लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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पागल भी कर सकता है आबादी का यह बोझ

populationआबादी का असंतुलित और अधिक घनत्व सिर्फ गरीबी, बेरोजगारी और मारामारी ही नहीं लाता; यह लोगों को विक्षिप्त भी बना सकता है। ओशो चिंतित थे कि भोजन तो जुटाया जा सकेगा, लेकिन भीङ बढने के साथ आदमी की आत्मा कहीं खो तो नहीं जायेगी ? इस डर के पीछे ओशो का तर्क था – ’’पहली बात ध्यान रखें कि जीवन एक अवकाश चाहता है। जंगल में जानवर मुक्त है; मीलों के दायरे में घूमता है। अगर 50 बंदरों को एक कमरे में बंद कर दें, तो उनका पागल होना शुरु हो जायेगा। प्रत्येक बंदर को एक लिविंग स्पेस चाहिए।… गौर कीजिए कि बढती भीङ, प्रत्येक मुनष्य पर चारों ओर से एक अनजाना दबाव डाल रही है। भले ही हम इन दबावों को देख न पायें। अगर यह भीङ बढती गई, तो मनुष्य के विक्षिप्त होने का डर है।’’

विक्षिप्त होते हम

ओशो का यह निष्कर्ष आज सच होता दिखाई दे रहा है। अपने चारों तरफ निगाह डालिए। अवसाद बढ रहा है। हम बात-बात पर गुस्सा होने लगे हैं; इतना गुस्सा कि मामूली सी टक्कर होने पर ड्राईवर की जान लेने लगे हैं। जरा सी असफलता पर आत्महत्या के मामले सामने आने लगे हैं। परिवार टूट रहे हैं। एक-दूसरे की देखभाल का भाव भूल रहे हैं। क्या ये सभी विक्षिप्त होने के ही शुरुआती लक्षण नहीं हैं ? जनसंख्या वितरण में असंतुलन कुछ ऐसा है कि हमारे शहर कचराघर में तब्दील हो रहे हैं और भारतीयों गांवों से सतत् पलायन का दौर शुरु हो चुका है। प्राकृतिक रूप से बेहतर गांवों को छोङकर कम जगह, कम शुद्ध भोजन, कम शुद्ध पानी वाले शहरों की ओर जाना विवशता है या विक्षिप्तता ? सोचना चाहिए।

विक्षिप्त होते हवा-पानी

क्या ’लिविंग स्पेस’ का घटना और दबाव का बढ़ना हमारे प्राकृतिक संसाधनों को भी विक्षिप्त बना रहा है ? मेरे ख्याल से इस प्रश्न का उत्तर भी हां ही है। क्या ग्लेशियरों के पिघलने की बढ़ती गति के पीछे मानव दबाव एक कारण नहीं है ? क्या बढ़ती आबादी के लिए बिजली और पानी की बढ़ती जरूरतों के लिए क्या हम नदियों पर दवाब नहीं बना रहे ? क्या इस दबाव के कारण नदियों के बौखलाने अथवा पगलाने के उदाहरणों से भारत अछूता है ? क्या कोसी, गंगा, चेनाब, ब्रह्मपुत्र आदि नदियों बौखलाने का एक कारण बढ़ती जन-जरूरत की पूर्ति के लिए इन पर बनते बांध नहीं हैं ? क्या यह सच नहीं हैं कि बढ़ती जन-जरूरत की पूर्ति के लिए ही गुङगांव, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में भूजल का दोहन बढ़ा ? इसी खातिर झीलों के लिए प्रसिद्ध बंगलुरु की झीलों के ’लिविंग स्पेस’ को कम कर दिया; उन्हे सिकोङ दिया। कई का तो अस्तित्व ही मिटा दिया। जरूरतें बढीं; भोग बढा, तो हमने जंगल काट डाले; नीलगायों के ठिकाने पर खुद कब्जा जमा लिया – क्या यह सच नहीं ? जरूरत और भोग की पूर्ति के लिए हम इतने स्वार्थी हो गये कि हमने हमें जिंदा रखने वाली आॅक्सीजन का ’लिविंग स्पेस’ छीन लिया। मकान इतने ऊंचे कर लिए कि गली की मिट्टी को जिंदा रहने के लिए जरूरी धूप का अभाव हो गया।

नतीजा साफ है। प्रकृति के जीव वनस्पति सब विक्षिप्त होने के रास्ते पर हैं। आपने पहले कभी गाय को मानव-मल खाते न देखा होगा ? अब यह दृश्य दुर्लभ नहीं। यह विक्षिप्तता के लक्षण नहीं, तो और क्या हैं ? सब्जी, फल अपना स्वाद छोङ दें या धनिया की पत्ती में मसलने पर भी गंध न आये, यह सब क्या है ? यह भी एक तरह से दबाव के कारण वनस्पति जगत का अपने गुणों को छोङ देना है। यही विक्षिप्तता है। मानव का मानवता छोङकर, स्वार्थवश दावनी कृत्यों में जुट जाने को विक्षिप्तता नहीं तो और क्या कहा जायेगा ?

जाहिर है कि अतिभोग की प्रवृति के अलावा, जनसंख्या का दबाव भी इस विक्षिप्तता का एक मुख्य कारण है। यह भी स्पष्ट है कि इस विक्षिप्तता से यदि स्थायी रूप से बचना है, तो जनसंख्या नियंत्रित करनी ही होगी। चाहे पानी स्वस्थ चाहिए हो या परिस्थिति, परिवार नियोजित करना ही होगा। सामाजिक अपराध घटाने हो या फिर आपसी विद्वेष, आबादी की संख्या और वितरण ठीक किए बगैर यह हो नहीं सकता। आर्थिक विकास के मोर्चे पर आगे बढना हो अथवा हर चेहरे की मुस्कान के मोर्चे पर, प्रजनन दर को कम करना अन्य उपायों में से एक जरूरी उपाय है।

एक सोच यह भी

यह एक नजरिया है, किंतु दुनिया दो वर्गों में बंटी है – अमीर और गरीब। प्रसिद्ध साम्यवादी विचारक कार्ल माक्र्स की मान्यता रही है कि अमीर, उत्पादन करने योग्य साधन के स्वामी होते हैं। अमीर, धन संग्रह पर बल देते हैं। जवाब में गरीब, श्रम संचय पर बल देता है; क्योंकि मात्र श्रम ही एक ऐसी सम्पति होती है, जिसके भरोसे कोई गरीब अपने जीवन की तसवीर गढता है। अतः श्रम संचय के लिए गरीब, श्रम करने वाले हाथों को बढाने पर यकीन करता है। अतः वह जनसंख्या वृद्धि में भी यकीन रखता है। यह एक भिन्न सोच है। निस्ंसदेह, इस सोच का विकास, निजी और तात्कालिक समस्या के निदान के रूप में हुआ है। किंतु सच यही है कि गरीब और अमीर के बीच श्रम संचय और धन संचय की यह प्रतिद्वन्दिता अंततः गरीब को ही नुकसान पहुंचाती है। यह तय मानिए कि जनसंख्या का बोझ सिर्फ आर्थिक स्तर पर ही नहीं, मानसिक, शारीरिक, शैक्षिक, प्राकृतिक, सामाजिक, आत्मविश्वास, सम्मान और राष्ट्रभाव के स्तर पर भी गरीब बनाता है।

अधिक आबादी, अधिक गरीबी

पृथ्वी के जनसंख्या नक्शे पर निगाह डालिए। पृथ्वी की कुल इंसानी जनसंख्या का 75.5 प्रतिशत भाग लेटिन अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, पोलिनेशिया, मेलानेशिया तथा माइक्रोनेशिया के अल्पविकसित देशों में निवास करता है। ये सभी क्षेत्र जनांकिकी संक्रमण की प्रथम या द्वितीय अवस्था से गुजर रहे हैं। शेष 24.5 प्रतिशत जनसंख्या का निवास बने यूरोप, उत्तरी अमेरिका, आॅस्टेलिया, जापान और न्यूजीलैंड आदि सभी देश, विकसित श्रेणी के देश हैं। आकलन भी है कि वर्ष 2050 तक दुनिया की 90 प्रतिशत आबादी मात्र छह देशों में रह रही होगी। ये देश हैं: भारत, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया और बांग्लादेश। यूं तो भारत, आबादी के मामले में नंबर दो है; किंतु भारत में जनसंख्या वृद्धि दर, सर्वाधिक आबादी वाले चीन से ज्यादा है। कारण कि भारत में प्रजनन दर, चीन के दोगुने के आसपास है। यहां यह बात भूलने की नहीं कि चीन ने जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम को सख्ती के साथ लागू किया है। कहना न होगा कि शिक्षा और सोच के मोर्चे पर पिछङने का नतीजे बहुत बुरे हैं। भारत में कुपोषितों की जनसंख्या, दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। आर्थिक रूप से पिछङे होने के बावजूद, बाल जीवन दर के मामले मे बांग्ला देश और नेपाल की स्थिति भारत से बेहतर है।

वर्ष 1798 मे इंग्लैंड के अर्थशास्त्री थाॅमस राॅबर्ट माल्थस ने लिखा था कि अगले 200 वर्षों में जनसंख्या 256 गुना हो जायेगी। किंतु जीवन निर्वाह की क्षमता में मात्र नौ गुना ही वृद्धि होगी। भारत के मामले में कहा गया  कि वर्ष 2050 तक भारत की आबादी बढकर 162 करोङ हो जायेगी। खाली होते गांव और शहरों में बढता जनसंख्या घनत्व! पानी और पारिस्थितिकी पर भी इसका दुष्प्रभाव दिखने लगा है। सोचिए, आगे चलकर संसाधनों की मारामारी का संकट कितना भयावह होगा ? संदेश साफ है कि आबादी नियंत्रित करनी होगी।

भारत में परिवार नियोजन

ऐसा नहीं है कि भारत में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कोई सोच नहीं है। भारत, दुनिया का पहला ऐसा देश है, जिसने परिवार नियोजन को एक सरकारी कार्यक्रम के तौर पर अपनाया। 1950-60 के दशक में शुरु हुआ यह कार्यक्रम कभी प्रोत्साहन योजनाओं के साथ चला और कभी जबरन नसबंदी अभियान के रूप में। एक जमाने में नसबंदी के बदले जमीनों के पट्टे दिए गये। वर्ष 1975 – आपात्काल में नसबंदी करने वाले डाॅक्टरी दल छापामार शैली में गांवों में आते थे और जबरन नसबंदी करके चले जाते थे। बचने के लिए लोग खेतों में छिप जाते थे। सरकारी कर्मचारियों को नसबंदी के लक्ष्य दे दिए गये थे। इस अभियान के लिए शायद ही कोई संजय गांधी को याद करे।

उस जबरदस्ती का कुछ ऐसा नकरात्मक असर हुआ कि इसके बाद किसी राजनीतिक दल ने परिवार नियोजन को अपना एजेंडा नहीं बनाया। आगे चलकर स्वयं कांग्रेस ने इससे परहेज किया। हां, 1989 में विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा की पहल को भारत सरकार ने जरूर अपनाया। ’बच्चे, दो ही अच्छे’ तथा ’हम दो, हमारे दो’ जैसे नारे गांवों की दीवारों पर लिखे गये। परिवार नियोजन के औजार, भी सरकारी प्रचार का सामान बने। इससे थोङी चेतना आई। इसके बाद प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों में गर्भ निरोधक गोलियां और कण्डोम आदि मुफ्त मिलने लगे। अब गर्भ निरोधक टीके भी हैं। नसबंदी कराने पर आज भी सरकारी अस्पतालों में प्रोत्साहन राशि मिलती है। किंतु अभी भी ये सब हर विवाहित जोङे की पहुंच में नहीं है। प्रजनन दर कम न होने के दूसरे कारणों में एक कारण कम उम्र में विवाह है। एक कारण, लङके के चक्कर मे कई संतानों को जन्म देना भी है। गरीबी, अशिक्षा और सोच तो मुख्य कारण हैं ही। फिर भी संतुष्ट हो सकते हैं कि पहले जहां, सात-आठ बच्चे आम थे, अब भारतीय महिलाओं में अपने पूरे जीवन के दौरान बच्चे पैदा करने की औसत दर कम होकर 2.7 हो गई हैं। आवश्यकता, इस प्रजनन दर को और कम करने तथा आबादी घनत्व को संतुलन में लाने की है।

तय कीजिए

इसके दो तरीके हैं। अर्थशास्त्री माल्थस के मुताबिक या तो हम इंतजार करें कि जनसंख्या वृद्धि के कारण मांग-आपूर्ति की समस्या सिर से ऊपर चली जाये। ऐसा होने पर दुर्भिक्ष, अकाल, युद्ध तथा संक्रामक रोगों के फैलने की स्थिति बने और परिणामस्वरूप, जनसंख्या खुद-ब-खुद नियंत्रित हो। दूसरा तरीका यह है कि हम अभी से संजीदा हों; जनसंख्या नियंत्रण के जो भी नैतिक तरीके हो, उन्हे अपनायें। इसी के साथ-साथ संसाधनों का दुरूपयोग करने की बजाय सदुपयोग करने को अपनी आदत बना लें। दक्षिण भारत के कई राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रित करने के नैतिक तरीकों पर भरोसा जताया है। इसका लाभ भी वहां की प्रकृति, आय, शिक्षा और तरक्की के दूसरे मानकों पर दिखने लगा है। उत्तर:- भारत कब ऐसा करेगा ?

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