लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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आईपीएल- 6 में स्पॉट फिक्सिंग विवाद ने आखिरकार बीसीसीआई के निर्वासित अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन पर नकेल कस ही दी। उच्चतम न्यायालय ने श्रीनिवासन को बड़ा झटका देते हुए उनके बीसीसीआई अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने पर रोक  लगा दी है। साथ ही न्यायालय ने बीसीसीआई को 6 हफ्ते के अंदर चुनाव करवाने की हिदायत दी है। न्यायालय ने इसके साथ ही राजस्थान रॉयल्स के मालिक राज कुंद्रा और श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन को सट्टेबाजी में दोषी बताते हुए उनकी सजा तय करने के लिए तीन जजों का पैनल बनाया है। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने भारतीय क्रिकेट बोर्ड के नियम 6.2.4 को भी रद्द कर दिया। दरअसल इस नियम के चलते ही बोर्ड के सदस्यों को व्यावसायिक गतिविधियों में हिस्सा लेने की इजाजत दी गई थी और इस नियम के रद्द होने से ही श्रीनिवासन भारतीय क्रिकेट बोर्ड का चुनाव नहीं लड़ पाएंगे, क्योंकि वह इंडिया सीमेंट्स कंपनी के मालिक और डायरेक्टर भी हैं, जो आईपीएल में चेन्नै सुपर किंग्स टीम का संचालन करती है। न्यायालय ने इस नियम पर बीसीसीआई को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि श्रीनिवासन को टीम खरीदने की इजाजत देने वाला नियम फिक्सिंग मामले में असली खलनायक है। श्रीनिवासन समेत जो-जो अधिकारी नियम के घेरे में हैं, वे चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। न्यायालय का मानना है कि श्रीनिवासन को आईपीएल टीम का स्वामित्व लेने की अनुमति देने के लिए बीसीसीआई के नियमों में संशोधन सही नहीं था। हितों के टकराव ने बहुत भ्रम की स्थिति पैदा की है। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने फिक्सिंग मामले में निर्वासित अध्यक्ष श्रीनिवासन को राज कुंद्रा और गुरुनाथ मयपन्न के मुकाबले थोड़ी राहत दी है। न्यायालय ने कहा है कि श्रीनिवासन के खिलाफ आरोपों पर पर्दा डालने के आरोप साबित नहीं हुए हैं। इस दौरान न्यायालय ने एक अहम आदेश में कहा कि बीसीसीआई के सभी कार्य जनता से जुड़े हैं इसलिए उन्हें अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए। कुल मिलाकर “दी ग्रेट इंडियन ड्रामा लीग” में ऐसा बहुत कुछ था जो न सरकार दिखा रही थी और न ही बोर्ड दिखाना चाहता था पर उच्चतम न्यायालय ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। हालांकि एक श्रीनिवासन को चुनाव लड़ने से रोक देने मात्र से आईपीएल पर लगे दाग नहीं धुल पाएंगे मगर इतना तय है कि फैसले से अब बोर्ड के अन्य सदस्य एहतियात ज़रूर बरतेंगे।

3 जनवरी 1945 को जन्मे श्रीनिवासन निर्वासित बीसीसीआई अध्यक्ष के अलावा एक उद्योगपति और इंडिया सीमेंट्स मे एमडी हैं। श्रीनिवासन ने मद्रास विश्वविद्यालय से बी.एस.सी किया और फिर आगे की पढ़ाई के लिए शिकागो चले गए। उन्होंने वहां इल्यूशन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से कैमिकल इंजीनियरिंग में पीजी डिप्लोमा किया। बीसीसीआई अध्यक्ष बनने से पहले वे बोर्ड के सचिव थे। सितंबर 2011 में वे बोर्ड के अध्यक्ष बने। इसके अलावा 68 वर्षीय श्रीनिवासन वर्तमान में आईपीएल फ्रेंचाइजी टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के मालिक के साथ-साथ तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन, तमिलनाडु गोल्फ फेडरेशन और ऑल इंडिया चेस फेडरेशन के अध्यक्ष भी हैं। ज़ाहिर है इतने प्रभावशाली व्यक्तित्व को झुका पाना क्रिकेट खेल संघों के बस की बात नहीं थी।उस पर भी श्रीनिवासन का दबाव में पद न छोड़ने का एलान उनकी हठधर्मिता को दर्शाता था। 2013 में श्रीनिवासन के खिलाफ खेल संघों में ही विवाद शुरू हो गया था। गुजरात, मध्यप्रदेश, हैदराबाद, असम, गोवा सहित अन्य कई क्रिकेट खेल संघों ने भी श्रीनिवासन को नैतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा देने की सलाह दी थी। किन्तु श्रीनिवासन अपने अड़ियल रुख पर अड़े रहे और उन्होंने दुनियाभर में बीसीसीआई और क्रिकेट की भद पिटवा दी। शरद पवार गुट, शशांक मनोहर गुट के धुर विरोधी श्रीनिवासन की बीसीसीआई से विदाई निश्चित रूप से भद्र जनों के इस खेल में शुचिता लाएगी और उनके करीबियों को भी अब धीरे-धीरे बोर्ड में हाशिये पर धकेला जाएगा। दरअसल यहां तालाब की एक मछली ही गंदी नहीं है वरन पूरा तालाब ही गंदगी से सराबोर है। हज़ारों मयपन्न और सैकड़ों श्रीनिवासन भद्रजनों के इस खेल की गरिमा को तार-तार करने में लगे हैं। आईपीएल में मैच फिक्सिंग से लेकर स्पॉट फिक्सिंग की बातें पहले भी उठती रही हैं किन्तु न तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और न ही सरकार ने इस ओर कोई ठोस कदम उठाए|

आईपीएल-5 में स्पॉट फिक्सिंग के जिन्न में खूब तहलका मचाया था। उस दौरान जिन क्रिकेटरों को स्पॉट फिक्सिंग में पकड़ा गया वो थे, पुणे वॉरियर्स के मोहनीश मिश्रा, किंग्स इलेवन पंजाब के शलभ श्रीवास्तव, डेक्कन चार्जर्स के टी पी सुधींद्र, किंग्स इलेवन पंजाब के अमित यादव और दिल्ली के एक क्रिकेटर अभिनव बाली। वहीं आईपीएल-6 में स्पॉट फिक्सिंग का भंडाफोड़ करते हुए दिल्ली पुलिस ने दावा किया था कि इस मामले में तीन क्रिकेटर क्रमशः अंजीत चंदीलिया, एस श्रीशांत और अंकित चव्हाण उसके रडार पर थे और ये क्रिकेटर बुकीज के सीधे संपर्क में थे। दिल्ली पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर नीरज कुमार और स्पेशल सेल के डीएसपी संजीव यादव ने प्रेसवार्ता में बताया था कि 5 मई, 9 मई और 15 मई 2013 को हुए राजस्थान के मैचों में स्पॉट फिक्सिंग हुई और ये फिक्सिंग इन्होंने की। पुलिस ने इन तीनों क्रिकेटरों और कई बुकियों को गिरफ्तार किया था। इनके खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश का केस दर्ज किया गया था। ये तीनों ही खिलाड़ी राजस्थान रॉयल्स टीम में थे। इस मामले से भारतीय क्रिकेट टीम के उद्दीयमान तेज़ गेंदबाज एस श्रीशांत  का करियर खत्म हो गया था।

वैसे भी यह कोई पहला मौका नहीं है कि आईपीएल को लेकर विवाद न हुए हों किन्तु सभी विवादों को दरकिनार कर यदि आईपीएल अब तक अपनी चमक बिखेर रहा है तो समझा जा सकता है कि अब बात सरकार और बीसीसीआई से इतर विशुद्ध रूप से धन के लेनदेन की ओर इंगित कर रही है जिसमें फायदा सभी उठा रहे हैं| ऐसा प्रतीत होता है कि आईपीएल में काले धन को सफ़ेद करने की प्रक्रिया का दायरा बीसीसीआई के बूते से कहीं आगे निकल गया है| अतः घर के परदे बदलने की बजाए पूरा का पूरा घर ही बदलना होगा वरना क्रिकेट में कालिमा के जो दाग देश को शर्मशार कर रहे हैं वे कभी नहीं धुल पायेंगे। श्रीनिवासन को चाहिए कि वे अब अपनी इंडिया सीमेंट्स कंपनी को चलाएं और क्रिकेट को उसके हाल पर छोड़ दें। उच्चतम न्यायालय से झटका खाए श्रीनि को अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के पद से भी इस्तीफ़ा दे देना चाहिए ताकि उनका बचा-खुचा मान-सम्मान बचा रह सके।

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1 Comment on "श्रीनि के बहाने खेल में शुचिता का सवाल"

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sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar

गौतमजी,क्रिकेट की सफेदी पर एक नहीं दो नहीं कई काले दाग लग गए हैं. क्रिकेट बोर्डों के अधिकारीयों को तो माननीय न्यायालय ने बेनकाब किया ही है,कुछ खिलाडी छूट गए हैं. उन्हें तीन माननीय न्यायाधीशों की समिति बेनकाब करेगी. अब वायु सेना ,जलसेना और थलसेना तथा टेरिटोरियल सेना ने इस बात पर विचार करना चाहिए की क्रिकेट खिलाडियों को मानद पद दिए जांय या नही. अब इस सफेदपोश खेल की सफेदी लम्बे समय तक काली और मटमैले रंग की रहेगी.

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