लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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Arunachal-Pradesh1अरुणाचल प्रदेश की राजनीति पिछले कुछ वर्षों से दो दलों के ध्रुवीकरण की ओर बढ रही है और शायद पूर्वोत्तर भारत में यह पहला राज्य है जहां यह ध्रुवीकरण कांग्रेस और भाजपा की बीच हो रहा है। पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में इस प्रकार का ध्रुवीकरण कांग्रेस और वहां के क्षेत्रीय दलों में विद्यमान है। अरुणाचल प्रदेश में भी शुरुआती दौर में यह ध्रुवीकरण कांग्रेस और वहां के क्षेत्रीय दलों में ही प्रारंभ हुआ था लेकिन धीरे-धीरे क्षेत्रीय दल तिब्बत से सटे इस सीमांत प्रदेश में हाशिये पर जाते रहे और भाजपा प्रमुख भूमिका में स्थापित हो गई। इस बार 15वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में यह स्थिति और भी स्पष्ट हो गई है। अरुणाचल के बारे में राजनैतिक विश्लेषकों का यह मत था कि वहां लोकसभा के लिए वही दल जीतता है जिसकी वहां सरकार होती है। यद्यपि अरुणाचल प्रदेश की दोनों सीटें इस बार सत्ताधारी कांग्रेस ने ही जीती हैं, लेकिन अरुणाचल पश्चिम से भाजपा के निवर्तमान सांसद खिरेन रिजुजु ने कांग्रेस के संजय को इतनी जबरदस्त टक्कर दी कि वे केवल 13 सौ वोटों से ही जीत सके। संजय को जिताने के लिए प्रदेश की सरकार ने तो पैसा पानी की तरह बहाया ही, चर्च ने भी इस सीट को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। इसके बावजूद संजय केवल 13 सौ वोटों से जीत पाये और उनकी यह जीत भी संदेह के घेरे में है। कुछ चुनाव क्षेत्र में मतदाता सूची में दर्ज मतदाताओं से भी ज्यादा मतदाताओं ने भी भी वोट डाल दिये। मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र में तो शत-प्रतिशत मतदान का दावा किया गया। भाजपा ने इसकी शिकायत बाकयदा से चुनाव आयोग के पास दर्ज करवायी। लेकिन वहां उसी प्रकार का सन्नाटा छाया रहा जिस प्रकार का सन्नाटा मु’य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के वक्त पसरा था। चुनाव में हुई इन सभी धांधलियों के बावजूद भाजपा ने कुल साठ विधानसभा क्षेत्रों में से — क्षेत्रों में बहुमत प्राप्त किया।

अरुणाचल प्रदेश में लोकसभा के लिए प्रथम चुनाव 1977 में और विधानसभा चुनाव 1978 में हुए थे। विधानसभा में सदस्यों की कुल संख्या 30 थी। भाजपा ने 1984 में विधानसभा के लिए छह प्रत्याशी खडे हुए थे उनमें से उसका एक प्रत्याशी जीता और तीन सीटों पर उसने द्वितीय स्थान प्राप्त किया है। 1990 में अरुणाचल प्रदेश विधानसभा की सीटों की सं’या 60 कर दी गई और भारतीय जनता पार्टी ने कायदे से 1991 के लोकसभा चुनावों से ही अरुणाचल प्रदेश की चुनावी राजनीति में प्रवेश किया।

1990 तक अरुणाचल प्रदेश में मुख्य रुप से दो ही राजनीतिक दल रहे, प्रथम कांग्रेस और द्वितीय पीपुल्स पार्टी आफ अरुणाचल प्रदेश। यद्यपि पीपीए में भी कांग्रेस से निकल कर ही लोग आये थे लेकिन उसने प्रदेश में क्षेत्रीयता के आधार पर अपने लिए स्थान बनाने का प्रयास किया। 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 43.13 प्रतिशत और पीपीए को 40.22 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। उसके बाद 1980 के विधानसभा, 1984 की लोकसभा और कुछ महीने बाद ही 1984 की विधानसभा, 1989 की लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस को क’मश: 42.58, 43.32,43.07,49.99 प्रतिशत मत और पीपीए को क्रमश: 40.98,34.63,15.54 और 35.21 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। एक प्रकार से यह कांग्रेस और पीपीए में प्रदेश की राजनीति का ध्रुवीकरण था। परंतु 1990 तक आते आते पीपीए का शीराजा बिखर गया क्योंकि धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा था कि क्षेत्रीय राजनीति के लिए अरुणाचल प्रदेश में स्थान सिमटता जा रहा है। पीपीए को लोग या तो निष्क्रिय हो गये या फिर अन्य दलों में घुस गये। वास्तव में 1990 में पीपीए ने स्वयं को जनता दल में समाहित कर दिया या यूं कहा जा सकता है कि पीपीए का नाम ही जनता दल हो गया। दल ने इस नये अवतार में अरुणाचल प्रदेश में अपना स्थान तलाशने की कोशिश की। उसे 1990 के विधानसभा चुनाव में 33.34 प्रतिशत, 1991 के लोकसभा चुनाव में 24.68 प्रतिशत और 1995 के विधानसभा चुनाव में 17.24 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। इसके बाद जनता दल ने भी अरुणाचल प्रदेश की राजनीति से अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया। इसका एक कारण शायद यह भी रहा होगा कि जनता दल स्वयं ही अनेक खंडों को उपखंडों में विभाजित हो गया।

1991 के लोकसभा चुनाव से भारतीय जनता पार्टी ने अरुणाचल प्रदेश की राजनीति में प्रभावी ढंग से प्रवेश किया। 1991 से लेकर 2009 तक के लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस और भाजपा को मिले मत प्रतिशतों से स्वत: स्पष्ट हो जाता है कि धीरे धीरे प्रदेश की राजनीति का ध्रुवीकरण इन दोनों दलों के बीच होना शुरु हो गया है।

1991 के लोकसभा, 1995 के विधानसभा, 1996 की लोकसभा, 1998 की लोकसभा, 1999 की लोकसभा, 1999 की विधानसभा , 2004 की लोकसभा, 2004 की विधानसभा और 2009 की लोकसभा में कांग्रेस को क्रमश: 68.92, 50.50,28.83, 23.99, 56.92,51.78,9.96, 44.41 और 51.11 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। जबकि भाजपा को इन्हीं चुनावों में क’मश: 6.11,3.57,17.43,21.75,16.30,10.83,53.85,19.00 और 37.17 प्रतिशत मत प्राप्त हुए ।

इसी बीच 1998 में कांग्रेस से टूट कर गेगांग अपांग ने अपने क्षेत्रीय दल अरुणाचल कांग्रेस का गठन किया। अरुणाचल कांग्रेस ने 1998 के लोकसभा चुनाव में 52.47 प्रतिशत मत प्राप्त कर के प्रदेश में एक सशक्त क्षेत्रीय विरोधी दल की संभावनाओं को उजागर किया लेकिन इन चुनाव के बाद धीरे धीरे अरुणाचल कांग्रेस की शक्ति का क्षय भी होता गया और उसमें फूट भी पडती गई। 1999 में लोकसभा चुनाव और 1999 के ही विधानसभा चुनाव में अरुणाचल कांग्रेस को क’मश: 16.62 और 16.68 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। इसके बाद 2004 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में क’मश: 19.88 और 3.88 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। 2009 के लोकसभा चुनाव में उसका मत प्रतिशत 9.30 पर खिसक गया।

1999 का लोकसभा चुनाव भाजपा व अरुणाचल कांग्रेस ने मिल कर लडा था। दोनों दलों ने 1-1 सीट लडी। अरुणाचल कांग्रेस तो अपनी सीट जीत गई लेकिन भाजपा हार गई। अरुणाचल कांग्रेस को 30.07 प्रतिशत और भाजपा को 36.45 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। 30 अगस्त को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री गेगांग अपांग, जिन्होंने कांग्रेस से टूट कर अपनी अरुणाचल कांग्रेस का गठन किया था, अपने समस्त विधायकों समेत भाजपा में ही शामिल हो गये। इस प्रकार अरुणाचल प्रदेश में अल्पकाल के लिए प्रथम भाजपा सरकार बनीं। 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने प्रदेश की दोनों सीटें जीत लीं। लेकिन जल्दी ही गेगांग अपांग अपनी मूल पार्टी में चले गये और 2004 का विधानसभा चुनाव भाजपा ने अपने बलबूते लडा और कांग्रेस को करारी टक्कर दी। कांग्रेस केवल 34 सीटें जीत सकी। भाजपा ने 9 और स्वतंत्र प्रत्याशियों ने 13 सीटों पर विजय हासिल की। स्वतंत्र प्रत्याशियों में जीतने वाले रिंचेन खांडु खिरमे भी थे जो एक लंबे समय तक भाजपा में रहे थे और उनके प्रभाव के कारण कुछ अन्य निर्दलीय प्रत्याशी भी जीते थे। यदि इन चुनाव में भाजपा व खिरमे मिल कर चुनाव लडे होते तो निश्चय ही भाजपा एक सशक्त बडे ग्रुप के रूप में उभर सकती थी।

इसका अर्थ यह हुआ कि अरुणाचल प्रदेश की राजनीति में 1977 से लेकर 1990 तक कांग्रेस और पीपीए में प्रतिद्वंदिता रही। 1990 से आगे मुख्य प्रतिद्वंदिता कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में स्थापित हो गई। बीच में 1990 से लेकर 1995 तक जनता दल ने प्रदेश की राजनीति में पैर पसारने का प्रयास किया। लेकिन वे सफल नहीं हो पाया। 1998 से कांग्रेस से ही टूट कर बने क्षेत्रीय दल अरुणाचल कांग्रेस ने अपना स्थान बनाने का प्रयास किया लेकिन धीरे धीरे वह भाजपा से पिछडता गया और 2009 तक आते आते प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा ही प्रमुख राजनैतिक दलों के नाते अपनी पहचान बना सके।

वास्तव में अरुणाचल प्रदेश में भाजपा ने गंभीरता से चुनाव 1995 के विधानसभा चुनाव से ही लडना शुरु किया। उसने इस चुनाव में 15 प्रत्याशी खडे किये। यद्यपि पार्टी को सीट तो कोई हासिल नहीं हुई लेकिन उसने 3.37 प्रतिशत मत प्राप्त किये। इसके बाद 1999 के विधान सभा चुनाव में भाजपा ने 23 प्रत्याशी खडे किये। सीट उसे इस बार भी कोई नहीं मिली लेकिन उसका मत प्रतिशत 10.83 हो गया। 2004 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 39 प्रत्याशी मैदान में उतारे। उसे विधानसभा में 9 सीटें प्राप्त हुई और 9 पर ही उसके प्रत्याशी द्वितीय स्थान पर रहे। एक दो सीटें तो भाजपा ने बहुत ही कम मतों से हारीं। 2004 तक आते आते भाजपा का प्रभाव क्षेत्र भी नागालैण्ड़ के साथ लगते दो जिलों चांगलांग और तिराप को छोड कर लगभग सारे अरुणाचल प्रदेश में स्थापित हो गया।

2004 के विधानसभा चुनाव में कामेंग क्षेत्र की 12 विधानसभा सीटों में से 5 पर भाजपा प्रत्याशी जीते और दो स्थानों पर दूसरे नंबर पर रहे। इसी प्रकार सिआंग क्षेत्र की 13 सीटों में से दो पर भाजपा प्रत्याशी जीते और 3 पर दो नंबर पर रहे। सुबानश्री क्षेत्र की 11 सीटों में से 1 पर भाजपा ने जीत प्राप्त की और दो पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे। दिबांग घाटी की तीन सीटों में से भाजपा प्रत्याशी एक सीट पर दूसरे नंबर पर रहा। लोहित जिले की 5 सीटों में से 1 पर भाजपा प्रत्याशी जीता और 1 पर दूसरे नंबर पर रहा।
– डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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