लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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-डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री-     Arvind kejrival
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने १४ फ़रवरी को अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था । दरअसल, सोनिया गान्धी की पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया ही त्यागपत्र देने के लिये था। होमियोपैथी में किसी दवाई की ताक़त बढ़ाने के लिये उसकी पोटेन्सी बढ़ानी पड़ती है, तभी वह मरीज़ के लिये कारागार सिद्ध हो सकती है। केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाना भी उसी रणनीति का हिस्सा था और उसका त्यागपत्र देना भी उसी का दूसरा हिस्सा है। केजरीवाल नाम की जिस दवाई का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसकी जांच करने से पहले यह समझ लेना भी लाभदायक है कि इस पूरे घटनाक्रम में बीमार कौन है और उसे क्या बीमारी है ? इसमें कोई दो राय नहीं कि बीमार तो सोनिया गान्धी की पार्टी और उसको चलाने वाला कोर ग्रुप ही है। हाथ से रेत की तरह जब सत्ता फिसलती दिखाई देती हो, तो उस वक़्त जो बीमारी लगती है, उसी की शिकार सोनिया गान्धी की पार्टी है । लेकिन सोनिया गान्धी की पार्टी का इलाज करने वाले डॉक्टर समझ चुके हैं कि चुनावों में इतना कम समय रह गया है कि इतने कम समय में इस पार्टी को स्वास्थ्य करना संभव नहीं है। इसलिये आम आदमी पार्टी के नाम से मार्केट में नई दवाई लांच की गई है, जो सोनिया गान्धी की पार्टी का स्थान लेने के लिये तेज़ी से आगे बढ़ रही दूसरी पार्टी को कम से कम कुछ समय के लिये रोक ले। सोनिया गान्धी की पार्टी के स्थान पर आगे बढ़ रही भाजपा को रोक देने में यदि आम आदमी पार्टी नाम की यह होमियोपैथी गोली कुछ सीमा तक भी कामयाब हो जाती है तो समझ लेना चाहिये कि  अमेरिका के फोर्ड फ़ाउंडेशन की सहायता से तैयार की इस नई दवाई ने  अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त कर ली है। लेकिन ऐन मौक़े पर दवाई कहीं फुस्स न हो जाये इस लिये इसकी पोटेन्सी बढ़ाते रहना जरुरी है।

राष्ट्रवादी ताक़तों को कमज़ोर करने लिये अरविन्द केजरीवाल की उपयोगिता सोनिया गान्धी की पार्टी के साथ मिलकर भी है और उससे अलग रहकर भी।लेकिन सोनिया गान्धी की पार्टी इस के साथ साथ एक दूसरे एजेंडा पर भी चल रही प्रतीत होती है। यदि हर हाल में उसे सत्ता से हटना ही पड़ता है तो वह ऐसी स्थिति पैदा कर देना चाहती है कि देश में अराजकता फैल जाये। पिछले दिनों तेलंगाना को लेकर लोकसभा में कांग्रेस के मंत्रियों ने जो व्यवहार किया और सदन में काली मिर्चों की बरसात की उससे पार्टी के हिडन एजेंडा का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है । राज्यों का पुनर्गठन इससे पहले भी होता रहा है। लेकिन पूरी योजना से आन्ध्र प्रदेश के दो क्षेत्रों के लोगों के मन में एक दूसरे के प्रति स्थाई ज़हर घोलने  का काम शायद सोनिया गान्धी की पार्टी ने ही किया है। यह सोनिया गान्धी और उनकी पार्टी चला रहे गिने-चुने लोगों का इस देश में काम करने का तरीक़ा है। इस से देश को कितना नुक़सान हो रहा  है, उसका सहज ही अनुमान सीमान्ध्र और तेलंगाना की घटनाओं को देखकर लगाया जा सकता है। क्या देश को अराजकता की ओर ले जाने और सांविधानिक संस्थाओं को नपुंसक बनाने की तैयारी हो रही है ? इस तैयारी का दूसरा सिरा अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से जुड़ता है। अरविन्द केजरीवाल को सोनिया गान्धी के लोगों द्वारा दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने से लेकर १४ फ़रवरी २०१४ को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने तक के ४८ दिन के क्रियाकलाप इस का प्रमाण हैं। मुख्यमंत्री द्वारा केन्द्र सरकार के ख़िलाफ़ धरना दिया जाना तो उसका छोटा सा हिस्सा है। जनलोकपाल को लेकर केजरीवाल त्याग-पत्र देंगे, यह सोनिया गान्धी को उस दिन भी पता था, जिस दिन उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाकर, कांग्रेस की बैंड पार्टी दिल्ली में भंगडा डाल रही थी। जब केजरीवाल सारी लोकलाज को भूल कर सफ़ेद झूठ बोल रहे थे कि उन्होंने अपने जनलोकपाल के बारे में देश के नामी विधि विशेषज्ञों की राय ले ली है और वे सभी विधि विशेषज्ञ अगले ही क्षण केजरीवाल के झूठ को नंगा कर रहे थे, तब भी सब जानते थे कि केजरीवाल की रुचि जनलोकपाल को लेकर उतनी नहीं है जितनी देश की सांविधानिक संस्थाओं पर अन्दर से चोट करने  की है। बाबा साहेब अम्बेडकर ने छह दशक पहले ही ऐसे लोगों को लेकर चेतावनी दे दी थी। केजरीवाल दिल्ली विधान सभा में बिल प्रस्तुत करने की निर्धारित प्रक्रिया को जान-बूझकर छोड़ रहे थे, ताकि बिल पेश करने से पहले ही हंगामा हो जाये। वे इस पूरे नाटक में शहीद का रुतवा प्राप्त करना चाहते थे और सोनिया गान्धी की पार्टी उन्हें यह रुतवा  प्रदान करने में हर संभव सहायता कर रही थी, क्योंकि नरेन्द्र मोदी के रथ को रोकने का अब यही अंतिम प्रयास हो सकता था । केजरीवाल यह काम कर सकें, इसलिये पहले उनको मुख्यमंत्री बनाकर उनका क़द बड़ा करने की जरूरत थी, सोनिया गान्धी ने यह किया। लेकिन जिस बड़ी लड़ाई के लिये उन्हें तैयार किया जा रहा है, उसमें इतने से काम होने वाला नहीं है। यह सोनिया गान्धी भी जानती हैं और उनके नीति निर्धारित भी। उसके लिये केजरीवाल के लिये शहादत और त्याग का चोगा पहनना भी जरूरी समझा गया। दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर केजरीवाल ने वही चोला पहनने का प्रयास किया है और उसके तुरन्त बाद अपने दफ़्तर की खिड़की में खड़े होकर चीख़ लगाई है, अब मोदी की बारी है। मोदी की बारी यानि मोदी के हारने की बारी। लेकिन केजरीवाल को भी शायद पता था कि राजनीति में बह रही हवा को देखते हुये खिड़की के नीचे टोपियां पहनकर खड़े उनके अपने कार्यकर्ता भी शायद यह कहने का विश्वास नहीं जुटा पायेंगे, इसलिये इससे पहले एक और पंक्ति जोड़ी गई। पहले शीला हारी है, अब मोदी की बारी है। नीचे से किसी टोपी वाले की ही टिप्पणी थी, क्या कुछ ज़्यादा ही नहीं बोल रहा ? उत्तर था, जब अन्धे के पैर के नीचे बटोर आ जाये तो चार-पांच महीने तक उसकी हरकतें ऐसी ही रहती हैं।
खिड़की में से चीख़ मारने के बाद केजरीवाल दिल्ली के लैफ्टीनैंट गवर्नर को दिल्ली विधान सभा भंग करने की सलाह देते हैं। केजरीवाल के पास विधान सभा की 70 सीटों में से कुल मिलाकर 27 सीटें हैं और उसी के बलबूते वे विधान सभा भंग करना चाहते हैं। जब उनकी इच्छा पूरी नहीं होती तो उनकी नज़र में यह आम जनता का अपमान है। वे विधानसभा का सत्र स्टेडियम में बुलाना चाहते हैं और बिल पास करने में वहां एकत्रित भीड़ को भी शामिल करना चाहते हैं। केजरीवाल जानते हैं कि यह लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र है। लेकिन उनका मक़सद भी इसी भीड़तंत्र को आगे करके अराजकता फैलाना है। पूछा जा सकता है, वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? जो काम माओवादी अपने तमाम हथियारों के बल पर इतने साल के बाद भी इस देश में नहीं कर पाये, क्या उस काम को अब अरविन्द केजरीवाल की इस नई तकनीक से करने का प्रयास किया जा रहा है ? माओवादियों द्वारा विनायक सेन प्रयोग असफल हो जाने के बाद उसको अरविन्द केजरीवाल प्रयोग के नाम से पुनः कामयाब करने का प्रयास तो नहीं हो रहा ? दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल की ४८ दिनों की हरकतों की समीक्षा इसी पृष्ठभूमि में करनी होगी। यदि सोनिया गान्धी की पार्टी को सत्ता से हटना ही पड़ता है तो उसका स्थान माओवादी अराजकता चाहे ले लें, लेकिन राष्ट्रवादी ताक़तें तो किसी भी क़ीमत पर नहीं आनी चाहिये। देशी-विदेशी ताक़तों के इसी प्रयोग को सफल बनाने में अरविन्द केजरीवाल की उपयोगिता है। उसी दिशा में उनका मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा है। लोकसभा के चुनाव में जितनी सीटें उनकी पार्टी जीतती है, वे तो बहुमूल्य है हीं, लेकिन जिन सीटों पर वह भाजपा को पराजित करने में सहायक होती है, वे तो अमूल्य ही कहीं जानी चाहिये। परन्तु सबसे बड़ा प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने से उनकी कमज़ोरी प्रकट होती है या सीनाज़ोरी ? इसका उत्तर तो आने वाले चुनावों में ही मिलेगा।

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10 Comments on "अरविन्द केजरीवाल का इस्तीफ़ा, उनकी कमज़ोरी या सीनाज़ोरी ?"

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Ibs Chauhan
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हमारा ये संकल्प है कि हम हर हाल में कांग्रेस की हार चाहते है
क्योंकि ये देश विरोधी, धर्म विरोधी, समाज विरोधी है व भ्रष्टाचारी है.

. नमो और बाबा का गर्जन
लायेंगे व्यवस्था परिवर्तन

काला धन भी लायेंगे

और भ्रष्टाचार मिटायेंगे

डॉ. मधुसूदन
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आ आ पा जो निर्णय लेता है, उसका निकष क्या है? (१)यदि वास्तव में भ्रष्टाचार विरोध ही उनका निकष है, तो, मोदी जिसने शासकीय भ्रष्टाचार से गुजरात को मुक्त किया, उसके पक्षमें आ आ पा खडा होने के बदले, उसका विरोध क्यों? (२) दूसरा, केजरीवाल के निर्णय भी उनके अपने वचन पर टिके हुए नहीं होते। आज पूर्वमें, तो कल पश्चिम की ओर। (३) उनके पक्ष की नीति के विषय में कितने लोग जानते हैं? जिस नेतृत्व का विश्वास करने की बात चल रही है, उन की भविष्य की दिशा के विषय में कौन सुनिश्चिति पूर्वक कह पाएगा? (४)आगे “आप”… Read more »
इक़बाल हिंदुस्तानी
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आप लोग केजरीवाल पर भाजपा के पक्ष में चाहे जितने आरोप लगाओ लेकिन जनता और विशेष रूप से आम जनता अब समझकचुकी है की कांग्रेस और भाजपा एक ही हैं इसलिए लोकसभा के चुनाव ही नही दिल्ली के नये चुनाव में भी आप को खत्म नही किया जा सकता। सत्तारमें रहे या विपक्ष में आम आदमी पार्टी अब किसी भी दल को मनमानी और खुला खेल नही करने देगी ये चेतावनी केजरीवाल की नोट क्र लीजिये।

शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह

इक़बाल जी खुला खेल फरुखाबादी कहीं भी नहीं होना चाहिए, आम आदमी के नाम पर आप लोग जो चाहे वो निष्कर्ष निकाल लो, लेकिन हकीकत यही है कि मोदी को रोकने के लिए ही आ आ पा को खड़ा किया गया है. हिन्दू मुस्लिम को छोड़ अगर अर्थव्यवस्था के स्तर रोजी रोटी के स्तर पर भी तो मूल्याङ्कन करो. १५ साल का काम देखो. या सिर्फ हवा के बुलबुले से बटेर मारने कि जुगत भिड़ाई जा रही है.

गंगानन्द झा
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गंगानन्द झा

अपने पूर्वाग्रहों को सम्माननीयता देते हुए किया जाने वाले विश्लेषण वस्तुगत एवम् प्रामाणिक हुआ करते। ये व्यायाम किसी पक्ष की वकालत तो कर सकते हैं, पर उसे प्रतिष्ठित नहीं कर सकते।

गंगानन्द झा
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गंगानन्द झा

अपने पूर्वाग्रहों को सम्माननीयता देते हुए किया जाने वाले विश्लेषण वस्तुगत एवम् प्रामाणिक नहीं हुआ करते। ये व्यायाम किसी पक्ष की वकालत तो कर सकते हैं, पर उसे प्रतिष्ठित नहीं कर सकते।

Bipin Kishore Sinha
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बहुत सही विश्लेषण है. केजरीवाल लोकतंत्र के नाम पर कलंक है. जो अन्ना का नहीं हुआ , वह किसी का नहीं हो सकता है. वह फोर्ड के पैसे पर पलता है और सोनिया के इशारे पर चलता है.

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