लेखक परिचय

दीपक शर्मा 'आज़ाद'

दीपक शर्मा 'आज़ाद'

स्वतंत्र पत्रकार, जयपुर

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rumoursअफवाहे है अफवाहों का क्या…

कभी कभी कुछ कहा हुआ इतना फ़ैल जाता है कि उसके आगे फैला हुआ रायता भी कम लगने लगता है। मुझे अक्सर लगता है कि आखिर वे कौन लोग है जो इस तरह से बातों को इधर से उधर फैला कर अच्छे-खासे दिमाग की भुजिया बनाने पर तुले रहते है। मुँह की जुगाली कुछ यूँ करते है कि उस जुगाली में भी कुछ लोगो को ये भी नहीं पता चल पाता कि उनकी इस हरकत से किसी के साथ क्या दुर्घटना घट सकती है। अब हमारे आस-पड़ोस में रहने वाली औरतें कैसे एक बात को चंद घंटों में कहाँ से कहाँ पहुंचा देती है, मैं उनकी इस कला को भलीभांति पहचानता हूँ पर पसंद नहीं करता। आखिर ऐसा भी क्या चस्का। किसी की निजी जिंदगी में दखलंदाजी कर, कई छिपी परतों को उघेड़ने की कोशिशों में लगे रहते है कई लोग। ये भी कोई शोक हुआ भला।कुछ अफवाहबाज अव्वल दर्जे के भी होते है श्रीमान। जो गॉसिप क्रीएट करते है, जो ख़बरों में मसाला डालते हैं। साहब इन्हें इनकी इस कारस्तानी की एवज में भुगतान भी मिलता है। इन जनाब को हमेशा पता रहता है कि ऊंट किस करवट बैठने वाला होता है, इसीलिए ये लोग हमेशा दूसरों के फट्टे में अपनी टांग अड़ाए रखते हैं नजाने कब वो ‘विशेष शिकार’ उधर से गुजरे और इनके फैलाये जाल में जा अटके। ये लोग मार्केटिंग के अव्वल दर्जे के जानकर होते हैं। और इस प्रकार के कारनामों को अंजाम देना ये अपना ‘विशेष अधिकार’ समझते हैं।

अब इन दिनों फैली कुछ अफवाहे भी देख लो, सलमान खान ने नेपाल भूकम्प संकट पर आर्थिक मदद की। पर सलमान खान ने इस खबर का ट्वीट कर खंडन कर दिया। अभी कुछ दिन पूर्व ही अफवाह फैली है कि बीइंग ह्यूमन ने नेपाल भूकंप के लिए पैसे दान किए हैं। सलमान खान ने ट्विटर के जरिये अपने फैंस को बताया है कि ये खबर झूठ है। उन्होंने कहा, ‘बीइंग ह्यूमन केवल भारत में ऑपरेट करता है।’ फिर एक नयी अफवाह उडी अक्षय कुमार अपनी नयी रिलीज़ मूवी ‘गब्बर इज़ बैक’ की पहले दिन की कमाई को नेपाल भूकम्प संकट के लिए दान करेंगे। पर अक्षय कुमार को भी इस अफवाह को दूर करने के लिए अपना बयान देकर यह स्पष्ट करना पड़ा कि वो अपनी फिल्म ‘गब्बर इज बैक’ की कमाई नेपाल पीडि़तों को दान नहीं देने वाले हैं। जब देश में भूकम्प आया तब अगले दो दिन तक ये अफवाह सोशल मीडिया पर उड़ती दिखाई दी कि फलां समय पर फिर भूकम्प आने वाला है। ऐसा नहीं है कि ये केवल सोशल मीडिया तक ही सीमित रहा होगा, ये मुझे कॉल करके भी किसी भाई ने बताया और मैंने स्वयं इसे स्वीकार भी किया।

राजनीति में तो शुरू से लेकर अंत तक अफवाह का ही बोलबाला होता है। फलां नेता चाहे पार्टी के अंदर उसकी रत्ती भर भी इज्जत नहीं होती हो पर बाहर अपने समर्थकों के बीच ऐसी बड़ी-बड़ी ढींगे हांकता है कि क्या कहने। एक पार्टी के नेता जी से मेरी जानपहचान हुई तो बिन पूछे ही साहब ने जो अपनी रटंत विद्या में कुशलता का गुण दर्शाया की मैं हैरान रह गया। उन्होंने मुझे प्रधानमंत्री जी से उनकी निकटता का चित्रण बारीकी से कराया। अब उन्होंने मुझसे क्या कहा और कैसे कहा वो सब कभी ओर चटखारे मार कर बताऊंगा।

आम जीवन भी अफवाहों के बगैर टस से मस होती। सोचिये अगर ये अफवाहे न होती तो जिस आरामदायक दुनिया में हम रह रहे हैं वो एक ख्वाब होता। मुझे लगता है कि कभी कोई अफवाह उडी होगी कि रौशनी अपनी मर्जी से भी की जा सकती है, तब थॉमस एडिशन ने बल्ब का अविष्कार किया होगा। कभी एक अफवाह उडी होगी कि आम आदमी एक जगह से दूसरी जगह उड़ कर जा सकता है, तब किसी ने हवाई जहाज का आविष्कार किया होगा। अफवाहे अच्छी नियत से उड़ाई गयी हो तो साधन बन सकती है पर यदि अफवाहे बुरी नियत से फैलाई गयी हो तो वो जिंदगी को जहन्नुम भी बना सकती है।

कभी कभी हम पर अफवाहे इतनी हावी हो जाती है कि हम लोग जल्दबाजी में फैसला भी नहीं कर पाते की ये जो भी हो रहा है या हुआ है वो सच भी है या नहीं। हम भारतीय किसी भी बात की जड़ में जाने के बजाये भेड़चाल का उपयोग ज्यादा करते है। हमारा पडोसी इस बात पर क्या फैसला कर रहा है, हमारे अन्य नजदीकी इस पर क्या सोच रहे है हमें ये जानने की जल्दी होती है। हम कभी भी अपने फैसले नहीं लेते, खुद तय नहीं करते, खुद तहकीकात नहीं करते। और इसी कारण हम इन दिखने में मामूली पर बड़ी गंभीर अफवाहों के जंजाल में फंस कर अपने को जख्मी कर बैठते हैं।

ऐसी अनेको अफवाह है जो उठती है, फैलाई जाती है जो कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक ही हो पर अपना असर छोड़ जाती है। अफवाहे, अफवाहे होती वे असल से परे होती है। उनकी सच्चाई महज़ इतनी है कि वे अफवाहें होती है जो किसी को गिराने या उठाने के लिए छोड़ा गया एक तीर है जो कभी जहर का तो कभी मेहर का काम करती है। पर सच तो ये है कि ये किसी को सुकून नहीं देती। परेशान ही करती है।

वैज्ञानिक तथ्य कहता है कि हम यदि मन से मजबूत है तो यक़ीनन अफवाहे हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। भले ही मैं अपने आपको रायचंद कहलाना मंजूर न करूँ तो भी आपको एक छोटी सी राय यही दूंगा कि अफवाहों पर ध्यान नहीं दें। हमारे देश में पॉलिटिशियन ही सबसे ज्यादा अफवाहों का रायता जनता को दबा दबाकर पिलाया जाता है। कृपया इस रायते से दुरी बनाएं यदि आप समझदार हैं तो, नहीं तो हाजमा बिगड जाने की संभावनाएं बनी रहती हैं।

दीपक शर्मा ‘आज़ाद’

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2 Comments on "अफवाहें हैं अफवाहों का क्या…"

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डॉ. मधुसूदन
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एक समाचार पत्र है।
जो अफवाहॊं पर ही चलता है।
उसकी दो अफवाहें तो आप ही ने बता दी।
बताइए उसका नाम।
“मभाटा” नाम है उसका?
उसी ने सारे प्रचार माध्यम को आतंकवादी अलकायदा बना दिया है।
कोई भी समाचार पर से, आप का विश्वास उडाने का काम वह बडी सफलता से कर सकता है।
शीर्षक एक, समाचार बिलकुल अलग।
किसी भी विषय पर आप सम्पर्क करें, साथ उपहार राशि भी हो।
काम सफल हो कर ही रहेगा।
काला धन भी चल जाएगा।
स्विस बैंक की राशि का स्वागत है।

suresh karmarkar
Guest
भाई साहेब ,कुछ लोग तो इतने चतुर होते हैं की रायता पिलाते नहीं बल्कि ढोल देते हैं. जैसे रसोई बैठकर परोसी जा रही है. सुरुआत में लोग ज़रा झप्पटा मारकर कहते हैं। परोसनेवाले एकदम से हरकत में नहीं होते. एक बाँदा रायते की बाल्टी ढोल देता है और चिल्लाने लगता है की रसोई में कुछ गड़बड़ है ३-४ को उलटी हो गयी. बस रसोई खराब। इसी प्रकार शादी विवाहोंमे भी कुछ भाई लोग इस मोके में रहते हैं की कहाँ रायता उंडेला जाय?बंद वाला देर से आया, घोड़ीवाला देर से आया, बरात ले जाने वाली बस एक दम खटारा थी.… Read more »
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