लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

Posted On by &filed under धर्म-अध्यात्म.



hazभारत से प्रतिवर्ष औसतन सवा लाख लोग हज करने के लिए मक्का मदीना जाते हैं। इस्लामी आदेशानुसार हज यात्रा पर उसी इस्लामी – धर्मावलम्बी को जाना चाहिए, जो अपने जीवन के सभी पारिवारिक दायित्वों से मुक्त हो चुका हो और जिसके पास अपनी गाढ़ी कमाई हो और हज के निमित्त वो उसी कमाई को खर्च करे l प्रतिवर्ष आयोजित की जाने वाली हज यात्रा पर भारत सरकार अनुदान के रूप में करोड़ों रुपए खर्च करती है और राज्य सरकारों का पूरा अमला ही रवानगी से लेकर वापसी तक मुस्तैद रहता है , मानो एक धार्मिक यात्रा ना हो किसी राष्ट्राध्यक्ष के स्वागत की तैयारी हो l एक पंथनिरपेक्ष देश में एक विशेष वर्ग की मजहबी यात्रा पर अनावश्यक सरकारी खर्च मेरी समझ से परे है l

हज के अवसर पर प्रतिवर्ष सरकारी प्रतिनिधिमंडल सरकारी खर्च पर सऊदी अरब रवाना किया जाता है। इसकी संख्या निश्चित नहीं होती है। राज्य सरकारें बेरोक-टोक जितना चाहें उतना लम्बा-चौड़ा प्रतिनिधिमंडल भेज सकती हैं । इस प्रतिनिधिमंडल के लिए कोई नियमावली नहीं है। सरकार जिसे चाहे उसे इसमें शामिल करती है। अजीब विडम्बना है … ! अनौपचारिक रूप से पूछे जाने पर जवाब मिलता है “मजहब का मामला है इसलिए सरकार तो इसमें कदापि हस्तक्षेप नहीं कर सकती।” जबकि मेरी समझ के मुताबिक सीधे – सीधे वोट-बैंक की राजनीति और तुष्टीकरण का मामला है l राज्यों की हज कमेटी, विदेश मंत्रालय और मुस्लिमों के कद्दावर नेता इन प्रतिनिधिमंडलों की सदस्य संख्या तय करते हैं और सच्चाई ये है कि ” जिनका मजहबी, सामाजिक और राजनीतिक कद ऊँचा होता है उन्हें ही इस प्रतिनिधिमण्डल में शामिल किया जाता है। अनेक अवसरों पर प्रतिनिधिमंडल के सदस्य अपने परिजनों को इसमें शामिल करके सभी प्रकार के लाभ उठा लेते हैं।” प्रतिनिधिमंडलों की संख्या क्या होगी इसे तय करने के लिए भी कोई नियम या कानून नहीं है। कुछ चेहरे तो हर साल इस वार्षिक “जलसे ” में शामिल हो जाते हैं।

पिछले वर्ष बिहार के गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई -अड्डे से हज -यात्रियों की रवानगी कवर करने के दौरान प्राप्त जानकारी के अनुसार एक सामान्य व्यक्ति एक से दो लाख में हज यात्रा करके लौट सकता है, लेकिन सरकारी प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य का खर्च 8 से 10 लाख रुपए का आता है। किसी भी प्रतिनिधि मंडल के सदस्य से जब आप उसका परिचय पूछेंगे तो वह यही कहेगा कि हम तो राजनीति को दूर रख कर हाजियों की सेवा करने के लिए आए हैं।

कटु सत्य तो ये है कि भारत के लगभग सभी राजनीतिक दलों के मुस्लिम नेता इस ‘लूट’ के साझेदार हैं। यदि आप सरकारी पैसों से हज करने वालों की सूची देखेंगे तो पता चलेगा कि एक ही व्यक्ति न जाने कितनी बार इस प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बन कर हज के लिए जा चुका है। कुछ वैसे भी लोग हैं जो किसी की भी सरकार रहे प्रतिनिधिमंडल में शामिल हो जाते हैं।जानकारी के मुताबिक सरकारी प्रतिनिधिमंडल को पाँच और सात सितारा होटलों में ठहराया जाता है।

हज से लौटे कुछ मित्रों के परिजनों की मानें तो मक्का पहुँचने के पश्चात् ये प्रतिनिधि कहाँ गायब हो जाते हैं, यह भी जाँच-पड़ताल का विषय है। कोई मदरसे और मस्जिद का चंदा मांगने के लिए निकल पड़ता है, तो कई मुस्लिम – संस्थाओं का प्रतिनिधि बनकर कोष एकत्रित करने में व्यस्त हो जाता है l एक सदस्य , जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ , कई वर्षों से सिर्फ इसलिए चंदे के रूप में पैसा एकत्रित कर रहे हैं कि वो मुस्लिम बहुल इलाके में एक मेडिकल – कॉलेज खोलना चाहते हैं , भले ही उसके (कॉलेज) लिए वर्षों बीत जाने के बाद भी एक ईंट भी नहीं जोड़ी गई है l बिहार के ही एक मौलाना, जो अक्सर राजनीति के मोहरे अपनी जमात में रहकर उलटते-पलटते दिखाई पड़ते हैं, अनेकों प्रतिनिधिमंडलों का हिस्सा बन चुके हैं l ऐसे लोग बड़ी ढिठाई से कहते दिखते हैं कि “मुसलमानों का दबदबा जो भारत में है वह कहीं भी नहीं… देखो हमारी सरकार अपने आपको पंथनिरपेक्ष कहती है, लेकिन एक मजहब – विशेष का वह कितना ध्यान रखती है…. सरकारी पैसे से हज करना क्या कोई साधारण बात है …”

 
आलोक कुमार

Leave a Reply

4 Comments on "क्या ये जायज और इस्लाम के अनुरूप है ?"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
इक़बाल हिंदुस्तानी
Guest
हज सब्सिडी के सम्बन्ध में आम तौर पर लोग ये जानते हैं की सरकार मुसलमानों को हज करने पर पैसे देती है .. औरआम जन मानस में फैली इसी गलतफहमी को कुछ लोग अपनी छिछोरी राजनीती करने के लिए प्रयोग करते हैं और दूसरी ओर संघियों द्वारा मुसलामानों के विरुद्ध दुष्प्रचार के एक मज़बूत हथियार के तौर पे प्रयोग किया जाता है ….. मेरे मित्रों ..विशेषकर मेरे हमवतन भाइयों …मेरा आपसे विनम्र निवेदन है की पहले “””” हज सब्सिडी “”” है क्या ….?????? इसकी वास्तविकता को जानें .. फिर इस सम्बन्ध में अपने विचार रखें … हाजियों को प्रतिवर्ष सऊदी… Read more »
इक़बाल हिंदुस्तानी
Guest
हज सब्सिडी और असरदार मुस्लिमो का सरकारी खर्च पर पूरा हज दोनों मुद्दे सरकारों से ज्यादा जुड़े हैं मुस्लिमो से कम। पहली गलतफहमी तो ये है कि हज यात्रा में सरकार किराए में सब्सिडी देकर मुस्लिमो पर कोई एहसान कर रही है जबकि वो नुक्सान कर रही है क्योंकि मुस्लिम लम्बे समय से मांग कर रहे है कि उनको इंडियन एयर लाइन्स से जबरदस्ती हज पर भेजने की बजाय प्राइवेट एयरलाइन्स से जाने की छूट दी जाए जो ग्लोबल टेंडर निकाले जाने पर उस धनराशी से भी कम किराए में हज पर ले जायेंगी जो सब्सिडी देने के बाद हमारी… Read more »
Dr Ranjeet Singh
Guest
जब अन्य की/ किसी दूसरे की कमाई से, उसके आर्थिक सहायता सहयोग से किया गया हज हज ही नहीं होता, इसलाम में वैध स्वीकार नहीं होता; तब मुसलमानों का सदैव प्रिय करने वाली, हरपल उनका भला चाहने वाली हमारी सिक्यूलर, तथाकथित मतनिरपेक्ष सरकारें उन से उनके ‘दीन’ विरुद्ध यह कार्य क्यों करवाया करती हैं? हर दम इसलाम और शरिया का दम भरने वाले ये ‘दीनदार’ कहलाने वाले मुसलमान भी कैसे और क्यों उस सहायता को स्वीकार करके हज पर जाया करते हैं/ हज किया करते हैं? कहाँ चली जाती है/ चली जाया करती है उस समय दीन के प्रति उनकी… Read more »
mahendra gupta
Guest

वोट बैंक, और तुष्टिकरण की नीति इसका प्रमुख आधार है. सरकार मुस्लिमों की खिदमत इस तरह करती है, गोया वे इस मुल्क में रह कर देश पार्क बड़ा अहसान कर रहे हों। मुस्लिम मुल्कों में हज के लिए ऐसी सब्सिडी नहीं दी जाती, क्योंकि इस्लाम मानता है कि अपने हक़ हलाल से , परिश्रम से अर्जित धन से किया हज ही अल्लाह को कबूल होता है लेकिन सरकारों ने इसे वोट बैंक का जरिया मान लिया है , ऐसा इस देश में ही हो सकता है

wpDiscuz