लेखक परिचय

शिवानंद द्विवेदी

शिवानंद द्विवेदी "सहर"

मूलत: सजाव, जिला - देवरिया (उत्तर प्रदेश) के रहनेवाले। गोरखपुर विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र विषय में परास्नातक की शिक्षा प्राप्‍त की। वर्तमान में देश के तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादकीय पृष्ठों के लिए समसामयिक एवं वैचारिक लेखन। राष्ट्रवादी रुझान की स्वतंत्र पत्रकारिता में सक्रिय एवं विभिन्न विषयों पर नया मीडिया पर नियमित लेखन। इनसे saharkavi111@gmail.com एवं 09716248802 पर संपर्क किया जा सकता है।

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n-modi-5-9.6.122सियासत में तमाम विविधताओं के बीच मुद्दों के प्रति संतुलन का होना बेहद जरूरी होता है ! फिलहाल मुद्दों को लेकर खीचतान की बजाय संतुलन की स्थिति बनाये रखने की कवायदें भाजपा द्वारा की जा रही हैं ! हाल के सियासी घटनाक्रमों में अगर भाजपा की सियासत के कुछ पहलुओं पर नजर डाली जाय तो ऐसा स्पष्ट तौर पर नजर आता है कि भाजपा ना तो अपने पारंपरिक मुद्दों को ही पूरी तरह छोड़ती नजर आ रही है और ना वर्तमान के विकास एवं अन्य मुद्दों को ही हाथ से जाने देना चाहती है ! हो सकता है कि मुद्दों के चयन के मामले में अभी भाजपा असमंजस के स्थिति में हो या फिर ये उनकी सियासी रणनीति का हिस्सा हो ! दिल्ली के श्रीराम कॉलेज में आकर कट्टर हिन्दुवादी छवि वाले सबसे चर्चित भाजपा नेता नरेंद्र मोदी, बच्चों के बीच बिजिनेस मॉडल एवं विकास पर भाषण देकर जाते हैं तो वहीँ भाजपा के ही वर्तमान अध्यक्ष धर्म संसद में शिरकत करते हुए राम मंदिर की जरुरत को दबे स्वरों में ही सही उठाते नजर आते हैं ! नरेंद्र मोदी के दिल्ली आने और अपना अभिभाषण देने से भाजपा खेमे में जितनी खुशी नहीं देखी जा रही उससे ज्यादा मलाल कांग्रेस सहित वामपंथी समर्थकों में इस बात का दिख रहा कि आखिर मोदी हिंदूत्व पर क्यों नहीं बोले ? शायद मोदी के हिंदुत्व या राम मंदिर का जिक्र ना करने से विपक्षियों को ऐसा महसुस हो रहा हो कि कोई हाथ में आया मुद्दा बड़ी चालाकी से छीन लिया गया हो ! वैसे हाल के सियासी घटनाक्रमों में भाजपा के संदर्भ में अगर राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी के बयानों को जोड़कर देखा जाय तो मौका और माहौल के हिसाब से दोनों के बयान अपनी-अपनी जगह पर बेहद व्यवहारिक एवं सियासत के अनुकूल नजर आते हैं ! मोदी के भाषण पर कांग्रेस सहित जिन लोगों की खास नजर टिकी हुई थी वो अब ठगा हुआ सा महसुस कर रहे हैं ! मोदी के भाषण पर जिस तरह की दलील कांग्रेस द्वारा दी जा रही है उन दलीलों की प्रासंगकिता खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे से ज्यादा कुछ भी नहीं है ! सीधी बात है कि आखिर विद्द्यार्थियों के बीच अगर नरेंद्र मोदी बिजिनेस मॉडल पर नहीं बोलते तो भला हिंदुत्व पर उन्हें क्यों बोलना चाहिए था ? इस पुरे मसले में ऐसा कुछ भी नहीं है कि मोदी के विरोध को तवज्जो दी जाय बल्कि इस मसले में मूल रूप से भाजपा के सियासी रणनीति को समझने की दिशा बात किया जा सकता है ! दरअसल, राजनाथ सिंह के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा में अंदरूनी तौर पर कई मसले ऐसे हैं जिनपर खेमाबंदी की संभावनाएं बनी हुई हैं जिन पर भविष्य में घामासान देखा जा सकता है ! संघ के अतिशय करीबी माने जाने वाले गडकरी को संघ की लाख कोशिशो के बावजूद दोबारा अध्यक्ष नहीं चुना गया एवं दूसरी तरफ राजनाथ सिंह के हिदायत के बावजूद नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर खड़ा करने की कवायदें भी खुलकर सामने आने लगी हैं ! ऐसी परिस्थिति में अगर राजनाथ सिंह द्वारा पार्टी को लोकसभा चुनाव तक एकजुट रखने के साथ-साथ अपने पारंपरिक वाह्य सहयोगीयों के रूप में धार्मिक संगठनो को जोड़कर रखने की कवायदें की जा रहीं हैं तो वहीँ नरेंद्र मोदी पार्टी की बजाय अपनी निजी छवि को लेकर काफी चिंतित नजर आ रहे हैं ! मोदी के भाषणों एवं सियासी बयानों को अगर गौर से देखा जाय तो ऐसा प्रतीत होता है कि वो पार्टी के लिए कम और अपनी राष्ट्रीय छवि को सुधारने पर ज्यादा काम करते नजर आ रहे हैं ! मोदी को इस बात का बखूबी इल्म है कि राष्ट्रीय राजनीति में अगर उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर उभरना है तो उन्हें हर वर्ग एवं समुदाय के प्रति सॉफ्ट दिखना पड़ेगा ! मोदी का युवाओं के बीच आकर अभिभाषण देना यह जाहिर करता है कि वो युवाओं के बीच अपना विकास और प्रगतिशीलता का मॉडल रखना चाहते हैं ना कि अपनी हिन्दुवादी छवि को दिखाना चाहते हैं ! गिलास का आधा भरा और आधा खाली होने की बजाय हवा और पानी से पुरा भरा गिलास होने का अपना खोजी नजरिया प्रस्तुत करने कर मोदी ने अपने सियासी तेवरों में आगामी बदलाओं का संकेत दिया है !

कुम्भ स्नान के दौरान आयोजित संतों की महासंसद में राजनाथ सिंह ने बेशक मंदिर निर्माण की बात की है लेकिन उनकी बातों को इस संदर्भ में कतई नहीं लिया जा सकता कि वो धर्म संसद को इस बात के लिए पूरी तरह आश्वस्त किय हैं कि राम मंदिर उनका प्रमुख चुनावी मुद्दा होगा ! बेहद सधे अंदाज में रामा मंदिर निर्माण की जरुरत पर बोलते हुए राजनाथ सिंह ने इस बात का ख्याल रखा कि राम मंदिर मुद्दा उनके सरकार के खिलाफ प्रायोजित तमाम मुद्दों पर भारी ना पड़े ! चुकि, भाजपा के समक्ष बड़ी चुनौती संघ और अन्य हिन्दुवादी संगठनो को जोड़कर रखने की हमेशा से रही है ! भाजपा के समक्ष हमेशा से सबसे बड़ी चुनौती अपने निजी राजनीतिक योजनाओं एवं अपने धार्मिक सहयोगी संगठनो के बीच समन्वय बिठाए रखने की रही है ! अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर भाजपा की यह दुविधा हमेशा से रही है कि हिंदुत्व को पूरी तरह खारिज कर उसका कोई वजूद नहीं बचेगा जबकि इस मुद्दे पर अगर खुलकर आती है तो सत्ता के समीकरण उसके अनुकूल नहीं बनेंगे,बेशक कुछ सीट आदि जीत कर आ जाये ! अपनी पारंपरिक विचारधारा एवं बदलते राजनीतिक परिवेश कि दुविधा में फंसी भाजपा अब बीच के रास्तों पर चलने को लेकर ज्यादा आश्वस्त दिख रही है ! धर्मसंसद में वो मंदिर की बात भी करती नजर आयेगी और जनता के बीच भ्रष्टाचार,गरीबी,महंगाई जैसे जन्सरोकारी मुद्दों पर सरकार को घेरती भी नजर आएगी ! लोकसभा चुनाव के नजरिये से भाजपा में चल रहीं इन कवायदों को तटस्थता की सियासत के तौर पर देखा जाना चाहिए ! इसी तटस्थता की सियासत में राजनीतिक बदलाओं की राह तलाश रही भाजपा को कुम्भ में मंदिर की बात करते देखा जा रहा है तो दिल्ली में नरेंद्र मोदी बिजिनेस मॉडल पर भाषण देते नजर आ रहे हैं! हालाकि सियासत के नजरिये से भाजपा कोई नया फार्मूला इजाद कर रही है ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता है ! इस तरह की राजनीतिक कवायदें भारतीय राजनीति में अक्सर देखने को मिलती रहीं हैं ! इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा को अगर सबसे ज्यादा संकट किसी से है तो वो स्वयं भाजपा से ही है ! अपनी तमाम विविधताओं में समन्वय बिठा पाने में जब-जब भाजपा नाकामयाब हुई है उसकी कीमत उसको अदा करनी पड़ी है ! मोदी और राजनाथ के भाषणों को सियासत में समन्वय बिठाने की इन्ही कवायदों के नजरिये से समझने की जरुरत है ! बेशक, राजनाथ सिंह द्वारा अपनी अध्यक्ष पद की चुनौतियों को संदर्भ में रख लोकसभा चुनाव की पृष्ठिभूमि तैयार की जा रही हो या मोदी द्वारा निजी छवि को राष्ट्रीय पटल के अनुकूल लाने की दिशा में काम किया जा रहा हो ! लेकिन इस पुरे मामले में इतना तो नजर आता ही है कि भाजपा अब अपनी पारंपरिक विचारधारा के साथ-साथ आधुनिक राजनीतिक बदलाओं के प्रति सजग होती नजर आ रही ! शायद भाजपा के इसी तटस्थता की सियासत से कांग्रस आदि राजनीतिक दल छटपटाहट की स्थिति में हैं क्योंकि भाजपा का हार्डकोर हिन्दुइज्म उनके राजनीतिक भविष्य के लिए ज्यादा फायदेमंद रह सकता है !

 

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1 Comment on "दिल्ली से कुम्भ तक भाजपा के सियासी निहितार्थ"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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भाजपा जो कुछ क्र रही है उस से वेह सत्ता में नि आ सकती क्योंकिकाठ की हांडी बार बार नही चद्ती.

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