लेखक परिचय

रमेश कुमार दुबे

रमेश कुमार दुबे

लेखक पर्यावरण एवं कृषि विषयों पर कई पत्र-पत्रिकाओं में स्‍वतंत्र लेखन कार्य कर रहे हैं।

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_44733146_children_226हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन रक्षा को एक बुनियादी अधिकार माना गया है; लेकिन सभी नागरिकों को भरपेट भोजन हासिल न हो तो इस अधिकार का क्या महत्व रह जाता है। जनसंख्या वृद्धि, खेती की बढती लागत, मिट्टी व पानी की गुणवक्ता में गिरावट, कृषि भूमि में ह्रास, बदलता मौसम चक्र जैसे कारणों से खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि लगभग रूक गई है। बढती जनसंख्या के अनुरूप खाद्यान्न उत्पादन न होने से प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में गिरावट आ रही है। इसके परिणामस्वरूप कुपो¬षण के शिकार लोगों की संख्या बढ रही है। यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का सबसे कुपोषित देश है और यहां प्रतिदिन पौने छह हजार बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2007-08 के अनुसार 1960 के दशक में शुरू की गई कृषि नीतियों के परिणामस्वरूप भारत खाद्यान्न के मामले में लगभग आत्मनिर्भर हो गया और व¬र्ष 1976-77 से 2005-06 के दौरान विशेष परिस्थितियों को छोड़कर खाद्यान्न का शायद ही कोई आयात किया गया। तथापि खाद्यान्नों के उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर 1990 से 2007 के दौरान 1.2% तक गिर गई, जो जनसंख्या के औसतन 1.9% की वार्षिक वृद्धि दर की तुलना में कम है। यही कारण है कि अनाजों और दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में गिरावट आ रही है। अनाजों की दैनिक खपत 1990-91 में 468 ग्राम प्रति व्यक्ति से गिरकर 2005-06 में 412 ग्राम रह गई। इसी अवधि में दालों की दैनिक खपत 42 ग्राम प्रति व्यक्ति से घटकर 33 ग्राम रह गई। अनाज और दालों की खपत के ये आंकड़े रा¬ष्‍ट्रीय औसत के हैं। स्प¬ष्‍ट है इसमें व्यापक अंतर विद्यमान है। समाज के कमजोर वर्गों, जिनका आर्थिक आधार सुदृढ नहीं है और नियमित आय का कोई साधन नहीं है, उनमें अनाज और दालों की खपत रा¬ट्रीय औसत की तुलना में अत्यधिक कम है। दूसरे शब्दों में ऐसे लोग गंभीर रूप से कुपोषित हैं। ऐसे कुपोषित लोगों की संख्या लाख दो लाख न होकर करोड़ों में है। स्वयं सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में 77% जनसंख्या (83 करोड़ लोग) की दैनिक आय 20 रूपये से भी कम है। इससे कुपो¬षण की व्यापकता का अंदाजा लगाया जा सकता है।निरंतर हल्की होती थाली से देश में कुपो¬षण और भुखमरी की जो स्थिति आज उत्पन्न हुई है वह अचानक आसमान से नहीं टपकी है। उसके लिए घरेलू कृषि एवं कृ¬षेतर नीतियां उत्तरदायी है। उदारीकरण-भूमंडलीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद विकास की सारी चिंता विकास दर में सिमट कर रह गई है। यह मान लिया गया कि यदि विकास दर ऊंची बनी रहेगी तब गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, कुपो¬षण की समस्याएं स्वत: खत्म हो जाएंगी। इसी नीति का परिणाम है कि कृषि एवं ग्रामीण जीवन में निवेश निरंतर घटता गया। यही कारण है कि एक ओर अर्थव्यवस्था 9% वार्षिक वृद्धि दर की गुलाबी तस्वीर प्रस्तुत कर रही है तो वहीं दूसरी ओर कृषि 2-3% की दर से रेंग रही है। इसीलिए कहीं-कहीं समृद्धि की चकाचौंध है और अधिकतर जगहों पर गरीबी का घना अंधेरा।

उदारीकरण के दौर में एक ओर तो कृषि में निवेश में कमी आई तो दूसरी ओर बैंकों के कुल ऋणों में कृषि ऋणों का हिस्सा कम होता गया। सामान्यत: कृषि ऋणों को दो भागों में बांटा जाता है प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष ऋण सीधे किसानों को दिए जाते हैं जबकि अप्रत्यक्ष ऋण कृषि क्षेत्र में सहायक उद्यमों व उद्यमियों को। कृषि ऋणों में प्रत्यक्ष ऋणों का हिस्सा जहां कम हुआ है वहीं अप्रत्यक्ष ऋणों का हिस्सा बढा है। रिजर्व बैंक ने एक नए प्रावधान के तहत कृषि ऋण की ऊपरी सीमा एक करोड़ कर दी है। संप्रग सरकार ने पिछले तीन वर्षों के दौरान कृषि क्षेत्र को दिए जाने वाले ऋणों की मात्रा को बढाकर दो गुना कर दिया है। लेकिन ऋण की ऊपरी सीमा में वृद्धि के कारण इसका लाभ किसानों को न मिलकर व्यापारियों, बिचौलियों को मिल रहा है। यही कारण है कि कृषि संबंधी जरूरतों के लिए आज भी अधिकतर किसान असंगठित स्रोतों (साहूकार, महाजन) से ऊँची ब्याज दर पर ऋण लेने के लिए बाध्य है। इससे उनकी उपज का एक बड़ा हिस्सा साहूकारों, महाजनों की भेट चढ ज़ाता है।

देश में व्याप्त कुपो¬षण व भुखमरी को गेहूं व तिलहन उत्पादन संबंधी सरकारी नीतियों से समझा जा सकता है। 2000 से 2004 के बीच सरकारी गोदाम अनाजों से ठसाठस भरे थे। सरकार अनाज उत्पादन को हतोत्साहित करने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में नाममात्र की वृद्धि किया ताकि किसान दूसरी फसलों की ओर उन्मुख हों। अनाजों के उत्पादन में लाभ होता न देख किसान अब नकदी फसल उगाने पर बल देने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि देश में अनाजों की कमी हो गई। जिस देश ने 2000 से 2004 के दौरान भारी सब्सिडी देकर गेहूं का निर्यात किया था उसे ही 2006 में 55 लाख टन और 2007 में 18 लाख टन गेहूं का आयात अत्यंत महंगे दर पर करना पड़ा।

1980 के दशक में देश में खाद्य तेल आयात चिंताजनक स्तर तक बढ ग़या था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसे सज्ञान में लिया और तिलहन उत्पादन को बढावा देने की नीति की शुरूआत की। 1986 में तिलहन पर तकनीकी मिशन की शुरूआत की गई। किसानों को उन्नत बीज, व्यावसायिक प्रबंधन, लाभकारी समर्थन मूल्य प्रदान किया गया। इसका परिणाम सकारात्मक रहा और 1992 में भारत खाद्य तेलों के मामले में लगभग (98%) आत्मनिर्भर हो गया। लेकिन उदारीकरण-भूमंडलीकरण की नीतियों के तहत जब दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में सस्ता पामोलिव तेल मिलने लगा तब सरकार ने तिलहन उत्पादकों को प्रोत्साहन देना बंद कर दिया। इससे तिलहन उत्पादन प्रभावित हुआ और देश में खाद्य तेलों की कमी हो गई। अब देश खाद्य तेलों के मामले में आयात पर निर्भर रहने लगा है। आज भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा (60 लाख टन वार्षिक) खाद्य तेल आयातक देश बन चुका है।

जनसंख्या, जीवन स्तर व मांग में वृद्धि से सभी को खाद्य व पो¬षण सुरक्षा प्रदान करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। यह लक्ष्य आयात से कदापि पूरा नहीं किया जा सकता; क्योंकि भारत कोई छोटा-मोटा देश तो है नहीं जो खाद्यान्न आयात कर सभी निवासियों का पेट भर सके। दूसरे जब विश्व स्तर पर खाद्यान्नों के लिए मारामारी मची हो तब भारत खाद्यान्न का आयात करेगा कहां से ? ऐसी स्थिति में घरेलू उत्पादन में वृद्धि ही एकमात्र उपाय है। इसके लिए आवश्ययक है कि कृषि व ग्रामीण विकास रणनीति में जनोन्मुखी परिवर्तन किए जाएं। देश में 82% किसान लघु व सीमांत हैं, जोत छोटी व बिखरी हुई है। वर्तमान कृषि विकास रणनीति पूंजी प्रधान रही है जिस कारण लघु व सीमांत किसान उसे बड़े पैमाने पर नहीं अपना सके हैं। अत: ऐसी कम लागत वाली कृषि रणनीति की जरूरत है जिसे लघु व सीमांत किसान बड़े पैमाने पर अपना सकें। दूसरे, कृषि उत्पादकता एवं उत्पादन संबंधी रणनीतियां दीर्घकालिक आधार पर बने। अत: रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों की जगह जैविक उर्वरक, हरी खाद, फसल चक्र, मिश्रित कृषि, अंतरफसली खेती जैसी दीर्घकालिक रणनीतियों को अपनाया जाए। तीसरे, किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिया जाए ताकि खेती लाभ का सौदा बन सके। चौथे, कृषि एवं ग्रामीण जीवन को विविधीकृत किया जाए। कृषि के साथ-साथ पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मत्स्य-मधुमक्खी पालन जैसी आय व रोजगारवर्ध्दक गतिविधियों को शुरू किया जाए। इससे कृषि कार्य मौसमी न होकर बारहमासी स्वरूप का हो जाएगा। पांचवें, ग्रामीण क्षेत्रों में कृषिगत आधारभूत ढांचे को सुदृढ क़िया जाए। सिंचाई, बिजली, सड़क, उपज की खरीद बिक्री आदि की पक्की व्यवस्था हो।

लेखक- रमेश कुमार दुबे
(लेखक पर्यावरण एवं कृषि विषयों पर कई पत्र-पत्रिकाओं में स्‍वतंत्र लेखन कार्य कर रहे हैं)

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