लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई यानी संयुक्त अरब अमीरात यात्रा इस मायने में ज्यादा अहम् है कि दोनों देशों के बीच आतंकवाद,रक्षा एवं व्यापार के र्मोचे पर परस्पर विश्वास के नए अध्याय शुरू होंगे। क्योंकि विदेश और कूटनीति के स्तर दोनों देशों के बीच पिछले 34 साल से स्थिरता बनी हुई है। इस परिप्रेक्ष्य में मोदी की यात्रा इस जाड़ता को तोड़ने का काम कर सकती है। मोदी के पहले प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खाड़ी के इस मुख्य देश की यात्रा की थी। किंतु तब से लेकर अब तक द्विपक्षीय वर्ताओं का पूरे विश्व में परिदृश्य में बदल वुका है। कूटनीतिक और राजनीतिक संबंधों से कहीं ज्यादा कारोबारी हित अहम् हो गए हैं। मोदी का प्रमुख मकसद भी यही है,क्योंकि भारत को विकास के लिए प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की जरूरत है। अलबत्ता अब इन यात्राओं के परिप्रेक्ष्य में यह भी रेखाकिंत करने की जरूरत है कि सवा साल के कार्यकाल में 27 देशों की यात्रा की उपलब्धियां क्या रहीं ?

नरेंद्र मोदी की दो दिनी यूएई की यात्रा पूरी हो गई। इस यात्रा के लाभ भारत के लिए क्या होंगे,यह तो भविष्य तय करेगा,लेकिन हमारे देश में द्विपक्षीय वार्ता की मीमांसा से ज्यादा खबरिया चैनलों पर अबूधाबी की मशहूर शेख मस्जिद में मोदी की यात्रा छाई रही। इन बहसों से साफ हुआ है कि हमारा इलैक्ट्रोनिक मीडिया टीआरपी के तात्कालिक लाभ के लिए सांप्रदायिक सद्भाव को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाने का काम कर रहा है। दरअसल,दलीय प्रवक्ताओं से मस्जिद में जाने को लेकर जिस तरह के सवाल पूछे गए और प्रवक्ताओं ने जो उत्तर दिए,उन्होंने दो समुदायों के बीच कट्टरता बढ़ाने के साथ धु्रवीकरण का काम भी किया है। यदि मीडिया सद्भाव का पैरोकार है तो उसे भविष्य में ऐसी बेमतलब बहसों की प्रस्तुति से बचने की जरूरत है।

modi-in-uae-7591यहां यह ख्याल भी रखने की जरूरत है कि हरेक देश,किसी भी बड़े अतिथी के आगमन पर अपने देश के वास्तुशिल्प के अद्भूत नमूनों को दिखाता है। वैसे भी यह मस्जिद दुनिया की तीसरी बड़ी मस्जिद है। साथ ही इसका निर्माण अद्भुत कलात्मक-कौशल के साथ हुआ है। इसकी सजावट में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल है। लिहाजा यह अबूधाबी का प्रमुख धार्मिक स्थल होने के साथ पर्यटन स्थल भी है। सैलानी इस इमारत को बड़े उत्साह से देखते हैं। मोदी के जो निदंक यह कह रहे हैं कि 2011 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने सद्भावना मिशन के दौरान मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया था। उन्हें ध्यान देने की जरूरत है कि शेख जायेद मस्जिद का अवलोकन करते हुए भी मोदी ने इस्लाम के किसी प्रतीक चिंह को धारण नहीं किया हुआ था। अलबत्ता यहां मोदी ने इस्लाम को शान्ति और सद्भाव का धर्म बताकर उन सभी दलीय प्रतिबद्धता से जुड़े राजनेताओं को करारा जवाब दिया है,जो मोदी या भाजपा की राजनीति को सांप्रदायिक चश्मे से देखते हैं। इसके भी उलट वास्तव में सद्भाव का परिचय तो यूएई सरकार ने दिया है,जो उसने अबूधाबी में बड़ी संख्या में रहने वाले हिंदु धर्मावलंबियों की धार्मिक भावना का आदर करते हुए मंदिर निर्माण के लिए जमीन देने की सार्वजानिक घोशणा कर दी। मोदी विरोधियों के लिए यह सबक है। अबूधाबी में हिंदुओं की बड़ी आबादी होने के बावजूद कोई मंदिर नहीं है। दुबई में जरूर शिव और कृष्ण के मंदिंर हैं। हालांकि मंदिर-मस्जिद से जुड़े इन मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में कूटनीतिक अर्थ अंतर्निहित हो सकते हैं,लेकिन इन्हें धार्मिक श्रृद्धा व सद्भाव के दायरे में ही देखने की जरूरत है।

अमेरिका और चीन के बाद भारत के सबसे अहम् कारोबारी संबंध यूएई से ही हैं। यूएई की कुल अर्थव्यवस्था का ढांचा 800 अरब डाॅलर का है। लेकिन भारत में उसका निवेश महज 3 अरब डाॅलर का है। मोदी ने यहां के व्यापरियों को संबोधित करते हुए उनसे भारत में 100 अरब डाॅलर के निवेश का आग्रह किया है। वैसे भी भारत में जितनी बड़ी संख्या में उपभोक्ता हैं और भारत को जिस पैमाने पर संरचनात्मक विकास की जरूरत है,उस लिहाज से दुनिया के ज्यादातर कारोबारी देशों की निगाहें भारत पर टिकी हैं। लेकिन भारत में प्रशासनिक अड़चनों के चलते उद्योगपति आसानी से धन लगाने को राजी नहीं होते। चूंकि मोदी इस सच्चाई को जानते हैं,इसलिए उन्होंने इस प्रशासनिक शिथिलता का ठींकरा पूर्ववर्ती सरकार पर फोड़ने में देर नहीं की। उन्होंने कहा ‘पूर्व सरकारों के ‘अनिर्णय‘ और ‘सुस्ती‘ के चलते भारत की अर्थव्यस्था ठहरी सी लगती है। लेकिन अब विश्व बैंक,अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और मूडी जैसी संस्थाएं भारतीय अर्थव्यवस्था को उभरते हुए देख रही हैं।‘ विदेशी धरती पर पूर्ववर्ती सरकारों पर कटाक्ष करना कतई उचित नहीं है। घरेलू लड़ाई,घर के अंगन में ही लड़ी जाए तो कहीं ज्यादा बेहतर है,क्योंकि इससे एक तो देश की छवि बिगाड़ती है,दूसरे प्रधानमंत्री जैसे गरिमामायी पद का ओछापन भी प्रगट होता है।

यूएई भारत में  बड़ा निवेश इसलिए कर सकता है,क्योंकि वहां के व्यापरियों के पास तेल का अकूत धन है और वे नगरों का आधुनिक व सुविधाजनक ढांचा खड़ा करने में माहिर हैं। दुबई और अबूधाबी रेगिस्तान में खड़े किए गए ऐसे आकर्षक व सुरक्षित शहर हैं कि इन शहरों को देखने के लिए सैलानियों का मन मचलता रहता है। मोदी जिन 100 स्मार्ट शहरों की परिकल्पना में लगे है,उनके निर्माण में अरब के व्यापारी कारगर भूमिका निभा सकते हैं। भारत में आधारभूत संरचना,भवन-निर्माण,ऊर्जा और फसल,फल व सब्जी के सरंक्षण के लिए शीत व भडांर ग्रहों की बड़ी तदाद में जरूरत है। भारत को गैस व तेल की जरूरत भी है। इन सभी क्षेत्रों में अरब-व्यापारी कुशल हैं। लिहाजा इनका निवेश और भगीदारी भारत के लिए अह्म है।

इन सबसे ज्यादा भारत के लिए अहम् सवाल आतंकवाद की ढाई दशक से जारी प्रताड़ना है। दरअसल,भारत के आतंकियों की पैठ यूएई में है। नबंवर 2008 में मुबंई में आतंकवादी हमले के शड्यंत्र से जुड़े रहे डेविड हेडली दुबई में सक्रिय रहा है। इस हमले का जनक दाउद इब्राहिम का युएई में 1000 करोड़ का कारोबार फैला है। यूएई सरकार यदि आतंकवादियों के कारेाबार पर शिकंजे की पहल मोदी-यात्रा के परिप्रेक्ष्य में करती है तो यह पहल निश्चित ही दोनों देशों के बीच स्थाई प्रगाढ़ता का आधार बनेगी। लेकिन इस दिशा में कोई सार्थक नतीजा सामने आएगा,इसकी उम्मीद प्रधानमंत्री की यात्रा पूरी होने के बाद मंदी पड़ गई है।

यूएई में 26 लाख भारतीय रहते हैं,जो हर साल 12 अरब डाॅलर की धनराशि भारत भेजते हैं। लेकिन इन्हें कठिन हालातों से रोजाना जूझना होता है। दलालों द्वारा इनके साथ ठगी के मामले तो सामने आते ही हैं,महिलाओं का दैहिक शोषण भी ये करते हैं। इनकी समस्याओं के निदान के लिए वेबसाइड उपलब्ध कराने का वादा मोदी ने किया है,यह सराहनीय है। लेकिन भारतीय दूतावास के कर्मचारी शिकायतों का निपटारा किस तत्परता से करते हैं,यह जल्दी ही देखने में आएगा। दरअसल मोदी अब तक 27 देशों की यात्रा कर चुके हैं,लेकिन इन यात्राओं के प्रतिफल क्या रहे,यह तथ्य पारदर्शी रूप में सामने नहीं आए हैं। इनके खुलासे की जरूरत है।

 

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