लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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modiमगध का राजा घनानंद लोभी, अहंकारी और अत्याचारी था। चाणक्य के संसर्ग में आने के बाद घनानंद ने प्रजाजनों का उत्पीडऩ बंद कर दिया। वह गरीबों और अपाहिजों को दान भी देने लगा।

एक दिन राजा घनानंद ने दरबार में चाणक्य से कह दिया जितनी तुम्हारी प्रतिभा है, यदि रूप भी उतना ही सुंदर होता तो कुछ अलग ही बात होती। चाणक्य महान नीतिज्ञ थे, वह विद्वान होने के साथ-साथ परम तपस्वी एवं विरक्त भी थे। एक विद्वान का स्वाभिमानी होना तो स्वाभाविक ही है। इसलिए राजा घनानंद के कठोर वचनों को सुनकर स्वाभिमानी चाणक्य बहुत आहत हुए। तब उन्होंने कह दिया-‘राजन! मैं अपने इस अपमान का प्रतिशोध लेकर भी चैन से बैठूंगा।’

अचानक एक दिन चाणक्य की चंद्रगुप्त से भेंट हो गयी। वे उनके साहस एवं गुणों से प्रभाभित हुए। उन्होंने चंद्रगुप्त को प्रेरणा देकर अपने बुद्घि कौशल से राजा घनानंद को पराजित करा दिया और उसे मगध का राजा बना दिया।

चाणक्य ने राजा चंद्रगुप्त को पहला उपदेश देते हुए कहा-‘‘राजा का उद्देश्य प्रजा का कल्याण करना होना चाहिए। राजा को प्रजा के सुख के सामने अपने सुख की परवाह नही करनी चाहिए।’’

सचमुच राजा को अपनी प्रजा को केवल ‘सोने की चम्मच’ दिखा-दिखाकर शासन नही करना चाहिए। राजा के लिए यही उचित है कि वह जनकल्याण को वरीयता दे और जैसे भी हो लोगों के आर्थिक और सामाजिक स्तर को सुधारने के लिए प्रयासरत रहे। देश में अभी तक की सरकारों के द्वारा कांग्रेसी सरकारों के संस्कारों के कारण देश के लोगों के आर्थिक और सामाजिक स्तर को सुधारने के लिए सर्वोत्तम उपाय यह माना जाता रहा कि लोगों को नौकरी दो। लोगों ने भी नौकरी को ही अपनी समृद्घि का आधार मान लिया। पर 70 वर्ष में देश को पता चल गया कि एक तो नौकरी से समृद्घि नही आयी-व्यक्ति केवल रोटी खाने योग्य ही हो पाया, दूसरे सभी लोगों को सरकार नौकरी दे पाये-ये संभव नही हुआ।

देश के लोगों ने नेहरूजी के काल से ही सपने देखने आरंभ कर दिये थे, सरकारें गरीबी हटाने के नाम पर उनसे वोट लेती रहीं और नौकरी का झांसा देती रहीं,पर देखा यह गया कि नौकरी पाने के चक्कर में लोगों ने स्वरोजगार से मुंह फेर लिया और अपने परंपरागत काम-धंधों को छोडक़र नौकरी की प्रतीक्षा में बैठ गये। जिससे शिक्षित बेरोजगारों की भीड़ अप्रत्याशित रूप से बढऩे लगी। सरकारों ने नौकरी का झांसा दे-देकर कितने ही घर उजाड़ दिये -कितने ही यौवन उजाड़ दिये। परंपरागत काम-धंधों को छोडक़र बेरोजगार बने युवक ठगी या राहजनी के रास्ते पर चले गये, शिक्षित भारत के समाज में चालाकी बढ़ी और लोगों में एक दूसरे के प्रति अविश्वास बढ़ा। यदि कोई व्यक्ति किसी को नौकरी का झांसा देकर उससे ठगी करे तो उसके विरूद्घ मुकदमा दर्ज होता है, पर देश के उन नेताओं के विरूद्घ एक भी मुकदमा दर्ज नही हुआ जिन्होंने मंचों से गला फाड़-फाडक़र लोगों को ठगा और नौकरी का झांसा देकर उनके हाथ में कटोरा दे दिया। अपने लोकतंत्र की महिमा अपरंपार है। कभी विस्तार से इस पर अलग से लिखूंगा।

कटोरा लिए मेरे देश के युवाओं की ओर किसी को देखने का समय नही मिला। भारी-भारी उद्योग और भारी-भारी मशीनें लगा -लगाकर युवा को बेरोजगार करने का क्रम अनवरत चलता रहा। सरकारों को सोचना चाहिए था कि हम सबको रोजगार दे नही सकते तो इन्हें स्वरोजगार देने में सहायता करें। ‘गरीबी’ हटाने का यही एकमात्र उपाय था। शिक्षा सबको नौकरी नही दे सकती, पिछले 70 वर्ष के कटु अनुभवों में से यह भी एक अनुभव है। बड़ी -बड़ी डिग्रियां लेकर युवा सडक़ों पर घूम रहा है। वह पूछ रहा है कि-‘मैं अपनी इस डिग्री का क्या करूं?’

प्रधानमंत्री मोदीजी इस बात के लिए साधुवाद के पात्र हैं कि उन्होंने देश की वास्तविकता को समझा है। उन्होंने पहली बार देश की नब्ज पर हाथ रखकर उसे पढक़र बोलने का प्रयास किया है। उन्होंने लोगों को स्वरोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में ई-रिक्शा और ई बोटिंग जैसी चीजें अपने हाथों से उपलब्ध कराई हैं। जिससे कि लोगों को लगे कि रिक्शा और बोटिंग का कार्य कोई छोटा कार्य नही है। यह भी एक महत्वपूर्ण कार्य है और इसके माध्यम से ही हमें रोजगार मिलेगा। अब तक के प्रधानमंत्री या बड़े नेता किसी बड़ी कंपनी की किसी बड़ी गाड़ी को सडक़ पर उतारने के लिए फीता काटते या हरी झण्डी दिखाते दिखाई पड़ते थे। पर देश पहली बार देख रहा है कि एक प्रधानमंत्री ई-रिक्शा और ई-बोटिंग को अपने हाथों से एक गरीब को देते हैं। न केवल देते हैं अपितु उसके साथ कुछ दूरी की यात्रा भी करते हैं। उस यात्रा में उनकी आंखों में एक सपना तैरता है कि मेरा भारत कल नही तो परसों अवश्य समृद्घ होगा, जब उसके हर हाथ को काम निकलेगा। इसी को जनकल्याण कहते हैं और यही जनकल्याण लोकतंत्र की रीढ़ है। पूरी व्यवस्था गलती कर रही थी, जिसे बिना किसी की आलोचना के मोदी सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। यह भी लोकतंत्र का एक गुण है।

जनकल्याण को कोई ‘चायवाला’ ही समझ सकता है। मोदी जी गरीब की संवेदनाओं के प्रधानमंत्री हैं। इसलिए उन्होंने यह बात अंतर्मन से अनुभव की है कि लोगों का ध्यान नौकरी से हटाकर स्वरोजगार की ओर मोड़ा जाए। अब आप देखिए कि ई-रिक्शा वाला और ई-बोटिंग वाला अपने आपको स्वाभिमानी मानता है, गौरवान्वित अनुभव करता है, क्योंकि उनके बीच देश की माटी का लाल एक पीएम खड़ा होता है, कल-परसों तक जिस व्यक्ति की झलक तक पाना उनके लिए असंभव था-वह आज उन्हें अपने हाथ से ई-रिक्शा की या ई-बोटिंग की चाबी सौंपता है और उनके साथ फोटो कराता है। देश का कारपोरेट जगत देख रहा है कि जो व्यक्ति हर कदम पर उनके साथ रहा करता था वह अचानक पिछले दो वर्ष से उनके बीच से लुप्त क्यों हो गया है?

प्रधानमंत्री की नीतियों में और उनकी सोच में ‘अन्त्योदयवाद’ झलकता है जिसे लोग और पूरी व्यवस्था भूल चुकी थी, वह सपना सच होता जान पड़ रहा है।

केजरीवाल जैसे लोगों ने उचित ही किया कि प्रधानमंत्री की डिग्रियां सार्वजनिक कराकर लोगों को यह ज्ञान करा दिया कि वह राजनीतिशास्त्र में ‘प्रथम श्रेणी’ की स्नातकोत्तर की डिग्री लिए हैं। प्रधानमंत्री ने गरीबों को नि:शुल्क गैस दिलाने की घोषणा करके केजरीवाल को और उनके साथियों को बता दिया कि उनके हृदय में गरीब की संवेदनाओं के लिए कितनी पीड़ा है। इसी पीड़ा को हृदय में बसाने वाले प्रधानमंत्री की नीतियों को चाहे लोगों का साथ मिलने में देरी हो, परंतु प्रधानमंत्री का गणित वास्तव में ही प्रशंसनीय है। उन्होंने भारत निर्माण के लिए भारत को सही स्थान से पकड़ा है, जिसे पकड़ते ही भारत उठने लगा है। यह उठता हुआ भारत ही उनके सपनों का आत्मनिर्भर, सक्षम, समृद्घ, सुशिक्षित एवं स्वच्छ भारत होगा। प्रधानमंत्री की स्वस्थ सोच के लिए उन्हें एक बार पुन: बधाई।

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