लेखक परिचय

इफ्तेख़ार अहमद

मो. इफ्तेख़ार अहमद

लेखक इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के अनुभवी पत्रकार है। वर्तमान में पत्रिका रायपुर एडिशन में वरिष्ठ सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं और निरंतर लेखन कर रहे हैं। कई राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में इनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। पत्र पत्रिकाओं के लिए लेख मंगवाने हेतु 09806103561 पर या फिर iftekhar.ahmed.no1@gmail.com पर संपर्क करें.

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मोहम्मद इफ्तेखार अहमद,

मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जनाधार खो चुकी समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश सरकार लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही एक बार फिर गंदी राजनीति कर समाज में नफरत की खाई को और गहरा करने पर आमादा दिखाई दे रही है। खबरों के मुताबिक सपा सरकार ने बिना किसी जांच आयोग के गठन और किसी सिफारिश के ही भड़काऊ भाषण देकर दंगों को हवा देने के आरोपी मुस्लिम नेता व बीएसपी सांसद कादिर राणा, विधायक नूर सलीम और मौलाना जमील अहमद, पूर्व कांग्रेस मंत्री सईदुज्जमा और उनके बेटे सलमान सईद के साथ ही समुदाय के नेता असद जमा, नौशाद कुरैशी, एक व्यापारी अहसान, वकील सुलतान मशीर में से बीएसपी सांसद कादिर राणा, मुजफ्फरनगर के विधायक नूर सलीम राणा, जमील अहमद और कांग्रेसी नेता सईदुज्मा के खिलाफ केस वापस लेने जा रही है। सपा सरकार की इस राजाज्ञा से भले ही कुछ मुस्लिम नेताओं को फौरी राहत मिल जाए। लेकिन, इसकी असल कीमत आम मुसलमानों को चुकानी पड़ सकती है। क्योंकि, सपा सरकार के इस कदम से समाज में नफरत फैलाने के एक खतरनाक साजिश और सामप्रदायिक संगठनों से साठ-गांठ की बू आ रही है।
मुसलमानों के वोटों के बल पर बनी सरकार आज अगर कथित मुस्लिम आरोपियों को बिना किसी जांच के क्लीन चिट दे देती है तो कल किसी और पार्टी की सरकार आने पर दूसरे समुदाय के दंगाइयों को अगर वह बरी कर दें तो मुसलमान किस मुंह से उसका विरोध कर पाएंगे? अपने-अपने वोट बैंक से जुड़े लोगों को इसी तरह से क्लिनचिट देने का सिलसिला चल पड़ा तो न्याय नाम की कोई चीज ही नहीं बचेगी और जनता कानून को खुद अपने हाथों में लेना शुरू कर देगी। जिसका अंजाम बहुत ही भयानक हो सकता है।
जिन इलाकों में 1947 में भी दंगे नहीं हुए, वहां आज दंगे हो रहे हैं। आपस में मिल जुलकर एक साथ रहने वाली कौमें अगर एक दूसरे की खून की प्यासी हो गई हैं तो इसकी कुछ तो वजहें होंगी? आखिर लोगों ने क्यों अपने हाथों में कानून लेना शुरू कर दिया? सपा सरकार के इस फैसले के बाद अब आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां राजधर्म निभाने में कहीं न कहीं कोताही जरूर हुई है।
सरकार का काम होता है कानून का राज कायम करना और अपने समर्थक और विरोधियों में बिना फर्क किए कानून के मुताबिक न्याय करना। लेकिन, जब सरकारें अपने निजी स्वार्थों के लिए सत्ता के धर्म का पालन नहीं करती है तो लोग कानून को खुद ही हाथ में लेना शुरू कर देते हैं। इसका नतीजा होता है मुजफ्फरनगर की वर्तमान हिंसा, गुजरात हिंसा और उसके बाद देश में बढ़ती आतंकी घटनाएं, जिसकी कीमत देश के आम आदमी को ही चुकानी पड़़ती है।
लिहाजा, वक्त की नजाकत को समझते हुए देश के तमाम हिन्दू-मुस्लिम दानिश्वरों (बुद्धिजीवियों) और संगठनों को सपा सरकार के इस फैसले का हिकमतन विरोध करना चाहिए। अगर सपा सरकार अपने इस इरादे को अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब हो गई तो सरकार के इस फैसले से जो नफरत की ज्वाला दहकाई जाएगी, उसे रोकना शायद ही किसी के बस की बात हो। इस नफरत की आग में सपा अपनी राजनीतिक रोटी सेंक पाएगी या नहीं ये तो कहना मुश्किल है। लेकिन, सांप्रदायिक राजनीति कर सत्ता का ख्वाब देखने वाले के ख्वाब जरूर पूरे हो जाएंगे।
अगर मुलायम को इन नेताओं की बेकसूरी का इल्म है तो उन्हें किसी आयोग का गठनकर उनकी सिफारिश के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए। या फिर फास्ट ट्रैक अदालत का गठन कर उन्हें कानूनी सहायता देनी चाहिए, न कि मनमाने तरीके से एक समुदाय विशेष को खुश करने के लिए राजाज्ञा जारी करनी चाहिए।

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1 Comment on "आग से खेल रहे हैं मुलायम"

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mahendra gupta
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मुस्लिम संप्रदाय के द्वारा किया गया कोई अपराध अपराध नहीं.कांग्रेस व बी स पा को भी बचा लिया ताकि वे चुप रहें.भ ज पा में ही उनको अपराधी नज़र आये.आखिर मुलायम का राज करनेका नजरिया क्या है साफ़ हो गया है.कांग्रेस के टुकड़ों पर पलने वाले मुलायम गालियां खा कर भी सोनिआ की गोद में बैठना पसंद करतेहैं.इन कके जैसा मूढ़ व्यक्ति और कौन होगा?साम्प्रदायिक खेल खेलने में तो वे सदा के माहिर हैं नई क्योंकि उनकी राजनितिक रोजी रोटी उस से ही चलती है.

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