लेखक परिचय

संजय चाणक्य

संजय चाणक्य

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‘‘ हमारी कोशिश रहती है किसी को हक दिलाने की !
हमे आदत नही विल्कुल, किसी को बगलाने की !!’’
बेशक ! देश की हालात बदली-बदली सी लग रही है। और इस बदलते हालात के लिए कोई और नही बल्कि हमारे देश के तथा-कथित शुभचिन्तक व जनता के रहनुमा बनने का दावा करने वाले खद्दरधारी जिम्मेदार है। इन नेताओं के मस्तिष्क रूपी तरकश से निकले विनाशकारी अस्त्र असहिष्णुता बनाम सहिष्णुता की आधी नें देश व देशवासियो को झुलसने के कगार पर खडा कर दिया है। और यह सब कुछ सिर्फ इस लिए हो रहा है कि देश में तकरीबन साढे चार दशक से सत्ता के सिघासन पर विराजमान रही क्राग्रेस को आमजनता ने सत्ता-सुख से बाहर का रास्ता दिखा दिया। आज गैर काग्रेसियों को वह हर चीज नजायज लग रही है जो उनके कार्यकाज में कभी जायज हुआ करती थी आज इन्हे हर कार्य आश्चर्य लग रहा है जो उनके कार्यकाल में समान्य थे। वजह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विश्व के नक्शें पर बढता हुआ कद। आतंकवाद, साम्प्रदायिक हिंसा, किसानों की मौत ,महगाई सरीखे तमाम मुद्दो पर विगत डेढ सालो से गैर काग्रेसी जिस तरह छाती पीट-पीट कर चिल्ला रहे है ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आजादी के 68 सालों के बीच हिन्दवासियों ने इस समस्या का कभी सामना नही किया। यह सभी जानते है कि किसानों की मौत की बात हो या आतंकी हमला, साम्प्रदायिक हिंसा हो या फिर महंगाई यह समस्या दो वर्षो से उत्पन हुई समस्या नही है। इस समस्या से हिन्दवासी एक-दो नही बल्कि साढे छह दशक से जूझ रहे है लेकिन पूर्ववर्ती सरकार को उस समय राष्ट्रहित व जनता का ख्याल नही आयी। सत्ता-सुख से दुर होते ही काग्रेसियों को यह महसूस होने लगा कि देश में आतंकी हमला, साम्प्रदायिक हिसा, किसानों की मौत और महगाई की वजह से जनता तस्त्र है । जबकि हकीकत यह है कि इन नेताओं को देश और जनता की समस्या की नही बल्कि इन्हे चिन्ता खाए जा रही है तो बस मोदी के बढते कदम की। इन्हे अन्दर ही अन्दर यह भय सतायी जा रही है कि नरेन्द मोदी की बढती लोकप्रियता के आगें हमारी राजनीतिक जमीन हमेशा-हमेशा के लिए खिचक न जाए। इस लिए अच्छा बुरा मोदी के हर कार्यो का विरोधकर जनता के सामने खडे रहे।
दुश्मन है बहुत उसके इस जमाने मे !
जरूर आदमी अच्छा होगा!!
अब जरा इस पर भी विचार कीजिए…!! हिन्द की सरजमी पर तमाम घटनाए हुई है जिस पर न तो मीडिया का ध्यान जाता है और न ही हमारे देश के भाग्यविधाताओं के आवाज बुलन्द होते है मानों मीडिया धृतराष्ट और देश के भाग्यविधाता कण्ठहीन हो गए है। 28 सितम्बर 2014 को दादरी में जो कुछ भी हुआ शायद ही कोइ उसे भूला पा हो। उस घटना के बाद तो देश में असहिष्णुता बनाम सहिष्णुता कीं मानो जंग छिड गई। सबने इस घटना का एक स्वर में विरोध किया। मुझे यह देख कर बहुत खुशी हुई कि अन्याय के खिलाफ पूरे देश में एक साथ आवाज बुलन्द किया गया। इस दौरान हिन्दुओं का आतंक, हिन्दु तालिवान, न जाने क्या -क्या नाम दिया सेकुलरो ने। लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब 3 जनवरी को पश्चिम बंगाल के मालदा में घटित घटना ने हिन्द को झकझोर कर रखा दिया लेकिन किसी सेकुलरो के जुबान नही हिले मानो वो कण्ठहीन हो गए हो। एक हिंदू संगठन के कथित सदस्य के आपत्तिजनक बयान के विरोध में जिस तरह ढाई लाख शान्ति प्रिय समुदाय के लोगो ने घर से निकलकर सब कुछ तबाह करके अपने ताकत का प्रदर्शन किया उसे किसी भी सूरत से जायज नही कहा जा सकता है। मालदा के कलियाचक में इकट्ठा हुई शान्तिप्रिय समुदाय की उग्र भीड़ ने न केवल पुलिस थाने को तहस.नहस कर दिया बल्कि सरकारी संपत्ति समेत कई निजी वाहनों और उस क्षेत्र में अल्पसंख्यक की हैसियत रखने वाले हिंदुओं के घरों और दुकानों में भी लूटपाट की। वहा के हिन्दू जो कि अपसंख्यक है आज भी भय और दहशत के साये में जी रहे है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस घटना के बाद देश के किसी भी साहित्कार ने कोई अवार्ड लौटाने की जहमत नही उठाई। कोई पुरस्कार लौटाने अभी तक आगे नही आया। काग्रेस के साहबजादे सहित देश के महान शुभचिन्तक बनने वाले कथित नेताओं की आखो के पानी सूख गए और मीडिया भी हो-हला नही मचायी। कोइ डिवेट नही कोई चर्चा नही। इस मुद्दे पर किसी का कोई बयान नही आया है। किसी ने इस घटना पर अफसोस जाहिर करना भी मुनासिब नही समझा। खान बन्धु भी कण्ठहीन हो गए। शायद इस लिए कि हिन्सा फैलाने वाले संसार के शान्तिप्रिय समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोग थे। किरण राव को भी डर नही लग रहा है। दादरी की घटना से तो उन्होने देश छोडने का मन बना लिया था लेकिन मालदा की घटना के बाद उनके दिल से सारा डर गायब हो गया। युवराज विदेश में हाली-डे मनाये में मशगूल रहे तो युग पुरूष अरविन्द केजरीवाल तो ऐसे खामोश रहे जैसे देश में कुछ हुआ ही नही। मै कमलेश तिवारी के बयान से तनिक भी सहमत नही हू। कमलेश ने जो टिप्पणी किया था उसकी जितनी भी र्भत्सना की जाए वह कम है। कमलेश को सजा मिलनी चाहिए और कानूनन सजा मिलनी चाहिए लेकिन क्या यह सही है कि कमलेश तिवारी की गलती की सजा समाज को दिया जाए, यह कहा तक उचित है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आप कल्पना कीजिए आने वाले समय में भारत का स्वरूप क्या होगा? मालदा की घटना को मीडिया ने जिस तरह लुका.छिपाकर कवर किया उस पर कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। देश के एक बड़े हिस्से को इस घटना के बारे में सही जानकारी तो क्या सूचना तक नहीं मिल पाई। राष्ट्रीय मीडिया के एक बड़े हिस्से ही नहीं पश्चिम बंगाल के कई स्थानीय चैनलों ने भी इस घटना से दूरी बनाए रखी। जबकि इसी मीडिया ने दादरी को अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुद्दे में परिवर्तित कर दिया था। पीड़ित वर्ग की आवाज को जगह न मिलना और पूरे देश के सामने मालदा हिंसा का सच सामने न आने देने की कोशिश आखिर क्या इशारा करती है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आप कल्पना कीजिए आने वाले समय में भारत का स्वरूप क्या होगा?
लिख रहा हू मै अंजाम, जिसका कल आगाज आयेगा ।
मेरे लहू का हर एक कतरा इंकलाब लायेगा ।।
मै रहू, न रहू पर ये वादा है तुमसे ।
कि मेरे बाद वतन पर मरने वालो का सैलाब आयेगा ।।
!! जयहिन्द, जय मा भारती !!

संजय चाणक्य

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