक्ति को नियुक्त कर सकता है वह व्यक्ति उसे अपने पद से हटा भी सकता है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति करने का अधिकार राष्ट्रपति को है तो वह उसे हटा भी सकता है लेकिन कुछ संवैधानिक पद ऐसे रखे गए हैं कि उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करता है लेकिन हटाने का अधिकार राष्ट्रपति को नहीं दिया गया है जैसे सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त, संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष। क्योंकि अगर इनको हटाने का अधिकार राष्ट्रपति को दिया जाता तो भारतीय लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता। राष्ट्रपति जिसे चाहे हटा देता और तानाषाह बन जाता और इससे न्यायपालिका की संप्रभुता खतरे में पड़ जाती। वर्तमान में जिस जन लोकपाल की बात की जा रही है उसमें यही बात लग रही है कि एक ऐसा व्यक्ति जो प्रधानमंत्री व न्यायपालिका की मॉनिटरिंग करेगा उसके पर निगरानी रखेगा मतलब ऐसा व्यक्ति न्यायापलिका व कार्यपालिका के ऊपर का होगा जो कि भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरे की बात है और ऐसा करना असंवैधानिक होगा।

हमारे संविधान में भारत को एक संप्रभु राष्ट्र बनाया गया है। राष्ट्र की संप्रभू शक्ति का प्रयोग न्यायपालिका में न्यायपालिका करती है और प्रधानमंत्री भी इसी संप्रभु शक्ति का प्रतीक है और किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता पर कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता यह एक महत्वपूर्ण बात है। जनलोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री और न्यायपालिका के आने से यह संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी जो कि किसी भी गणतंत्रात्मक राष्ट्र के लिए सही नहीं कही जा सकती ।

एक बात ओर जो इस आंदोलन व अन्ना हजारे को लेकर गौर करने की है कि भारतीय लोकतंत्र में कानून बनाने की शक्ति संसद को दी गई है जिसमे राष्ट्रपति, लोकसभा, राज्यसभा शामिल है। इनके अलावा किसी भी संस्था या व्यक्ति को कानून बनाने का अधिकार नहीं है। अन्ना हजारे की यह जिद्द ही कही जाएगी कि वो जो कह रहे हैं वहीं कानून बने हॉं इतना जरूर है कि उनकी बात को संसद के सामने रखा जा सकता है और अगर इस देश की संसद को सही लगता है तो कानून बनाया जा सकता है। अतः किसी भी कानून को बनाने की जिद्द को संवैधानिक नहीं कहा जा सकता है। प्रत्येक कानून के बनने की एक प्रक्रिया है और उसी से कानून का निर्माण होता है बाकी सारी बाते जिद्द मानी जाएगी।

लोकतंत्र में आंदोलन, धरना, प्रदर्शन होना गलत नहीं है और यह तो मजबूत लोकशाही की निषानी है। अतः इस बात के लिए अन्ना हजारे धन्यवाद के पात्र हैं कि उन्होंने पिछले कईं दशकों से सोई इस देश की जनता की तंद्रा को भंग करने का काम किया। लोगों को आज जेपी याद आ रहे हैं और लोकषाही में लोगों का चिंतन मजबूत लोकतंत्र का निर्माण करता है। मगर अन्ना हजारे को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में लोगों की चुनी सरकार के नुमाइंदे ही कानून बनाते हैं और लोक के इस तंत्र को चलाने की जिम्मेदारी इनको ही जनता ने सौंपी है। अतः आम जन अपने ही बनाए तंत्र में विश्‍वास रखें और अगर तंत्र पर विश्‍वास न हो तो समय आने पर तंत्र बदल दें यह ताकत है लोक की।

Leave a Reply

2 Comments on "अन्ना का आंदोलन और संविधान"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
vivek
Guest
रंगा जी का लेख वही घिसीपिटी बातें कह रहा है जो सरकारी लोग कह रहे थे अब तक ? क्या ५ वर्ष तक केवल जन प्रतिनिधियों के भरोसे छोड़ रख दिया जाये ?ये सारे तथाकथित प्रतिनीधि कई गलत से दिखने वाले मामलों पर इतनी बेशर्मी से एक हो जाते हैं कि जनता हतप्रभ रहने के आलावा कुछ नहीं कर सकती ! c.w.g.मामलें में यदि कोई प्रधानमंत्री कार्यालय को जिम्मेदार बता रहा है तो क्या जाँच नहीं होनी चाहिए ? संविधान बनाने वाला क्या संविधान से छोटा हो सकता है ? ये तो ऐसी बात है जेसे कुछ अनुसूचित वर्ग के… Read more »
vivek
Guest
संसदीय सर्वोच्च्च्ता किस हद तक ? संसद के कानून बनने के अधिकार को चुनोती कहाँ दी जा रही है ? कानून बनने का अधिकार याने उसे पारित करने का काम !ये तथाकथित जन प्रतिनिधी करें न भाई-उन्हें कोई नहीं रोक रहा है ! सवाल ये है कि मूल कानून के ड्राफ्टिंग किसके द्वारा हो ? इसमें किस किस का कब योगदान हो ? संसदीय सर्वोच्चता के समर्थक (जो राज्यसभा से ज्यादातर हैं ? या दंदफंद से चुनाव जीतने में माहिर हैं ) ड्राफ्टिंग का अधिकार संसद के बाहर नहीं देना चाहते और इसके समर्थन में तर्क जो सिब्बल सा. ने… Read more »
wpDiscuz