लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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virjanandमनमोहन कुमार आर्य

महर्षि दयानन्द (1825-1883) गुजरात में जन्में, मथुरा में पंजाब में जन्में गुरु विरजानन्द सरस्वती से संस्कृत व्याकरण व आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन कर उनकी महत्ता को उन्होंने समझा और इसके बाद वर्तमान के उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, बंगाल, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली आदि अनेक प्रदेशों व स्थानों में प्रचार किया। दक्षिण भारत में उन्हें प्रचार करने का अवसर नहीं मिला। यदि उनका जीवन कुछ अधिक होता तो वह वहां भी प्रचारार्थ जाते। उनकी मृत्यु की लम्बी अवधि के बाद आर्यसमाज ने दक्षिण में वैदिक धर्म के प्रचार की ओर ध्यान दिया। स्वामी श्रद्धानन्द जी व महात्मा हंसराज जी का इस कार्य में विशेष योगदान है। पं. इन्द्र विद्यावाचस्पति जी लिखित आर्यसमाज के इतिहास से हम इसका विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं जिससे पाठ कों को इसका कुछ ज्ञान व जानकारी हो सकेगी।

 

अनेक कारणों से प्रारम्भ के 40 वर्षों में भारत के दक्षिण भाग में आर्यसमाज का सन्देश पूरी तरह नहीं पहुंचाया जा सका। मुख्य कारण तो सम्भवतः यही था कि महर्षि को पूना से आगे दक्षिण में जाने का अवसर नहीं मिला। यदि अकाल में ही उनका निर्वाण न हो जाता तो वह दक्षिण का दौरा लगाकर वहां भी आर्यसमाज का बीज बो देते। महर्षि के पश्चात् उत्तर के प्रान्तों की सभाओं को अपने ही काम बहुत थे। संस्थाओं के खुल जाने से उनके हाथ भर गये थे। सार्वदेशिक सभा की स्थापना तो हो गई परन्तु वह अभी प्रान्तों के प्रतिनिधियों के परस्पर परिचय-स्थान के अतिरिक्त और कुछ नहीं बन सकी थी।

 

1917 में सार्वदेशिक सभा की अन्तरंग सभा का एक अधिवेशन हुआ, जिसमें दक्षिण भारत में वैदिक धर्म के प्रचार के सम्बन्ध में ब्रह्मा (बर्मा/म्यमार) की आर्य प्रतिनिधि सभा के एक पत्र पर विचार होने के अनन्तर निम्नलिखित प्रस्ताव स्वीकृत किया गया–‘‘मद्रास में प्रचार के सम्बन्ध में विचार किया गया और आर्य प्रतिनिधि सभा ब्रह्मा का पत्र 23-1-17 का पढ़ा गया। सर्वसम्मति से निश्चय हुआ कि मद्रास में प्रचार के काम को सभा अपने हाथ में ले ले और आर्य प्रतिनिधि सभाओं तथा सर्वसाधारण से धन की  अपील की जाय। 1800 रुपये के व्यय की स्वीकारी बजट में बढ़ा देने की साधारण सभा से प्रार्थना की जाये। किसी योग्य व्यक्ति की तलाश का उद्योग किया जाय। समाचार-पत्रों में विज्ञापन दिया जाय।”

 

प्रस्ताव तो स्वीकार हो गया परन्तु चार वर्ष तक उस पर कोई अमल न हो सका। सभा के प्रधान की ओर से इस कार्य के लिये 5 हजार रुपये की अपील की गयी और प्रान्तीय सभाओं के नाम राशियां भी लगा दी गयीं। परन्तु परिणाम कुछ न निकला। अन्त में, किसी तरह कार्य आरम्भ करने के लिये सभा ने अपनी अपील को केवल 1500 रुपयों तक परिमित कर दिया और प्रान्तीय सभाओं से अपना-अपना भाग भेजने की मांग की। परिणाम तब भी बहुत संतोषजनक न निकला। केवल एक प्रान्त से 350 रुपये प्राप्त हुए। उसी भरोसे पर सभा-प्रधान ने पं. सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार को वैदिक धर्म और आर्यभाषा प्रचार के लिए रवाना कर दिया। कुछ समय पीछे पण्डित देवेश्वर सिद्धान्तालंकार भी सत्यव्रत जी की सहायता के लिए जा पहुंचे। दोनों कार्यकर्ताओं ने दो वर्ष तक बड़े परिश्रम से कार्य किया और कार्य को स्थिरता देने के लिये दयानन्द ब्रह्मचर्य आश्रम नाम के एक शिक्षा-केन्द्र की स्थापना की। मैसूर में कार्य करने के लिये सभा की ओर से पं. गोपालदत्त शास्त्री और पं. भीमसेन विद्यालंकार भेजे गये।

 

मद्रास में तथा दक्षिण के अन्य भागों में प्रचार कार्य आरम्भ करने के समय से ही स्वामी श्रद्धानन्द जी की इच्छा थी कि वे स्वयं वहां जाकर वैदिक धर्म की ओर शिक्षित समाज का और जनता का ध्यान आकृष्ट करें। एक बार आप कलकत्ते तक चले भी गये थे परन्तु अस्वस्थ हो जाने के कारण लौट आये। अमृतसर कांग्रेस के अवसर पर ‘हिन्दू’ के यशस्वी सम्पादक श्री कस्तूरी रंगा आयंगर और वयोवृद्ध राष्ट्रीय नेता श्री विजय राघवाचार्य आदि से परिचय होने पर उन लोगों ने स्वामी जी को आग्रहपूर्वक निमंत्रित किया। अन्त में स्वामी जी की प्रचार के लिए मद्रास जाने की अभिलाषा सन् 1925 में पूरी हो सकी। आप दिल्ली से चल कर बम्बई, पूना और बंगलौर ठहर कर कार्यकर्ताओं से मिलते और व्याख्यान देते हुए 6 मई को मद्रास पहुंचे। उसी अवसर पर पं. धर्मदेव जी विद्यावाचस्पति और पं. केशवदेव ज्ञानी भी आपके साथ गये थे, जो पर्याप्त समय तक मद्रास में ही रहे। आप मई के अन्त तक मद्रास प्रान्त में भ्रमण करते रहे। मद्रास की सबसे बड़ी समस्या अस्पृश्यता सम्बन्धी (थी/) है। स्वामी जी ने अपनी प्रचार-यात्रा में उसी पर अधिक बल दिया और प्रान्त के कार्यकर्ताओं में दलितोद्धार के लिए अपूर्व स्फूर्ति पैदा कर दी। मद्रास छोड़ने से पूर्व प्रान्त के निवासियों की ओर से एक विशाल सभा में, जिसके सभापति वहां के प्रसिद्ध नेता श्री मोहम्मद याकूब थे, एक मानपत्र स्वामी जी को समर्पित किया गया। 1925 में आप फिर मद्रास के दौरे पर गये और प्रारम्भ किये हुए काम को अधिक दृढ़ता प्रदान की। 1924 के अक्तूबर मास में मद्रास के कुछ हिस्सों में बाढ़ आने से बहुत हानि हुई थी। सभा की ओर से समाचार पत्रों में अपील होने पर जो धन प्राप्त हुआ, उसे लेकर पं. सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार को वहां भेजा गया। गुरुवयूर के समीप चावभाट में केन्द्र खोल कर हजारों बाढ़-पीड़ित परिवारों की सहायता की  गई।

 

1921 में मलाबार (केरल) में मोपलाओं द्वारा उत्पात किये जाने पर देश भर के हिन्दुओं में सनसनी फैल गई। हिन्दू पुरुषों और स्त्रियों पर भयंकर अत्याचार हुए। सैकड़ों लोगों के जनेऊ जबरदस्ती उतारे गये और चोटियां काटी गयीं। इन समाचारों र्ने आसमाज के कार्यकर्ताओं के हृदयों में उत्कट प्रतिक्रिया पैदा कर दी थी। महात्मा हंसराज जी को जब लाहौर में ये समाचार मिले तो कहा जाता है कि वे रात भर सो नहीं सके। करवटे लेते रात बिताई। दूसरे दिन प्रादेशिक सभा की बैठक हुई। उसमें सहायता भेजने का प्रस्ताव उपस्थित करते हुए महात्मा हंसराज जी ने कहा था, ‘‘जागृति के इस समय में भी किसी को बलपूर्वक मुसलमान बनाना हमारे लिए बहुत बड़ी ललकार है। इस ललकार का उत्तर दिया जायगा।” प्रादेशिक सभा ने सहायता देने के प्रस्ताव को स्वीकार करके पं. ऋषिराम जी को वहां जाने का आदेश दिया। श्रीयुत खुशहालचन्द ‘खुर्सन्द’ और पं. मस्तानचंद भी उनके साथ भेजे गये। पीछे से महता सावनमल और अन्य कई कार्यकर्ता मलाबार पहुंच गये। कुछ महीनों के परिश्रम से इन आर्य कार्यकर्ताओं को बलात्कार से मुसलमान बनाये गये लगभग अढ़ाई हजार हिन्दुओं को अपने धर्म में वापिस  लाने में सफलता प्राप्त हो गई। जो मन्दिर तोड़े गये थे, उनकी मरम्मत करा दी गई। आर्यसमाज के कार्यकर्ता मलाबार से तब पंजाब लौट कर आये जब उन्हें निश्चय हो गया कि  अब बलपूर्वक धर्म से च्युत हुआ कोई व्यक्ति शेष नहीं रहा। इसमें सन्देह नहीं कि यदि प्रादेशिक सभा के कार्यकर्ता इतना शीघ्र मलाबार में न पहुंच जाते तो उस प्रदेश में शांति हो जाने पर भी हिन्दुओं का रहना असम्भव हो जाता।

 

हम (लेखक) यहां यह अवगत कराना उचित समझते हैं कि गांधी जी ने मलाबार के इस अमानवीय घटनाक्रम पर मौन साधे रखा। अन्य कुछ अवसरों पर भी उन्होंने आर्यसमाज के विरोध में बातें कहीं जबकि यह भी इतिहास की घटना है कि उनके पुत्र श्री हीरालाल गांधी द्वारा इस्लाम स्वीकार किये जाने पर गांधी जी की धर्मपत्नी माता कस्तूरबा जी के अनुरोध पर आर्यसमाज के विद्वानों ने ही उन्हें समझाकर पुनः वैदिक धर्म में प्रविष्ट कराया था। पाठकों को यह भी बताना उचित होगा कि मलाबार के इस घटनाक्रम पर सुप्रसिद्ध कालजयी विद्वान, क्रान्तिकारी मृत्युंजय वीर सावरकर जी ने ‘मेापला विद्रोह’ नाम से एक उपन्यास की रचना की थी। इसका हिन्दी अनुवाद आर्य साहित्य के विक्रेताओं व दयानन्द संस्थान आदि से उपलब्ध हो जाता है। इसे प्रत्येक आर्य हिन्दू को अवश्य पढ़ना चाहिये। हमने इसे व वीर सावरकर जी ही लिखित ‘गोमांतक’ उपन्यास को अपने आर्य मित्र व गुरु प्रा. अनूप सिंह जी की प्रेरणा पर पढ़ा था। यह हिन्दुओं में आर्यत्व को जगाने का काम करता है। दक्षिण भारत में आन्ध्र प्रदेश में आर्यसमाज ने सबसे अधिक प्रभावशाली कार्य किया है। आन्ध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद आजादी से पहले एक मुस्लिम रिसायत थी जिसकी बहुसंख्यक प्रजा आर्य-हिन्दू थी। वहां निजाम का शासन था जिसमें हिन्दुओं पर अनेकानेक अमानवीय अत्याचार किये गये। सन् 1938 में वहां आर्यसमाज ने महात्मा नारायण स्वामी और स्वतन्त्रानन्द जी के नेतृत्व में वहां प्रभावशाली सत्याग्रह किया था जो काफी कुछ सफल रहा। पं. नरेन्द्र जी आन्ध्र प्रदेश में आर्यसमाज के मुख्य एवं प्रभावशाली नेता थे और लौह पुरुष के नाम से विख्यात थे। प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी व डा. कुशलदेव शास्त्री जी आदि ने पं. नरेन्द्र जी का जीवन चरित लिखा है। हैदराबाद में आर्यसमाज की गतिविधियों पर एक अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हैदराबाद में आर्यों की साधना व संघर्ष’ है जिसके लेखक पं. नरेन्द्र जी हैं। इस अपूर्व आर्य सत्याग्रह से जुड़ी एक गीत की यह पंक्तियां भी देश भर में बहुत प्रसिद्ध हुईं ‘तेरे दीवाने जिस घड़ी दक्षिण दिशा को चल दिए। हैरत में लोग रह गये दुनिया का दिल दहला दिया।।’ हैदराबाद सत्याग्रह पर कुछ अन्य पुस्तकें व ग्रन्थ भी उपलब्ध हैं।

 

दक्षिण भारत में मुख्यतः मद्रास, अब चेन्नई, में आर्यसमाज की नींव रखने व कार्य का विवरण पं. इन्द्र जी का लिखा हुआ हमने उपर्युक्त पक्तियों में प्रस्तुत किया है। आर्यसमाज की नई पीढ़ी और अनेक पुराने विद्वान व कार्यकर्ता भी या तो इन बातों से अनभिज्ञ हैं वा उन्हें यह ऐतिहासिक प्रसंग विस्मृत हो चुकें हैं, अतः हमने इसे प्रस्तुत किया है। इस इतिहास में स्वामी श्रद्धानन्द जी व अन्य विद्वान नेताओं का आर्यसमाज के लिये किया गया घोर तप भी दृष्टिगोचर होता है। हम आशा करते हैं कि स्वामी श्रद्धानन्द जी के कार्य आर्यसमाज के अनुयायियों के लिए मार्गदर्शन करते हैं। हमें स्वकर्तव्यों की नित्य प्रेरणा के लिए ऋषि दयानन्द और स्वामी श्रद्धानन्द जी आदि विद्वानों के ग्रन्थों व जीवनचरित का अध्ययन करते रहना चाहिये।

 

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