लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ‘शादाब’

आज सड़कों पर खिले ये सैकड़ो नारे न देख…….

दुष्यंत जी के परिवार से मेरा संबंध काफी पुराना है। में जिस अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था से लगभग पच्चीस सालो से जुड़ा हॅू उस का गठन हम लोगो ने दुष्यंत जी के जन्मदिवस के अवसर पर एक सितंबर 1986 को किया था। इस के अलावा मैने और दुष्यंत जी के करीबी कवि मनोज त्यागी जी ने लगभग 15 वर्ष पहले दुष्यंत स्मृति संस्थान का गठन भी किया और हर वर्ष दुष्यंत जी की पुण्यतिथि व जन्म दिन पर हम लोग नजीबाबाद में कवि सम्मेलन व दुष्यंत सम्मान समारोह के आयोजन करते है। जिस में दुष्यंत जी के अनुज मुन्नू जी, समधी कम्लेशवर जी, पुत्र आलोक सहित इन के परिवार के कई लोगो से मुझे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आधुनिक हिंदी ग़ज़ल के पुरोधा दुष्यंत कुमार के रूप में 30 दिसम्बर 1975 को भले ही हिंदी साहित्य के एक युग का अंत हुआ हो भले ही दुष्यंत 42 साल की उम्र में मौत के हाथो छले गये हो पर इस शायर को जीवन भर कड़ियल जुबान वाले जनवादी कवि का रूतबा हासिल था। ये दुष्यंत ही थे कि जिन्होने इस मुश्किल दौर में भी अपनी वाणी और कलम की धार को धीमी नही पड़ने दिया। और इमरजेंसी में ही सरकार पर यू कह कर व्यंग्य किया ‘ मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। समाज में जो कुछ भी उन्हे गलत दिखता था उन को कलम चीख चीख कर उस हकीकत को जमाने के सामने बयां किये बगैर आराम से नही बैठता था। ‘एक चिंगारी कही से ढूंढ के लाओ दोस्तो,इस दिये में तेल सी भीगी हुई बाती तो है।’ यहा तो सिर्फ गूंगे बहरे लोग बसते है, खुदा जाने यहा पर किस तरह जलसा हुआ होगा।’ सिर्फ हंगामा खड़ा करने मेरा मकसद नही, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिये, जैसे अमर शेर आग बन कर उन के मुँह से निकलते थे।

नजीबाबाद तहसील के राजपुर नवादा में एक सितंबर 1933 को एक जमीदार परिवार में जन्मे दुष्यंत कुमार ने गांव में ही प्राथमिक शिuक्षा ली। इन्होने उच्च शिक्षा चंदौसी से प्राप्त की बहुत छोटी उम्र में दुष्यंत जी ने परदेसी नाम से अपनी साहित्यिक सोच, विचारो की अभिव्यक्ति को कलम के जरिये कागज पर उतारना शुरू कर दिया था। ग्रामीण परिवेश के होने के कारण हर साल जब गांव में रामलीला होती तो दुष्यंत गांव की रामलीला में लक्षमण का किरदार निभाया करते थे जिसे आज भी राजपुर नवादा के लोग रामलीला के दिनो में याद कर लिया करते हैं। दुष्यंत के अन्दर व्यवस्था के खिलाफ किस प्रकार की आग भरी थी और किस ने भरी थी इस राज पर से पर्दा आज तक नही हट पाया। क्यो की दुष्यंत समाज के होकर भी हर वक्त समाज से बगावत करते नजर आते थे। व्यवस्था के खिलाफ खड़े मिलते थे, आम आदमी के दुख दर्द में शरीक रहते थे, अपनी साहित्यिक सोच, लेखनी, के जरिये हमेशा व्यवस्था एंव समाज के आर्थिक ढांचे में परिवर्तन के लिये अपने शेरो विचारो कि क्रांति से समाज में ऊथल पुथल मचाये रहते थे। भोपाल में तो उन के बारे में ये मशहूर था कि यदि हफ्ते दस दिन भेपाल में कोई शोर शराबा या हो हल्ला नही हुआ तो समझो दुष्यंत भोपाल में है ही नही वो बाहर गये है। ‘ कल नुमाईश में मिला वो चीथड़े पहने हुए, मैने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान हॅू’। न हो कमीज़ तो पावो से तन को ढंक लेगे, ये लोग कितने मुनासिब है इस सफर के लिये’। आज भी सूनने वालो को अन्दर तक झकझोर देती है। ‘ अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे है।’ आज सड़को पर खिले ये सैकड़ो नारे न देख, घर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख’। जैसी रचनाओ को जन्म देकर दुष्यंत ने लोगो से समय के साथ चलने का आहृवान किया।

दुष्यंत गजल कहते ही नही थे वो गजल को जीते भी थे। अपने कहे एक एक शब्द पर अमल करते थे। किसी को दुखी और परेशान वो नही देख सकते है। यू तो उन की जिंदगी के कई किस्से मुझे याद है पर इस वक्त आप को एक किस्सा सुनाता चलू। दुष्यंत रोज शाम को अपने दोस्तो के साथ बैठ कर देश के ताजा हालात पर चर्च कर अपने दिल और जहन को तरोताजा किया करते थे। दोस्तो संग हंसने बोलने से उन के मन का कुछ बोझ हल्का होता था। एक दिन जब वो देर रात को घर लोटे तो कड़ाके की सर्दी की रात में एक अन्जान व्यक्ति उन के दरवाजे के पास बैठा कांप रहा था। दुष्यंत जी ने उस से पूछा क्या बात है वो रोने लगे और रोते रोते उसने अपनी साथ पुलिस द्वारा की गई ज्यादती के बारे में दुष्यंत जी को सब बताया। दुष्यंत जी उस के साथ उसी वक्त थाने लेकर गये और उस गरीब अंजान व्यक्ति की वजह से पुलिस वालो से लड़े और उसे हक का वाजिब हक दिलाया।

दुष्यंत कुमार ने हिंदी गजल के जनक के रूप में भी हिंदी साहित्य पटल और लोगो के दिलो में अपना नाम दर्ज कर एक अमिट छाप छोड़ी। उन्होने अपनी 42 साल की छोटे सी जिंदगी के सफर में शिक्षा विभाग के कई पदो को सुशोभित करने के साथ आकाशवाणी से जुडते हुए भोपाल आदि केंद्रो पर अपनी सेवाएं दी। उनके गजल संग्रह में ‘साए में धूप’ ,‘ सूर्य का स्वागत’, को विशेष ख्याति मिली। उन की कृतियो में ‘आगन में एक वृक्ष’, ‘छोटे छोटे सवाल’, उपन्यास, प्रसिद्व रेडियो नाटको में ‘ और मसीहा मर गया’, खंड काव्य में ‘एक कंठ विश पाई’,‘ जलते हुए वन का वसंत’, आवाज के घेरे में प्रमुख कृतिया है। वही हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिये, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये’। अरूणाचल प्रदेश के इंटर के पाठयक्रम में सम्मलित है। 27 सितम्बर 2009 को भोपाल के डाक विभाग ने एक भव्य समारोह आयोजित कर दुष्यंत जी की याद में दुष्यंत पर पांच रूपये का डाक टिकट जारी किया। दुष्यंत जी आज हमारे बीच नही है ऐसे मुझे कभी महसूस ही नही होता क्यो की दुष्यंत जी का छोडा साहित्य उन के आग उगलते शेर समय समय पर मेरा मार्ग दर्शन करते रहते है। आप उन की पुण्यतिथि पर उनको मेरी ओर से भावभीनी श्रद्वांजलि।

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