लेखक परिचय

अरूण पाण्डेय

अरूण पाण्डेय

मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले श्री अरुण पाण्डेय अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ‘दैनिक आज’ अखबार से की उसके बाद ‘यूनाइटेड भारत’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘देशबंधु’, ‘दैनिक जागरण’, ‘हरियाणा हरिटेज’ व ‘सच कहूँ’ जैसे तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय अखबारों में बतौर संवाददाता व समाचार संपादक काम किया। वर्तमान में प्रवक्ता.कॉम में सम्पादन का कार्य देख रहे हैं।

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पूरे देश में मुस्लिम महिलाओं का दोहन हो रहा है और कोई बोलने को तैयार नही है। क्या वह भारतीय नही है , देश व प्रदेश में बनने वाली सरकारें उनके वोटों से नही बनती, आखिर यह खामोशी क्यों ? उनके नाम पर कोई आवाज क्यों नही , उनके साथ हर समय , उनके घर में इससे भी भयावह खेल खेला जा रहा है जिससे उनका जीवन तो बर्बाद हो ही रहा है उसके साथ साथ उनके बच्चों का जीवन भी तबाह हो रहा है। वह मुफलिसी भरा जीवन इसलिये जीने को मजबूर है कि उनकी मद्द करने वाला कोई नही है, सडको पर धूमते है और दुत्कार भरा बचपन बीताकर यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही अपराधी बन रहे है, क्या वह भारतीय नही है। भारतीय का ढोग करने वाला राष्ट्रीय स्वयं संध इस मामले पर कुछ क्यों नही बोलता , देश के राजनैतिक दल इस बारे में अपना राय क्यों नही व्यक्त करते , चैनलों में इस पर परिचर्चा क्यों नही होती , इमाम इस मसले पर खामोश क्यांे है, काजी क्या अल्फाज खो चुके है या उनमें दम नही रहा। एैसा तमाम सवाल है जो आज मुस्लिम बिरादरी से ताल्लुक रखने वाली महिलायें आज देश से पूछ रही है लेकिन देश है कि कुछ बोलता ही नही ,उन्हें शरीयत अदालतों के हवाले छोड रखा था, जहां सिर्फ उनका दोहन हो रहा है और कुछ नही।
मुस्लिम परिवारों मंे निकाह को लेकर एक व्यवस्था थी जिसके अनुसार पारिवारिक रिश्तों को तहजीब इसलिये दी जाती थी कि परिवार की बेटी आंखों से दूर न हो और उनका वंश भी सलामत रहे, यह सैयद लोगों में होेता था , जिसे बाद में अरब से आये यूसुफजई पठानों से इस फार्मूला को अपनाया ओर धीरे घीरे इस व्यवस्था को कुरान शरीफ का एक हिस्सा बना दिया गया जबकि निकाह की व्यवस्था को लेकर जो नियम कुरान शरीर है, वह शायद इससे जुदा है जिसपर अमल होना चाहिये था लेकिन उसे बारीकी से नही देखा गया और अमल नही किया गया। मुस्लिम महिलाओं की सबसे बडी पीडा यह है कि जिन रिश्तों के बीच पली बढी और बाद में उन्ही रिश्तों में निकाह भी हो गया ,वहां भी उनके साथ शरीयत के नाम पर उनके अपने छलावा ही कर रहें हंै। पुरूष प्रधान मुस्लिम समाज में हर तरफ उनका दोहन हो रहा है ओर परिवार के लोग उसकी किस्मत मानकर मौन रहते है कोई उसका साथ नही देेता। दूध का रिश्ता मानने वाले लोग जिस्मानी रिश्तों को कैसे भूल जाते है, जानवर भी कुछ दिनों में वफादार हो जाता है फिर इंसान होने का दावा करने वाले यह लोग वफादार क्यों नही होेते, यह बात मुस्लिम महिलाओं के गले आज तक नही उतर रही है ।
आज के दौर की माने तो निकाह को लेकर यह असुरक्षा हरतरफ है , पहले उनकी मां भी असुरक्षा के माहौल में रही , इसलिये इसे किस्मत की बात मानने को आज की पीढी मानने को तैयार नही है। वह बुरका घर में पहनना चाहती है लेकिन बाहर निकलते ही उसकी जगह जहां है उसे वहां पहुचाने में देर नही करती । इस मामले में जब दिल्ली विश्वविधालय की कुछ लडकियों से बात की तो उनका जबाब था कि उनकी जिन्दगी है , वह जो चाहें करे वह इन आडम्बरों को मानने के लिये तैयार नही है । वह इतनी उग्र हो गयी कि कहा कि अगर उनका शौहर दूसरी शादी करेगा तो उसे सबक सिखाने के लिये किसी भी स्तर पर जाने को तैयार है।
यहां यह बता देना जरूरी है इसी प्रवक्ता के मंच से एक लेख में यह पूछा गया था कि मुस्लिम तलाक का कानून हिन्दूओं के तलाक जैसा क्यों नही है। जिसपर पारिवारिक कानून पर क्या सोचती हैं मुस्लिम महिलाएं…इस विषय पर एक गैरसरकारी संस्था भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने देश में 4710 मुस्लिम महिलाओं की राय जानी। इस बात को सर्वाधिक चर्चित व सबसे तेज कहे जाने वाले चैनल आजतक ने अपने यहां प्रसारित किया । जिसके अनुसार शादी, तलाक, एक से ज्यादा शादी, घरेलू हिंसा और शरिया अदालतों पर महिलाओं ने खुलकर अपनी राय रखी। राय रखने वाली 73 फीसदी महिलाएं गरीब तबके से थीं, जिनकी सालाना आय 50 हजार रुपये से भी कम है. सर्वें में शामिल 55 फीसदी औरतों की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई और 44 फीसदी महिलाओं के पास अपना निकाहनामा तक नहीं है। आखिर काजी ने उन्हें ईमाम से क्यों नही दिलवाया इस पर समाज मौन कैसे रहा यह उस महिला का अपमान नही है जिसका निकाह हुआ या फिर निकाह ही खोट भरे मन से किया गया जिसका लाभ आगे लिया जा सके।
सर्वे के मुताबिक 53.2 फीसदी मुस्लिम महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं.। 75 फीसदी औरतें चाहती थीं कि लड़की की शादी की उम्र 18 से ऊपर हो और लड़के की 21 साल से ऊपर.हो जैसा कि हिन्दूओं में है। सर्वे में शामिल 40 फीसदी औरतों को 1000 से भी कम मेहर मिली, जबकि 44 फीसदी को तो मेहर की रकम मिली ही नही। इसके अलावा 525 तलाकशुदा महिलाओं में से 65.9 फीसदी का जुबानी तलाक हुआ। 78 फीसदी का एकतरफा तरीके से तलाक हुआ। 88.3 फीसदी औरतें चाहती हैं कि तलाक-ए-अहसान तलाक का कानूनन तरीका हो, जो 90 दिनों की प्रक्रिया हो और जिसके दौरान बातचीत हो और मनमर्जी पर नियंत्रण हो.। 83.3 फीसदी औरतों को लगता है कि मुस्लिम कानून लागू हो, तो उनकी पारिवारिक समस्याएं हल हो सकती हैं और सरकार को इसके लिए कदम उठाना चाहिए जबकि 90 फीसदी औरतें चाहती हैं कि एक कानूनी सिस्टम के जरिए काजियों पर नियंत्रण रखा जाए।
यहां यह भी बात कहना जरूरी है यह सर्वे महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, बिहार, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा में किया गया।दिल्ली व मुंबई में नही किया गया है जहां मुस्लिम महिलाओं के पास पति के द्वारा छोड दिये जाने के बाद वेश्यावृत्ति के अलावा कोई और मार्ग नही होता, जिस संस्था ने ये सर्वे कराया है, वह चाहती है कि कुरान पर आधारित एक कानून हो, ताकि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति बेहतर हो सके।

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