लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

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लोकेन्‍द्र सिंह राजपूत

कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की स्थिति दलदल में फंसे उस आदमी की तरह हो गई है, जो दलदल से बाहर निकलने के लिए जितना हाथ-पैर मारता है उतना ही दलदल में भीतर धंसता जाता है। सच को स्वीकार करने की जगह उस पर पर्दा डालने के लिए झूठ, कुतर्क और हास्यास्पद बयान जारी होंगे तो आमजन के अंतर्मन में उबाल आना स्वाभाविक है। अंडरअचीवर प्राइम मिनिस्टर की वकालत करने आए पी. चिदंबरम ने देश के आम आदमी की बेइज्जती करके कांग्रेस को और बुरा फंसा दिया। अब चिदंबरम और पूरी कांग्रेस देश को बरगलाने में लगी है। सलमान खुर्शीद, पी. चिदंबरम सहित तमाम नेता सफाई देते घूम रहे हैं। अपना घर साफ नहीं रख पा रहे गृहमंत्री पी. चिदंबरम क्या खाक मिस्टर क्लीन (?) की रक्षा कर पाते। होम करते ही हाथ जला बैठे। जिस देश की ६० फीसदी जनता दो जून का भोजन (?) जुटाने के लिए दिनभर हाड़ रगड़ती हो, उससे कहा जा रहा है कि वह आइसक्रीम खाकर मौज उड़ा रही है। यह देश की ६० फीसदी से भी अधिक आबादी का मजाक बनाना नहीं तो क्या है? जीवन के लिए हर क्षण संघर्ष कर रहे इस वर्ग को याद भी नहीं होगा कि उन्होंने और उनके बच्चों ने पिछली दफा आइसक्रीम कब खाई थी? संभवत: उन्हें तो यह भी नहीं पता होगा कि कोन वाली आइसक्रीम कौन-सी होती है? शाम की दो रोटी के इंतजाम के लिए जो आदमी सुबह निकलता हो उसके लिए एक किलो चावल पर एक रुपया बढ़ाना बहुत मायने रखता है। इसलिए निवेदन है कि चिदंबरम महाशय धरती-धरती चलो, आसमान की छाती न फाड़ो।

फ्रांसीसी क्रांति के समय भूख से पीडि़त जनता वर्साय के महल के सामने जुट आई। इस उम्मीद के साथ कि महारानी उनका दर्द समझेंगी और कुछ राहत जनता को देंगी। जनता के प्रतिनिधियों ने महारानी से कहा कि जनता भूखी है। उसके पास खाने को ब्रेड (रोटी) नहीं है। उसकी मदद कीजिए। इस पर महारानी ने कहा कि ब्रेड नहीं है तो क्या हुआ? जनता से कहो कि वह केक खाए। ऐश-ओ-आराम में रह रही महारानी को क्या पता कि महल के बाहर उसके कुप्रबंधन से जनता कैसी मुसीबतें झेल रही है? केक खाने वाली महारानी को क्या पता कि केक जनता की पहुंच के बाहर है। जिस जनता के पास रोटी खरीदने के लिए पैसा न हो वह केक का दाम कहां से चुकाएगी? चिदंबरम का बयान इससे कहीं निचले स्तर का है। फ्रांस की साम्राज्ञी ने तो महल के बाहर की दुनिया देखी ही नहीं थी इसलिए उसे अपनी जनता की यथास्थिति पता नहीं थी। लेकिन, चिदंबरम साहब तो देश की दशा और दिशा से बखूबी वाकिफ हैं। भ्रष्टचार और महंगाई से आजिज आ चुकी जनता दिल्ली में कई बार डेरा डालकर अपने दर्द से भारत सरकार को बावस्ता करा चुकी है। इसके बाद भी गृहमंत्री पी. चिदंबरम कह रहे हैं कि लोग पानी की बॉटल पर १५ रुपए और आइसक्रीम के कोन पर २० रुपए तो खर्च कर सकते हैं लेकिन गेहूं-चावल की कीमत में एक रुपए की बढ़त बर्दाश्त नहीं कर पाते। शायद चिदंबरम भूल गए कि उनकी ही सरकार के निर्देशन में योजना आयोग ने गरीबी का मजाक बनाते हुए आंकड़े पेश किए थे। आयोग के मुताबिक ३२ रुपए रोज पर शहर में और २६ रुपए रोज पर गांव में आदमी आराम से गुजारा कर सकता है। अब चिदंबरम साहब बताएं कि ३२ और २६ रुपए वाला आदमी २० रुपए आइसक्रीम पर कैसे खर्च कर सकता है। हवाई जहाज के बिजिनस क्लास में यात्रा करने वाला नहीं सोच सकता कि ट्रेन के जनरल डिब्बे में भेड़-बकरियों की तरह भरकर यात्रा करने के पीछे क्या मजबूरी हो सकती है। फाइव स्टार होटल में दाल की एक कटोरी के लिए तीन हजार रुपए खर्च करने वाला नहीं सोच सकता कि गेहूं-चावल पर एक रुपए बढऩे पर क्यों गरीब का कलेजा बैठ जाता है। भारत में करीब ४.६२ लाख राशन की उचित मूल्य की दुकानों से लगभग २० करोड़ परिवार को राशन बांटा जाता है। इन २० करोड़ परिवारों को पता है कि गेहूं-चावल का दाम प्रतिकिलो एक रुपए बढ़ाने पर घर के बजट पर क्या असर पड़ता है। उसकी भरपाई के लिए कितने घंटे ओवरटाइम कर हाड़तोड़ मजदूरी कर जीवन खपना पड़ता है। भारत में ४८ फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। इस मामले में भारत दुनिया में १५८वें स्थान पर खड़ा है। हमारे यहां शिशु मृत्यु दर एक हजार पर ५२ है, इससे दुनिया में हमारा १२२वां स्थान है। ये हाल इसलिए हैं कि लोगों के पास अच्छा खाने-पहनने-रहने के लिए पर्याप्त पैसा-साधन नहीं है। अगर सारा देश आइसक्रीम खा रहा होता तो स्थिति इतनी विकराल न होती। कांग्रेस सरकार को चाहिए कि वोट बैंक को साधने की नीतियां बनाना छोड़े और सही मायने में आम आदमी की चिंता करे। उसके विकास की दृष्टि रखकर योजनाएं बनाए। कांग्रेस के वर्तमान हाल को देखकर नहीं लगता कि उसका हाथ आम आदमी के साथ है। सच तो यह है कि इस वक्त कांग्रेस का हाथ आम आदमी के गिरेबां पर है।

कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की आंखें तो भारत की गरीबी के संबंध में वर्ल्ड बैंक के आकंडे देखकर भी नहीं खुलीं। जिसे गरीबों से कोई लेना-देना नहीं हो या अंतिम छोर पर खड़े आदमी के उत्थान की चिंता ही न हो, उस सरकार को इन सबसे क्या फर्क पड़ता है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है कि गरीबी रेखा के नीचे जीने वाली आबादी के प्रतिशत के लिहाज से भारत की स्थिति केवल अफ्रीका के सब-सहारा देशों से ही बेहतर है। बैंक ने अनुमान जताया है कि २०१५ तक भारत की एक तिहाई आबादी करीब ६० रुपए प्रतिदिन से कम आय में गुजारा कर रही होगी। यूपीए सरकार की नीतियां देखकर तो वर्ल्ड बैंक के इस दावे से शायद ही कोई इनकार कर सके। वर्ल्ड बैंक की यह रिपोर्ट ग्लोबल इकनॉमिक प्रॉस्पेक्टस फॉर – २००९ शीर्षक से प्रकाशित हुई है। यह रिपोर्ट कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की नाकामी को साफ पानी की तरह हमारे सामने रखती है। इधर, टाइम मैगजीन ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अंडरअचीवर बताते हुए सरकार की वोट बैंक बढ़ाने वाली नीतियों की जमकर आलोचना की है। टाइम मैगजीन की रिपोर्ट कहती है कि भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरी सरकार सुधारों की दिशा में आगे नहीं बढ़ पा रही है। यूपीए के मंत्री-नेता सब वोट बढ़ाने के उपायों में फंसे दिखते हैं। गिरती आर्थिक वृद्धि, बढ़ता घाटा और रुपए की गिरती साख को संभालने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लाचार रहे हैं। कोयला आवंटन में मनमोहन के हाथ भी काले दिख रहे हैं। मंत्रियों पर प्रधानमंत्री का कोई नियंत्रण नहीं है। यूपीए-१ और यूपीए-२ के आठ साल के कार्यकाल में २जी सहित १५ लाख करोड़ रुपए से अधिक के घोटाले सामने आ चुके हैं। सरकार की नीतियां इतनी लचर हैं कि तीन साल में महंगाई दर १० फीसदी से ऊपर निकल गई है। पेट्रोल और रसोई गैस के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। विकास दर औंधे मुंह पड़ी है। फिलहाल विकास दर ६.५ फीसदी पर स्थिर है, जो पिछले नौ सालों में सबसे कम है। मैगजीन के एशिया अंक के कवर पेज पर प्रकाशित ७९ वर्षीय मनमोहन की तस्वीर के ऊपर शीर्षक दिया गया है – उम्मीद से कम सफल… भारत को चाहिए नई शुरुआत।

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