लेखक परिचय

जगमोहन फुटेला

जगमोहन फुटेला

लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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जगमोहन फुटेला

कैफ़ी साहब ने पूछा था कि यही दुनिया है तो ऐसी ये दुनिया क्यों है?…दुनिया भी जानना चाहती है कि अरविंद केजरीवाल ऐसे हैं तो ऐसे क्यों हैं. जिम्मेवारी उनके प्रति संसद की है तो फिर जिम्मेवारी उनकी भी है उन लोगों के प्रति जिन्हें वे बताते हुए घूम रहे हैं कि संसद ऐसी है तो ऐसी नहीं होनी चाहिए. इस लिए और भी ज़्यादा कि व्यवस्था को बदल देने का दम वे अपने बूते पे नहीं, लोगों के पैसे के दम पर भर रहे हैं.

वे वोट न बनवाएं. कोई बात नहीं. ये उनके निजी मामला है. वे वोट देना मुनासिब न समझें ये भी उनकी पसंद, नापसंद है. वे वोटर लिस्ट में नाम नहीं होते हुए भी एक जहाज़ की टिकट खराब कर दूसरे की टिकट खरीदें दूसरों के पैसे से, ये बर्बादी है. किसी भी बूथ की वोटर लिस्ट में नाम नहीं होने का पता होते हुए भी किसी एक पे खड़े होकर वोट डालने आ गया बताएं, ये नौटंकी है. अपने को जानबूझकर मताधिकार से वंचित रखते हुए वे देश भर को वे व्यवस्था परिवर्तन का संदेश दें, ये मज़ाक. और गैर राजनीतिक मकसद से शुरू हुए आन्दोलन के लिए चंदा उगाही कर चुनावी सभाएं कर संसदीय संस्थाओं को गरियायें तो ये लोकतंत्री प्रणाली का अपमान है.

पता होना चाहिए उन्हें कि किसी भी मुद्दे पर, किसी भी मुहिम के लिए, किसी भी समाज में, कैसा भी अलख जगाने के लिए एक सहज स्वीकृति अनिवार्य होती है. अपना मानना है कि जो धन उन्हें मिला है वो किसी भी चुनावी अभियान में किसी भी तरह की सक्रिय शिरकत के लिए नहीं है. वे फिर भी ऐसा करते हैं तो फिर वो किसी पेड पत्रकारिता की तरह अपराध है और हर तकनीकी पहलू से चुनाव खर्च और आयकर के दायरे में उसकी सार्वजनिक घोषणा के उपयुक्त भी. आप केवल इस लिए इस से छूट नहीं पा सकते कि आपकी कोई पार्टी या उम्मीदवार नहीं था. ये अगर ऐसा है तो और भी गंभीर मामला है.

आप रोटी हो या बच्चे के लिए किसी स्कूल या अस्पताल का चयन, विकल्प दिए बिना ये नहीं कह सकते कि ये खराब है. कल किसी के भी हार जाने पर आप ये कह के वाहवाही का दावा नहीं ठोक सकते कि देखो ये हमने किया. हिसार की तरह. माइलेज अगर आपको पालिटिकल लेनी है तो फिर पालिटिक्स आप कर रहे हैं. और वो आप कर रहे हैं तो फिर उसके तमाम तामझाम, कीचड और आरोपों से भी आप बच नहीं सकते. इसी पोर्टल पर ‘जनसत्ता’ के अपने अंबरीश कुमार का लेख ‘कौन बचा लिवाल’ पढ़ने के बाद मैंने पाया लोग आप पे तोहमत लगा रहे हैं कि आप दबंगों के सामने दुबक जाते हैं. हिसार के उपचुनाव में मुझे सैंकड़ों लोग मिले जो कहते थे कि वहां कांग्रेस के खिलाफ चुनाव प्रचार करने आपकी टीम एक पार्टी से मोटी रकम लेकर गई थी. लोग ये भी कहते हैं कि उसके बाद रतिया विधानसभा के उपचुनाव में आपने एक दूसरी पार्टी से उस से भी मोटी रकम ली और इसलिए वहां नहीं गए आप?

हो सकता है, ये गलत हो. लेकिन लोग मानते ऐसा ही हैं. जैसे अब और जगहों पे ये कि आप सिर्फ कांग्रेस का बैंड बजाने के लिए निकले हुए हैं. लोग क्या, अन्ना खुद कह चुके हैं कि कांग्रेस के खिलाफ प्रचार उनकी टीम करेगी. राहुल मेरा भतीजा नहीं है, सोनिया मौसी नहीं. मगर फिर भी क्या बताएँगे आप कि कांग्रेस ने ही ऐसी कौन सी भैंस खोल रखी है आपकी? झूठा सच्चा, आधा अधूरा कैसा भी एक लोकपाल बिल लाई तो थी वो लोकसभा में. राज्यसभा में बहुमत नहीं था उसका फिर भी हिम्मत जुटाई. मगर बाकियों का क्या? उनका जो बिल तक फाड़ के चले गए? जिन ने फाड़ा उनके बिहार में जाके करी आपने कोई सभा? हुई हिम्मत उनको वहां जा के गरियाने की? कांग्रेस को गरियाना आसान था क्योंकि कांग्रेस सह रही थी.

 

 

लेकिन क्रिकेट की एक कहावत है- कोई भी गेंदबाज़ उसी हद तक अच्छा गेंदबाज़ होता है जहां तक एक अच्छा बल्लेबाज़ उसको अच्छा होने की इजाज़त दे. अभी परसों ही विराट कोहली ने मलिंगा को बताया ही है. आप अभी तक अच्छे चंदा उगाहक, कार्यकर्ता, संगठक और आन्दोलनकारी हो. क्योंकि कांग्रेस आपको ऐसा करने दे रही है. आप हो, नहीं हो. कांग्रेस वाले पक्के पालिटिशियन हैं. उन्हें पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव लड़ने थे और वैसे भी सुकरात बता गए हैं उन्हें कि-सर्वाधिक लोकप्रिय गीत जल्दी ही बाज़ार से गायब हो जाता है और एकाएक आई बाढ़ उतनी ही तेज़ी से उतर भी जाती है… बाढ़ उतर गई है.नशा भी. आज हालत क्या है? आप आरोपों में घिरे हैं. जिस मीडिया ने कभी आपको भगवान् बनाया वो आपका जहाज़ छुडवाता है. वोटर लिस्ट में नाम नहीं होने के बावजूद आपको पोलिंग बूथ पे बुलाता है. और जब वहां आप का नाम नहीं मिलता लिस्ट में तो आपका बैंड बजाता है. देख लेना, चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस क्या कोई भी पार्टी आपको अब उतनी भी घास नहीं डालेगी. न मीडिया.

 

 

अपनी समझ से असल में आपकी सोच और रणनीति में कुछ मौलिक विरोधाभास हैं. आपका आन्दोलन जंतर मंतर तक किसी भी चैनामैन स्क्वेयर या तहरीक चौक से कम करंट वाला नहीं था. एक जोशो जूनून था पूरे देश में. हालांकि आपकी उस भीड़ में भी बहुत से लोग ऐसे भी रहे होंगे जो किसी न किसी रूप में भ्रष्ट रहे होंगे. मगर जैसी भी सही, भीड़ तो थी. हालांकि ये भी एक अलग बहस का विषय का विषय है कि क्या हमेशा भीड़ सही और सच में ही वो उसे लाने वाले की शक्ति का प्रतीक होती है. मगर मोमेंटम तो था ही. सरकार सुन रही थी. जेटली, शरद बाबू और कामरेड राजा जैसे नेता तो आये भी थे मंच पर. लेकिन क्या हुआ केजरीवाल भाई कि वे सब भी नज़रें बदल गए? क्या ज़रूरत थी बहन किरण बेदी को घूंघट की आड़ में वो जलवा बिखेरने की?

 

 

चुनाव आते ही भीड़ में शामिल लोगों को अपने अपने दल के साथ और चुनाव से हो सकने वाले अपने धंधों में जुट जाना था. गाने वालों को गाने जाना था. पोस्टर छापने, लगाने वालों को उस काम में. कुछ को अपने दद्दा भैया के चुनाव में वोट मांगने, कुछ को नारे लगाने और कुछ को रैली के बाद बच रहे झंडे लूटने. आपके और मनीष सिसोदिया के अलावा शायद एक आदमी नहीं होगा जिसने इस चुनाव में किसी न किसी के लिए वोट माँगा या दिया न हो. ‘अब तक छप्पन’ के नाना पाटेकर के शब्दों में कहें तो ये स्ट्रेंथ है लोकतंत्र की. जिसे आप संसद और सांसदों को गरिया गरिया कर कमज़ोर करने पे तुले हैं. मेरा ये स्पष्ट मानना है कि अपना वोट बनवाने से लेकर डालने तक आप गंभीर इस लिए नहीं थे कि आप के मन में इस देश की संसद या विधानसभा जैसी लोकतंत्री संस्थाओं के लिए कोई सम्मानही नहीं है. वरना ये कैसे हो सकता है कि आप नौ साल पुराना वोटर आई कार्ड लेकर घूमते रहे और पोलिंग बूथ पे जाएँ ये खूब अच्छे से पता होने के बावजूद कि आपका तो नाम ही नहीं है वोटर लिस्ट में. सुबह सवेरे इसी लिए निकल लिए थे आप घर से. गोवा जाने का कार्यक्रम भी शायद इसी लिए बना हो. घर पे रहते तो कोई भी तर्जनी देख कर पूछ सकता था- केजरीवाल जी, वोट नहीं दिया आपने?

 

 

मेरे शब्द जितने भी तीखे हों. लहजा जितना भी तुर्श. लेकिन इमानदारी से मैं निराश ज़रूर हूँ, देश के लाखों लोगों की तरह. भ्रष्टाचार है. ये जीवन की सच्चाई है और इस देश की त्रासदी. आज़ादी के बाद अन्ना के रूप में कोई माई का लाल उठा था सत्ता और व्यवस्था से टकराने को. उस अर्थ में इस आन्दोलन को जेपी के आन्दोलन से भी बड़ा और परिवर्तनकारी होना चाहिए था. लेकिन सब लस्सी हो गया. ये तो पता था कि सत्ता कुचलने का काम करेगी. ये मगर नहीं पता था कि आप राजनीति करने लगोगे. चुनावी सभाओं में जाओगे. अपनी प्रतिष्ठा दांव पे लगाओगे. बता तो दो भाई कि कांग्रेस ने इन पांच में से तीन राज्यों में सरकार बना ली और और बाकी दो में भी पहले से बेहतर कर गई तो आप किसको क्या मुंह दिखाओगे?

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4 Comments on "चुनाव के रण में चित तो होगा अन्ना का आन्दोलन !"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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फुटेला जी अब आप क्या मुंह दिखाओगे?

Sanjay
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आज चुनाव परिणाम आने के के बाद तो तुम जैसे
चमचे ये तो जान गए होगे की कांग्रेस का रथ तो बिखर चूका है .राग दरबारी गा कर अपना और दूसरों का वक़्त बर्बाद न करें. महाचोरों की वकालत से जल्दी पद्म विभूषण प्राप्त करोगे.

डॉ. राजीव कुमार रावत
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डॉ. राजीव कुमार रावत

बहुत अच्छा फुटेला जी, आप अपने लेखन में कितने सफल हुए यह तो आप को पार्टी विशेष से मिलने वाली चारण भाट पुरस्कार की राशि से ही पता लगेगा।

आर. सिंह
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जगमोहन फुटेला जी आज भी आप वहीं हैं ,जहां पहले थे यानि आप आज भी भ्रष्टों के दलाल मात्र हैं,पर अंतर इतना ही है कि केजरीवाल की एक गलती से आपका इतने दिनों से बंद मुंह फिर खुल गया.केजरीवाल ने वोट दिए बिनायात्रा पर जाना चाहा यह उनकी बहुत बड़ी गलती है,पर उससे भी बड़ी गलती है किउन्होंने यह पता लगाने का प्रयत्न नहीं किया कि उनका नाम मतदाता सूची में है या नहीं.पर इन गलतियों के लिए केजरीवाल को दोषी मानने से ही आप का पेट नहीं भरा.आपने तो बिना प्रमाण के उन पर कीचड उछालना आरम्भ कर दिया… Read more »
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