लेखक परिचय

वीरेन्द्र सिंह चौहान

वीरेन्द्र सिंह चौहान

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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narendra-modiवीरेन्द्र सिंह चौहान

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी अपनी हालिया जम्मू रैली के बहाने संविधान के अस्थायी प्रावधान अनुच्छेद तीन सौ सत्तर पर एक नई बहस छेडऩे में      कामयाब रहे।  दरअसल संविधान के इस भेदभावपूर्ण प्रावधान पर चर्चा और बहस तो संसद के भीतर और बाहर पचास के दशक से आज तक लगातार होती आई है। मगर इस बार बहस में कुछ नितांत नए तत्व शुमार हो गए हैं जिन्होंने इस अनुच्छेद से जुड़े विमर्श को नए आयाम जोड़ कर इसे नूतन व्याप दे डाला है।

जब धारा तीन सौ सत्तर के  बहाने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने के कुप्रयास पचास के दशक में प्रारंभ हुए, देशभक्त और जागरूक नागरिक और नेता उसी समय से इसके खिलाफ मुखरता से बोलते रहे हैं। मगर उन्नीस सौ चौंसठ में इस बहस में एक मोड़   ऐसा भी आया था जब कुछ समय के लिए लगा कि समूची संसद इस अन्यायपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार है। संसदीय बहस का रिकार्ड दर्शाता है कि प्रख्यात आर्यसमाजी प्रकाशवीर शास्त्री द्वारा अनुच्छेद तीन सौ सत्तर के खिलाफ पेश किए गए एक प्राइवेट मेंबर बिल के  पक्ष में डा. राम मनोहर लोहिया से लेकर वामपंथी दिग्गज सरयू पांडे और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हनुमंथैया ही नहीं जम्मू कश्मीर के पांच सांसद भी बोले थे। मगर दुर्भाग्यवश कमजोर दिल वाले दिल्ली के नेतृत्व ने उस बिल को पास होने से रोक दिया।

इस अनुच्छेद को लेकर विमर्श उसके बाद भी जारी रहा मगर आम तौर पर उस विमर्श  के केंद्र में इसके साथ जोड़कर पेश किया जाने वाला रियासत के विशेष-दर्जे  का छद्म भाव ही रहा। यह अनुच्छेद समाप्त होने से रियासत पर मानों मुसीबतों को कोई पहाड़ टूट पड़ेगा, अलगाववादी और उनके विचारों को सियासी आवरण देने वाले हर बार  कुछ ऐसा ही संदेश वहां की जनता को देते रहे। आज भी उमर अब्दुल्ला और नैकां के  मुखिया व उमर के अब्बा इस प्रावधान के हटाने का जिक्र होते ही यूं बेचैन होने लगते हैं मानों उन पर कोई बिजली टूट पड़ी हो। इस का ताजा प्रमाण यह है कि नरेंद्र मोदी द्वारा अनुच्छेद तीन सौ सत्तर पर बहस का आवाहन किए जाने मात्र से पिता-पुत्र दोनों ने बहकी-बहकी बातें करते देखे और सुने गए। बड़े अब्दुल्ला तो बौखलाहट में यहां तक कह गए कि मोदी दस बार भी देश के प्रधानमंत्री बन जाएं तो इसे हटा नहीं सकते। दोनों की बोली में कहीं न कहीं समूचे देश को चुनौती व चेतावनी देने वाली अल्फाज और हाव-भाव ही हावी रहे।

जहां इस अनुच्छेद को हटाने की प्रक्रिया अथवा इसके हटने की संभावना का सवाल है जटिल दिखने वाले सवाल का जवाब काफी सरल है। यहां इतना कह देना काफी होगा कि जिस दिन दिल्ली के शासक प्रबल राजनीतिक इच्छा शक्ति के साथ केवल निरपेक्ष भाव से इस अनुच्छेद को पढ़ लेंगे उन्हें इसे एक झटके के साथ समाप्त करने का अंतर्निहित रास्ता नजर आ जाएगा। उमर और उनके सरीखे दुराग्रही सियासतदानों को मालूम है कि हो तो सब कुछ सकता है। हां,वे अगर सब कुछ जानते हुए भी अनजान होने का नाटक और दिल्ली की ओर देख कर गुर्राने का दुस्साहस कर पाते हैं तो इसकी वजह महज यह है कि उन्हें दिल्ली के मौजूदा सुल्तानों की अदूरदृष्टि की अच्छी-खासी समझ है।

खैर, नरेंद्र मोदी ने जम्मू में जो तान छेड़ी, उसमें नया 1या है, उसे समझने की   आवश्यकता है। एक लंबे अरसे के बाद किसी राष्ट्रीय स्तर के नेता ने अनुच्छेद तीन सौ सत्तर पर बहस का केंद्र बिंदु बदलने का सफल प्रयास किया है। यह अनुच्छेद रियासत को 1या देता है और इसके समाप्त होने से 1या उसके हाथों से छिन जाएगा, मोदी ने इन सवालों के दायरे से विमर्श को प्रभावी ढंग से बाहर घसीटा है। मीडिया में एक लंबे अरसे बाद इस बात पर चर्चा चली कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर के न हटने से रियासत के लोगों को कितना भारी घाटा हो रहा है। भारत के संविधान द्वारा देश के नागरिकों के    कल्याण के लिए मुहैया कराए गए अनेक अहम प्रावधानों के लाभ से प्रदेश के लोग आज भी वंचित हैं चूंकि यह अनुच्छेद उनके  लागू होने की राह में रोड़ा नहीं बल्कि पहाड़ बन कर खड़ा हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर कांग्रेस द्वारा स्व. प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सपनों का कानून करार देकर प्रचारित किए जाने वाले संविधान के तिहतरवें और चौहतरवें संशोधन आज भी राज्य में लागू नहीं। परिणामस्वरूप रियासत का पंचायती राज निहायात प्रभावहीन है। इतना ही नहीं,मौजूदा केंद्र सरकार द्वारा लाए गए सूचना के अधिकार और शिक्षा के अधिकार संबंधी बहुप्रचारित और लोक कल्याणकारी कानूनों का लाभ इसी अनुच्छेद के कारण राज्य में कांग्रेस के सता में होने के बावजूद लोगों को नहीं मिल रहा।

भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के प्रावधान राज्य में लागू नहीं है। अन्य पिछड़े वर्गों के लोग आज भी राज्य में आरक्षण के लाभ से वंचित हैं।  राज्य में अनुसूचित जनजातियों को राजनीतिक आरक्षण प्राप्त नहीं है। इसी क्रम में जनप्रतिनिधित्व कानून और परिसीमन अधिनियम २००२ राज्य में लागू नहीं। नतीजतन जम्मू और लद्दाख को आज भी विधान सभा में उनकी आबादी के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। यह तो कुछेक उदाहरण मात्र हैं। राज्य के बाशिंदों को इस अनुच्छेद की आड़ में हो रहे नुकसानों की सूची बहुत लंबी है।

नरेंद्र मोदी के अनुच्छेद तीन सौ सत्तर पर बहस के आवाहन के बाद उठे सवालों में सर्वाधिक दिल को छूने वाला सवाल वहां की महिलाओं के साथ इसकी आड़ में हो रहा अन्यायपूर्ण भेदभाव का है। नरेंद्र मोदी ने सच ही कहा कि उमर अब्दुल्ला रियासत से बाहर विवाह कर लें तो उन्हें कोई हानि नहीं होती मगर उनकी बहन सारा अगर ऐसा करती हैं तो उनके अधिकारों पर कुठाराघात अवश्यंभावी है।  उमर ने मोदी की टिप्पणी के तुरंत बाद इस मसले की उनकी समझ पर सवाल उठाने की जल्दबाजी की। मगर उमर की बोलती बंद करने के लिए कश्मीर की कई बेटियों के साथ वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर स्वत: इस दंगल में उतर आईं। उन्होंने दो टूक शब्दों में उमर के दावों की धज्जियां उड़ाई तो उमर और उनकी ट्विटियानी चिडिय़ा तक को सांस नहीं आया।

 

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1 Comment on "अनुच्छेद तीन सौ सत्तर पर नई बहस छेडऩे में सफल रहे मोदी"

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mahendra gupta
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इस बात पर बहस छेड़ना कांग्रेस को बोतल से जिन्न निकालना लगता है. नेहरू ने उस समय गलती कर यह प्रावधान किया और अब यह अंगुली पकङ कोहनी पकड़ने सामान हो गया है.इसलिए केंद्र सरकार इस विषय पर शुतुरमुर्ग की तरह सर जमीं में गड़ाए बैठी है, और वोट बैंक तो अपनी जगह है ही.धर्म संप्रदाय पर राजनीती करने वाली सरकार से इस विषय पर बात करने को कहना पत्थर की दिवार में सर मारने के समान ही है.

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