लेखक परिचय

डा. अरविन्द कुमार सिंह

डा. अरविन्द कुमार सिंह

उदय प्रताप कालेज, वाराणसी में , 1991 से भूगोल प्रवक्ता के पद पर अद्यतन कार्यरत। 1995 में नेशनल कैडेट कोर में कमीशन। मेजर रैंक से 2012 में अवकाशप्राप्त। 2002 एवं 2003 में एनसीसी के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। 2006 में उत्तर प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ एनसीसी अधिकारी के रूप में पुरस्कृत। विभिन्न प्रत्रपत्रिकाओं में समसामयिक लेखन। आकाशवाणी वाराणसी में रेडियोवार्ताकार।

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डा. अरविन्द कुमार सिंह
गलतियाॅ दो प्रकार की होती है। एक जो क्षमायोग्य होती है तथा दूसरी जो सजायोग्य होती है। सीमा पर यदि किसी प्रहरी के सोने से बीस जवानो की जान चली जाती है तो यह गलती क्षमायोग्य नही है। जो गलती अनजाने में हो जाये वो क्षमायोग्य है। पर जो गलती सब कुछ जानते हुये, हो वह सजायोग्य होती है।
राजनिती की दशा और दिशा बदलने के लिये अरविन्द केजरीवाल अन्ना के मना करने के बावजूद राजनीति में आये। दिल्ली चुनाव में 28 सीट देकर जनता ने उनके इरादे की मजबूती पर अपनी मुहर लगायी। थोडी परीक्षा भी ली। लालची है या ईमानदार है। बहुमत का आॅकडा नही दिया। इस परीक्षा में अरविन्द खरे नही उतर सके। सच तो यही था कि वो कांग्रेस और भाजपा के विरोध के चलते 28 सीट पाये थे। जनता के जनमत का अनादर करते हुये वो कांग्रेस पार्टी से हाथ मिला लिये। इसके लिये वे चाहे जितनी बौद्धिकतापूर्ण तर्क दे ले पर सच यही है। ये वो गलती थी जिसे देखकर दिल्ली की जनता हतप्रभ थी। सच भ्रष्टाचार के बगलगीर था। ईमानदारी बेईमानी की गोद में जाकर बैठ गयी।
पाॅच साल की चुनौती या फिर जबतक कांग्रेस पार्टी आपकी सरकार गिरा न देती, कम से कम तबतक आपको दिल्ली की जनता की सेवा करनी थी। 49 दिनो में ही केजरीवाल ने दिल्ली की सत्ता छोडी और लोकसभा की यात्रा पर निकल पडे। देश की यदि सेवा करनी थी, तो फिर दिल्ली की ही किसी सीट से चुनाव लडकर लोकसभा में पहुॅचना था। लेकिन देश सेवा से ज्यादा मोदी विरोध उनका एंगिल आफ देश सेवा था। आप वाराणसी जा पहुॅचे। दिल्ली की तरह वाराणसी में चमत्कार नही हुआ। हिन्दी में एक कहावत है – आधी छेाड, पूरी को धावे। पूरी जाये ना आधी पावे। भारतीय राजनीति में हीरो से जीरो की ऐसी मिसाल कम ही देखने को मिलती है।
एक बार पुनः केजरीवाल दिल्ली की विधानसभा में अपनी किस्मत आजमाने जा पहुॅचे। इस आधार पर – चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाये हम दोनो। आज भारतीय राजनीति उस मुकाम पर पहुॅच गयी है, जहाॅ आपके पास भले कोई सबूत न हो पर आप पूरे बेशर्मी के साथ किसी को आरोपी कह सकते है। इस तरीके को अरविन्द केजरीवाल ने जमकर उपयोग किया दिल्ली के विधानसभा के चुनाव में। उन्ही के कुछ पुराने साथियो ने जब उन्ही की स्टाईल में उनको जबाव दिया तो वो बैकफुट पर आ गये।
प्र्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के शब्दो में – कल तक जो अपने पाकेट में दूसरो के स्वीस बैंक के एकाउंट के नम्बर लेकर घूमते थे। उन्हे आज ये पता नही है कि उनके एकाउंट में कहा से पैसे आ रहे है।
आवाम पार्टी ने प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता में आरोप लगाया कि पाॅंच अप्रैल 2014 को चार कंपनियों  से आप पार्टी ने 50 – 50 लाख रूपये का चन्दा लिया। ये कंपनिया झुग्गी – झोपडी के पते पर पंजीकृत है। इन कंपनियों का किसी वस्तु की खरीद व बिक्री का कोई रिकार्ड नही है। जब कंपनियों के पते की जांच की गयी तो पाया गया वहाॅ पर कोई कंपनी नही है। इस संदर्भ में जब केजरीवाल से पूछा गया तो उनका जबाव था – हो हिम्मत तो हमे गिरफतार कर के दिखाये। उल्टा चोर कोतवाल को डाॅटे – शायद यह हिन्दी मुहावरा इससे ज्यादा सटीक स्थान पर नही रख्खा जा सकता है।
सात फरवरी का दिल्ली का चुनाव जहाॅ मतदाताओ के बौद्धिक क्षमता का परिचायक होगा वही उनका निर्णय पाॅच साल के कार्यकाल को भी प्रभावित करेगा। वोट देने के पहले मतदाता को यह सोचना होगा कि केन्द्र और विधानसभा की सरकार एक ही पार्टी की हो या फिर किसी अन्य पार्टी को मौका दे। दिल्ली का एक साल बरबाद करने वालो को सजा दे या फिर एक मौका और दे। यह भी विचार करना होगा। यदि किसी का बहुमत नही आया तो क्या फिर आप पार्टी और कांग्रेस पुनः एक हो जायेगे ? बडी पार्टी होने के बावजूद क्या भाजपा फिर सरकार नही बनायेगी? दुबारा चुनाव क्या दिल्ली के हक में होगा? इसका एक ही उत्तर है। मतदान अवश्य करे और किसी एक पार्टी को पूर्ण जनादेश दे। यही दिल्ली के हक में है। यही देश के हक में है और यही दिल्ली के विकास के हक में है।

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1 Comment on "अरविन्द केजरीवाल – चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाये हम दोनो"

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दिनेश सोनी
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दिनेश सोनी

बहुत अच्छा लिखा सर

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