लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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pandavasडा. राधेश्याम द्विवेदी
महाभारत ग्रंथ की मूल कथा में अनेक परिवर्तन हुए हैं. इन परिवर्तनों से आर्य-संस्कृति का रूप काफी दयनीय स्थिति को प्राप्त हुआ है. द्रौपदी के पांच पति वाली कथा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है. महाभारत के आदि-पर्व में द्रौपदी के पांच पतियों का उल्लेख पाया जाता है. महाभारत की द्रौपदी तथा परवर्ती किसी भाष्यकार द्वारा प्रक्षिप्त व बाद में बनी परम्परागत कही कहाई कहानी के आधार पर द्रौपदी के दो परस्पर विरोधी चरित्र पढने और सुनने को मिलते हैं. एक तरफ उसे पंचकन्या, सती, चिरकुमारी आदि सम्मानजनक स्थान दिया गया है तो दूसरी ओर उसे पंच पतियों की पत्नी कहकर चरित्र हनन भी किया गया है. इतना ही नहीं कुछ राजनीतिज्ञ इसी कहानी के आधार पर तीन तलाक के प्रसंग पर हिन्दू महिला व परिवार के बारे में गलत आरोप तक भी लगाया है. द्रौपदी महाभारत की सबसे प्रसिद्ध एक आदर्श पात्र है, जो पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री और बाद में तथाकथित पांचों पाण्डवों की पत्नी कही जाने लगी है .वह पंच-कन्याओं में से एक मानी जाती हैं, उसे चिर-कुमारी भी कहा जाता है. वह कृष्णा, यज्ञसेनी, महाभारती, सैरंध्री अदि अन्य नामो से भी विख्यात है.
महाभारत कथा :- पांचाल-नरेश द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी के विवाह के लिए स्वयंवर रचा. उस स्वयंवर में ब्राह्मण-वेशधारी पांच पांडव भी सम्मिलित हुए. अनेक छोटे-बड़े देशों के राजा, ब्राह्मण, देवता, पौर, जनपद सभी अपने-अपने स्थान पर सभासीन थे. एक ओर धनुष-बाण पड़ा था और दूसरी ओर आकाश में कृत्रिम यंत्र में लिपटा हुआ उसका संभाव्य लक्ष्य. इस लक्ष्य को जो कुलीन एवं वीर व्यक्ति विद्ध कर दे, वही द्रौपदी का अभिमत पति होगा, ऐसा निश्चय किया गया था.परंतु इस लक्ष्य को कोई भी राजा विद्ध न कर सका. कर्ण उठा, तो द्रौपदी ने ‘‘नाहं वरयामि सूतं’’ कहकर उसकी बेज्जती तक कर डाली थी. तब मृगचर्मधारी अर्जुन अपने आसन से उठे थे. तेजस्वी अर्जुन ने लक्ष्य का वेध कर दिया और द्रौपदी ने उसके पराक्रम के प्रसन्न होकर उसके गले में जयमाला डाल दी.अर्जुन के लक्ष्य-वेध करने पर मंडप में बैठे हुए ब्राह्मण अतीव प्रसन्न हुए, पर राजाओं ने कोलाहल करना प्रारम्भ कर दिया. धर्मपुत्र युधिष्ठिर इस कोलाहल को न सह सके और नकुल एवं सहदेव को लेकर कुम्भकार भार्गव के यहां अपने निवास-स्थान पर चले गये.सभा में रह गये अर्जुन और भीम. द्रुपद ने इन दोनों वीरों से कोलाहल शांत करने के लिए कहा. अर्जुन कर्ण से भिड़ गया और भीम शल्य से. कर्ण ने ब्राह्मण विजय को स्वीकार कर लिया और शल्य भीम द्वारा बांह पकड़कर दूर फेंक दिया गया. इतने में कृष्ण आ गये और उन्होंने यह कहकर मामला शांत कर दिया कि द्रौपदी का वरण न्यायपूर्वक हुआ है. द्रौपदी को लेकर जब अर्जुन कुंती के पास पहुंचे और कहने लगे कि मां, हम भिक्षा ले आये हैं, तो कुंती ने कहा- ‘पांचों भाई बांट खाओं.’ पर जब बाहर निकलकर उसने द्रौपदी को देखा, तो वह अपने पर पश्चत्ताप करने लगी. बस यहीं से द्रौपदी के पांच पति वाली कथा का स्रोत प्रारम्भ होता है.
प्रक्षिप्त व बाद में बनी कहानी:- द्रौपदी को पाण्डवों ने जीतकर मां को खुशखबरी की तरह सुनाया और बताया था . द्रौपदी जब पांडवों के साथ उनके घर आईं तो उन्होंने अपनी मां से कहा, ‘मां देखो हम क्या लाए हैं’. उनकी मां ने बिना देखे पुत्रों से कहा, ‘‘वे जो भी लाए हैं उसे आपस में बांट लें’’. मां ने बस्तु समझ आपस में बांटने की बात कही थी. यह प्रक्षिप्त व बाद में बनी कही-कहाई कहानी तो है परन्तु सत्य नहीं है.यह द्रौपदी के लिए उचित नहीं था. द्रौपदी जैसी विदुषी नारी के साथ हमने बहुत अन्याय किया है.प्रक्षिप्त व सुनी सुनाई बातों के आधार पर हमने उस पर कई ऐसे लांछन लगाये हैं, जिससे वह अत्यंत पथभ्रष्ट और धर्म भ्रष्ट नारी सिद्घ होती है. एक ओर धर्मराज युधिष्ठिर जैसा परमज्ञानी उसका पति है, जिसके गुणगान करने में हमने कमी नही छोड़ी. दुसरी ओर द्रौपदी पर अतार्किक आरोप लगाने में भी हम पीछे नही रहे. यह एक गम्भीर आरोप है कि उसके पांच पति थे. हमने यह गम्भीर आरोप महाभारत की साक्ष्य के आधार पर नही बल्कि प्रक्षिप्त व बाद में सुनी सुनाई कहानियों के आधार पर लगा दिया है.
वनवास के समय में स्वयंवर:-जिस समय द्रौपदी का स्वयंवर हो रहा था उस समय पांडव अपना वनवास काट रहे थे. ये लोग एक कुम्हार के घर में रह रहे थे और भिक्षाटन के माध्यम से अपना जीवन यापन करते थे. तभी द्रौपदी के स्वयंवर की सूचना उन्हें मिली. स्वयंवर की शर्त को अर्जुन ने पूर्ण किया. शर्त पूरी होने पर द्रौपदी को उसके पिता द्रुपद ने पांडवों को भारी मन से सौंप दिया. राजा द्रुपद की इच्छा थी कि उनकी पुत्री का विवाह किसी पांडुपुत्र के साथ हो, क्योंकि उनकी राजा पांडु से गहरी मित्रता रही थी. राजा द्रुपद पंडितों के भेष में छुपे हुए पांडवों को पहचान नही पाए. इसलिए उन्हें यह चिंता सता रही थी कि उनकी उनकी बेटी का विवाह उनकी इच्छा के अनुरूप नही हो पाया.
धृष्टद्युम्न उन सब का वीरोचित संवाद सुना था:-राजा द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न पांडवों के पीछे-पीछे उनका सही ठिकाना जानने और उन्हें सही प्रकार से समझने के लिए भेष बदलकर आ रहे थे. उन्होंने पांडवों की चर्चा सुनी उनका शिष्टाचार देखा. पांडवों के द्वारा दिव्यास्त्रों, रथों, हाथियों, तलवारों, गदाओं और फरसों के विषय में उनका वीरोचित संवाद सुना. जिससे उनका संशय दूर हो गया और वह समझ गये कि ये पांचों लोग पांडव ही हैं. इसलिए वह खुशी-खुशी अपने पिता के पास दौड़ लिये. उन्होंने अपने पिता से जाकर कहा, ‘‘पिताश्री! जिस प्रकार वे युद्घ का वर्णन करते थे उससे यह मान लेने में तनिक भी संदेह रह जाता कि वह लोग क्षत्रिय शिरोमणि हैं. हमने सुना है कि वे कुंती कुमार लाक्षागृह की अग्नि में जलने से बच गये थे. अत: हमारे मन में जो पांडवों से संबंध करने की अभिलाषा थी, निश्चय ही वह सफल हुई जान पड़ती है’’.
वरदान पाने के योग्य वीर पुरूष :- राजकुमार से इस सूचना को पाकर राजा को बहुत प्रसन्नता हुई। तब उन्होंने अपने पुरोहित को पांडवों के पास भेजा कि उनसे यह जानकारी ली जाए कि क्या वह महात्मा पांडु के पुत्र हैं? पुरोहित ने जाकर पांडवों से कहा, “वर देने में समर्थ पांचाल देश के राजा द्रुपद आप लोगों का परिचय जानना चाहते हैं.इस वीर पुरूष को लक्ष्यभेद करते देखकर उनके हर्ष की सीमा न रही। राजा द्रुपद की इच्छा थी कि मैं अपनी इस पुत्री का विवाह पांडु कुमार से करूं. उनका कहना है कि यदि मेरा ये मनोरथ पूरा हो जाए तो मैं समझूंगा कि यह मेरे शुभकर्मों का फल प्राप्त हुआ है.” तब पुरोहित से धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘पांचाल राज द्रुपद ने यह कन्या अपनी इच्छा से नही दी है, उन्होंने लक्ष्यभेद की शर्त रखकर अपनी पुत्री देने का निश्चय किया था. उस वीर पुरूष ने उसी शर्त को पूर्ण करके यह कन्या प्राप्त की है, परंतु हे ब्राहमण! राजा द्रुपद की जो इच्छा थी वह भी पूर्ण होगी’’. युधिष्ठिर कह रहे हैं कि द्रौपदी का विवाह उसके पिता की इच्छानुसार पांडु पुत्र से ही होगा. इस राज कन्या को मैं (यानि स्वयं अपने लिए, अर्जुन के लिए नहीं ) सर्वथा ग्रहण करने योग्य एवं उत्तम मानता हूं.पांचाल राज को अपनी पुत्री के लिए पश्चात्ताप करना उचित नही है.” तभी पांचाल राज के पास से एक व्यक्ति आता है और कहता है, “राजभवन में आप लोगों के लिए भोजन तैयार है”. पांडवों को वीरोचित और राजोचित सम्मान देते हुए राजा द्रुपद के राज भवन में ले जाया जाता है. महाभारत में आता है कि सिंह के समान पराक्रम सूचक चाल ढाल वाले पांडवों को राजभवन में पधारे हुए देखकर राजा द्रुपद उनके सभी मंत्री, पुत्र, इष्टमित्र आद सबके सब अति प्रसन्न हुए. पांडव सब भोग विलास की सामग्रिया को छोड़कर पहले वहां गये जहां युद्घ की सामग्रियां रखी गयीं थीं. जिसे देखकर राजा द्रुपद और भी अधिक प्रसन्न हुए. अब उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि ये राजकुमार पांडु पुत्र ही हैं. युधिष्ठिर ने पांचाल राज से कहा, “राजन! आप प्रसन्न हों ,आपके मन में जो कामना पूर्ण हो गयी है. हम क्षत्रिय महात्मा पांडु के पुत्र हैं”. महाभारतकार का कहना है कि युधिष्ठिर के मुंह से ऐसा कथन सुनकर महाराज द्रुपद की आंखों में हर्ष के आंसू छलक पड़े. द्रुपद ने बड़े यत्न से अपने हर्ष के आवेग को रोका, फिर युधिष्ठिर को उनके कथन के अनुरूप ही उत्तर दिया. सारी कुशलक्षेम और वारणाव्रत नगर की लाक्षागृह की घटना आदि पर विस्तार से चर्चा की. तब उन्होंने उन्हें अपने भाईयों सहित अपने राजभवन में ही ठहराने का प्रबंध किया. पांडव वही रहने लगे.
उसके बाद महाराज द्रुपद ने अगले दिन अपने पुत्रों के साथ जाकर युधिष्ठिर से कहा, “कुरूकुल को आनंदित करने वाले ये महाबाहु अर्जुन आज के पुण्यमय दिवस में मेरी पुत्री का विधि पूर्वक ग्रहण करें. तथा अपने कुलोचित मंगलाचार का पालन करना आरंभ कर दें. युधिष्ठिर बीच में ही बोल उठते हैं, “राजन! विवाह तो मेरा भी करना होगा. धर्मपुत्र युधिष्ठिर अनुचित विवाह सम्बंध के लिए हठ करते हैं. द्रुपद उनसे कहते हैं-
नैकस्या बहवःपुंसःश्रूयन्ते पतयःक्वचित्।
लोकवेदविरुद्धं त्वं नाधर्म धर्मविच्छुचिः।
कर्तुमर्हसि कौन्तेय कस्मात्ते बुद्धिरीदृशी।
अर्थात एक स्त्रा के अनेक पति नहीं होते. अनेक पति वाली बात आर्यों के समाज में प्रचलित नहीं है. वह लोक में प्रचलित प्रथा के विरुद्ध है और वेद भी इसका विरोध करते हैं. हे युधिष्ठिर, तुम तो धर्मात्मा हो, ऐसा अधर्म का कार्य तुम क्यों करने जा रहे हो, तुम्हारी ऐसी धर्म-विरोधिनी बुद्धि कैसे बन गयी? द्रुपद बोले, ‘‘हे वीर! तब आप ही विधि पूर्वक मेरी पुत्री का पाणिग्रहण करें. अथवा आप अपने भाईयों में से जिसके साथ चाहें उसी के साथ मेरी पुत्री का विवाह करने की आज्ञा दें”.इन घटनाओं से पांच पति वाली कथा-सरिता का स्रोत कुछ भी आगे बढ़ता दिखाई नहीं देता. धर्म और सदाचार की प्रेरणा उसके मार्ग में पर्याप्त अवरोध उपस्थित कर रही है. यदि कुंती ने ‘पांचों बांट खाओ’ कह भी दिया हो, मूल कथा में कुंती के मुख से ये शब्द निकले ही नहीं. तैत्तिरीय उपनिषद की सूक्ति के अनुकूल निराकरण हो जाना चाहिए – “यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि न इतराणि” .
जब इन दो घटनाओं से पांच पति वाली कथा पुष्ट न हो सकी, महाभारत का संस्कर्त्ता व्यासजी को आगे लाता है और व्यास एवं द्रुपद द्वारा उसका समर्थन कराता है. इस संवाद में युधिष्ठिर ने मुनि-पुत्री वार्क्षी की दश पति वाली एवं जटिला नामक गौतमी की सात पति वाली दो कल्पित अथवा ऐतिहासिक घटनाओं के उदाहरण दिये हैं.
युधिष्ठिर व कृष्णा विवाह संपन्न:– द्रुपद के ऐसा कहने पर पुरोहित धौम्य ने वेदी पर प्रज्वलित अग्नि की स्थापना करके उसमें मंत्रों की आहुति दी और युधिष्ठिर व कृष्णा (द्रौपदी) का विवाह संस्कार संपन्न कराया. इस मांगलिक कार्यक्रम के संपन्न होने पर द्रौपदी ने सर्वप्रथम अपनी सास कुंती से आशीर्वाद लिया, तब माता कुंती ने कहा, “ पुत्री! जैसे इंद्राणी इंद्र में, स्वाहा अग्नि में, भक्ति भाव एवं प्रेम रखती थीं उसी प्रकार तुम भी अपने पति में अनुरक्त रहो.’’ इससे सिद्घ है कि द्रौपदी का विवाह अर्जुन से नहीं बल्कि युधिष्ठिर से हुआ. इस सारी घटना का उल्लेख आदि पर्व में दिया गया है. उस साक्षी पर विश्वास करते हुए हमें इस दुष्प्रचार से बचना चाहिए कि द्रौपदी के पांच पति थे. माता कुंती भी जब द्रौपदी को आशीर्वाद दे रही हैं तो उन्होंने भी कहा है कि तुम अपने पति में अनुरक्त रहो. माता कुंती ने पति शब्द का प्रयोग किया है न कि पतियों का. इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पांच पतियों की पत्नी नही थी. माता कुंती आगे कहती हैं, “भद्रे! तुम अनंत सौख्य से संपन्न होकर दीर्घजीवी तथा वीरपुत्रों की जननी बनो. तुम सौभाग्यशालिनी, भोग्य सामग्री से संपन्न, पति के साथ यज्ञ में बैठने वाली पतिव्रता हो.” माता कुंती यहां पर अपनी पुत्रवधू द्रौपदी को पतिव्रता होने का निर्देश भी कर रही हैं. यदि माता कुंती को पांच पतियों की नारी बनाना चाहतीं तो यहां पर उनका ऐसा उपदेश उसके लिए नही होता.
व्यासजी को द्रुपद से सबके सामने वार्तालाप करने का साहस नहीं होता. वे उन्हें अंदर महल में लिबा ले जाते हैं और वहां द्रौपदी एवं पांडवों के पूर्वजन्म की कथाओं का उल्लेख करते हुए एक ऋषि की कन्या का वृत्तांत सुनाते हैं, “वह कन्या रूपवती और युवती होने पर भी पति नहीं पा सकी. उसने कठोर तपस्या करके शंकर को प्रसन्न किया”. शंकर बोले, ‘‘वर मांगो.” कन्या ने कहा, ‘‘मैं सर्वगुण शील-सम्पन्न पति मांगती हूं.’’ शंकर प्रसन्न मन से होकर कहते है, ‘‘भद्रे, तुम्हारे पांच पति होंगे.’’ कन्या कहती है, ‘‘मैं आपसे एक पति की प्रार्थना करती हूं.’’ पर शंकर कहते हैं, ‘‘तुमने पांच बार प्रार्थना की है, इसलिए तुम्हारे पांच पति होंगे. मेरी बात नहीं पलटेगी. दूसरे जन्म में तुम्हारे पांच पति होंगे.’’ (आदि पर्व 199-49,50). यही कन्या द्रौपदी है. इस कथा को पढ़कर सहृदय व्यक्तियों के हृदय को अवश्य ठेस लगेगी. कन्या एक पति मांग रही है, पर शंकर जबर्दस्ती उसके मत्थे पांच पति मढ़ रहे हैं. यही जबर्दस्ती, यही अधर्म, यही पाप महाभारत का संस्कर्त्ता द्रौपदी के ऊपर भी मढ़ रहा है.
इस प्रकार इन तीनों साधनों द्वारा द्रौपदी के पांच पति वाली बात की पुष्टि नहीं हो सकी है, न कुंती का कथन ही इस बात को आर्यों का आचार सिद्ध कर सकता है, न युधिष्ठिर का मनोगत विचार तथा वार्क्षी एवं जटिलता के उदाहरण, और न व्यास द्वारा कही गयी द्रौपदी के पूर्वजन्म की कल्पित कहानी.द्रौपदी का जब विवाह हो गया, तो वह रेशमी वस्र पहने कुए कुंती के सामने प्रणाम करके नम्र भाव से हाथ बांधकर खड़ी हो गयी.उस समय कुंती ने उसे जो आशीर्वाद दिया, वह मनन करने योग्य है-
रूपलक्षणसंपन्नां शीलाचार रसमन्विताम्।
द्रौपदीमवद्त प्रेम्णा पृथा।शीर्वचनैः स्नुषाम्।।
जीवसूर्वोरसूर्भद्रे बहुसौख्यसमन्विता।
सुभगाभोगसम्पन्ना यज्ञपत्नी पतिव्रता।।
रूप लक्षण-सम्पन्ना, शील और आचार वाली द्रौपदी को प्रेमपूर्वक आशीर्वाद देती हुई कुंती कहती है कि भद्र, तुम वीरप्रसविनी, पतिव्रता और यज्ञपत्नी बनो. यहां पतिव्रता और यज्ञपत्नी दो शब्द ध्यान देने योग्य हैं. एक पति ही जिसका व्रत है, उसे पतिव्रता और एक पति के साथ जो यज्ञ में भाग लेती है, उसे यज्ञपत्नी कहा जाता है. क्या द्रौपदी पांच पति वाली होकर इन दोनों विशेषणों की अधिकारिणी बन सकती है? पांच पतियों वाली कथा बाद में जोड़ी गयी है, इसका सबसे बढ़िया प्रमाण विराटपर्व में मिलता है. भीम कीचक का वध करने के बाद कहता है-
अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुर्भार्यापहारिणम्।
शांतिं लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रिकण्टकम्।।
अर्थात आज मैं कीचक को मारकर अपने भाई की पत्नी के ऋण से मुक्त हो गया.यहां भी भीम द्रौपदी को अपनी भार्या नहीं कहता. वह उसे अपने भाई (अर्जुन) की भार्या कहता है. महाभारत के ऊपर लिखे उद्धरणों से हम तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि द्रौपदी के पांच पति वाली कथा बाद में किसी ने जोड़ी है. उसके जोड़ने में कुछ उद्देश्य रहा हो, पर वह हमें आर्य-मर्यादा के अनुकूल नहीं जान पड़ती.
द्रौपदी के साथ अन्याय:- उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि हमने द्रौपदी के साथ अन्याय किया है. यह अन्याय हमसे उन लोगों ने कराया है जो नारी को पुरूष की भोग्या वस्तु मानते हैं, उन लम्पटों ने अपने पाप कर्मों को बचाने व छिपाने के लिए द्रौपदी जैसी नारी पर दोषारोपण किया. इस दोषारोपण से भारतीय संस्कृति का बड़ा अहित हुआ. जिससे वेदों की पावन संस्कृति अनावश्यक ही बदनाम हुई.आज हमें अपनी संस्कृति के बचाव के लिए इतिहास के सच उजागर करने चाहिए जिससे हम पुन: गौरव पूर्ण अतीत की गौरवमयी गाथा को लिख सकें और दुनिया को ये बता सकें कि हकीकत क्या है और आज क्या प्रचार हो गया है.

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1 Comment on "द्रोपदी के पांच नही, एक मात्र पति युधिष्ठिर"

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पारीक्षित
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पारीक्षित

बहुत सुंदर।पर क्या इसके संशोधन के लिए कोई भरोसेमंद source आज उपलब्ध?

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