लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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aarya samaj

आर्य समाज के 10 नियम है जो संसार की सभी संस्थाओं व संगठनों में श्रेष्ठ कहे जा सकते हैं। इन नियमों में छठे नियम के अनुसार संसार का उपकार करना आर्य समाज का मुख्य उद्दैश्य कहा गया है अर्थात् सभी मनुष्यों की शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसका अपना जीवन अन्य मनुष्यों एवं अन्य सभी प्राणियों से किसी न किसी प्रकार से जुड़ा हुआ है और परस्पर आश्रित व निर्भर भी है। मनुष्य की उत्पत्ति माता व पिता से होती है। माता-पिता के अपने-अपने भाई व बहिन होते हैं। उनके अपने-अपने बच्चे होते हैं। यह सब मिल कर एक वृहत परिवार बनता है। इसी प्रकार से अन्य मनुष्यों के भी वृहत परिवार होते हैं। सभी मनुष्यों को यदि मिलाकर देखा जाये तो एक वृहत समाज व देश बनता है। इसी प्रकार से अनेक देशों से यह विश्व बना है। बच्चे का जब जन्म होता है तो उसमें माता के साथ धायी या चिकित्सकों की भूमिका होती है। बच्चे को दूध पिलाने से आरम्भ होकर कुछ बड़ा होने पर उसे भोजन भी चाहिये। माता-पिता व वृहत परिवार के लोग भोजन करते हैं तो यह उन्हें कृषक भाईयों से मिलता है। निवास के लिए मकान बनाना है तो इस कार्य को करने वाले अनेक प्रकार के व्यक्ति तथा निर्माण सामग्री के निर्माता व तैयार करने वाले लोगों की आवश्यकता पड़ती है। मनुष्य को दूध के लिए गाय, बकरी व भैंस आदि पशु, किसान को बैल, वनों में वन्य प्राणी, नभ में नभ-चर तथा जल में जल-चर प्राणी होते हैं जिनसे हमारा जीवन का सीधा व अन्य सम्बन्ध होता है। बिना शिक्षकों के हम ज्ञानी व सभ्य नहीं बन सकते। वैदिक ग्रन्थों को पढ़ने पर नाना प्रकार की योनियों की उत्पत्ति का सिद्धान्त व इसमें निहित कारणों का पता चलता है। इस प्रकार से मनुष्य व सारा प्राणी जगत व हमारी प्रकृति एवं सृष्टि परस्पर एक दूसरे सम्बन्धित हैं जिसे एक वृहत परिवार की संज्ञा दी जा सकती है।

मनुष्य जीवन का उद्देश्य उन्नति व मोक्ष बताया जाता है। इसके समर्थन में हमारे दर्शन शास्त्र में अनेकों कारण व तर्क दिए गये हैं। उन्नति का अर्थ है कि अच्छे कामों को करके धन व यश अर्जित करना, सेवा, उपकार, ध्यान व यज्ञ आदि करके मानव के कर्तव्यों का पालन किया जाता है। हम जैसा सोचते हैं, सुनते हैं, पढ़ते हैं व कार्य करते हैं, उन सब के संस्कार हमारी 5 ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा हमारे मन व आत्मा पर पड़ते हैं। इन कर्मों व संस्कारों का कुछ भाग हम इस संसार को बनाने वाले सृष्टिकत्र्ता जो कर्मों का फलदाता है, के द्वारा इसी जन्म में भोग लेते हैं और शेष कर्मों के फलों को भोगने के लिए हमें अगला जन्म मिलता है। यही सिद्धान्त पुनर्जन्म का आधार है जो कि सत्य व वैज्ञानिक है। सृष्टि कर्ता ईश्वर व जीवात्मा सत्य, चित्त, निराकार, अनादि, अजन्मा, अमर, अनुत्पन्न, ईश्वर सर्वव्यापक तथा जीवात्मा एकदेशी, ईश्वर सर्वज्ञ व आत्मा अल्पज्ञ, ईश्वर अजन्मा तथा जीवात्मा जन्म-मरण धर्मा आदि गुणों वाले हैं। यही वैदिक दर्शन है जिसके सभी सिद्धान्त व मान्यतायें अकाट्य व पूर्णतया सत्य है।

यजुर्वेद का लोकप्रिय वेदमन्त्र 30/3 ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद भद्रन्तन्न आसुव।। में ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि प्राणों का भी प्राण, दुःख विनाशक, सब सुखों को देन वाला ईश्वर हमारे सभी दुःखों, दुर्गुण व दुव्यर्सनों को दूर कर हमें सभी कल्याणकारी गुण, कर्म, स्वभाव व सुख देने वाले जो पदार्थ हैं, वह हमें प्राप्त कराये। इसके लिए मनुष्य को क्या करना है? पहला कार्य तो शारीरिक उन्नति, दूसरी आत्मिक उन्नति तथा तीसरी सामाजिक उन्नति करनी है। मनुष्य का शरीर स्वस्थ व निरोग होगा तभी वह आत्मिक उन्नति कर सकता है। इसके लिए ईश्वर के सच्चे स्वरूप को जानकर उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना व ध्यान करने के साथ आसन-व्यायाम, प्राणायम, शुद्धाहार, ब्रह्मचर्य का पालन आदि कार्य करने होते हैं। ऐसा करने से ही आत्मिक उन्नति भी साथ-साथ होती है। आत्मिक उन्नति के लिए सत्य ज्ञान, भौतिक व आध्यात्मिक दोनों का होना आवश्यक है। आजकल भौतिक ज्ञान तो मनुष्य प्राप्त कर लेता है परन्तु आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से वह शून्य पाया जाता है। विभिन्न मत-मतान्तर भी उसे भ्रमित करते हैं जिससे वह सच्चे आघ्यात्मिक ज्ञान व ईश्वरोपासना से वंचित रह जाता है और उसकी अपेक्षित आत्मिक उन्नति नहीं होती। महर्षि दयानन्द ने आध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में अनेकों खोजें कीं और पाया कि सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान वेदों, उपनिषदों, योग दर्शन आदि वैदिक ग्रन्थों में हैं। इसका उन्होंने व्यापक प्रचार किया और इसके लिए सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, वेदों का भाष्य, संस्कार विधि, गोकरूणानिधि, व्यवहारभानु आदि अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया। इनका अध्ययन व आचरण आत्मिक वा आध्यात्मिक उन्नति आधार है। यदि साम्प्रदायिक दृष्टि से इन ग्रन्थों को देखेंगे तो इससे होने वाले लाभों से वंचित हो जायेंगे अतः शुद्ध अन्तःकरण से इनका अध्ययन करना चाहिये। यदि इन ग्रन्थों का अध्ययन भी कर लिया परन्तु इनसे लाभ नहीं उठाया अर्थात् इनकी शिक्षाओं को आचरण में नहीं ढ़ाला तो भी कोई विशेष लाभ नहीं होगा। अतः इन ग्रन्थों से मत, मतान्तर व सम्प्रदाय का भेद भुलाकर अध्ययन करना चाहिये और इसमें जो सत्य ज्ञान है उससे लाभ उठाना चाहिये। इससे मनुष्य की आत्मिक उन्नति होना अवश्यम्भावी है। इसके अन्य उपाय नही है।

 

उपर्युक्त उपायों से हमारी शारीरिक और आत्मिक उन्नति तो हो गई परन्तु यदि हम सामाजिक उन्नति नहीं करते तो हम अनेक लाभों से वंचित हो जाते हैं। इसका कारण है कि ईश्वर एक न्यायाधीश की भांति भी कार्य करता है। वह सर्वव्यापक और सर्वान्तरयामी होने के कारण प्रत्येक जीव के प्रत्येक कार्य का चाहे वह दिन के प्रकाश में करे या रात के अन्धेरे में या अन्य प्रकार से छुपा कर, ईश्वर को सबका पूरा-पूरा ज्ञान रहता है। वह न्यायाधीश होने के कारण हमारे प्रत्येक कर्म का हमें समयानुसार फल देता है। कर्म के फलों से कोई भी कदापि बच नहीं सकता। अतः सद्कर्म करना सबके लिए आवश्यक एवं अपरिहार्य है अन्यथा दण्ड स्वरूप अनेक जन्म-जन्मान्तरों में निम्न प्राणि-योनियों में जन्म लेकर फलों को भोगना होगा। सामाजिक उन्नति का अर्थ है कि सबके साथ पक्षपात रहित, प्रेम, दया, करूणा, स्नेह, सहयोग, परोपकार आदि के कार्यों को करना और इसके साथ ही असमानता, विषमता, अज्ञान, अन्धविश्वास, छुआछूत का व्यवहार न स्वयं करना और दूसरों को समझाकर उसे दूर करने के हर सम्भव प्रयास करना। सामाजिक उन्नति में दान का भी महत्वपूर्ण स्थान है। हम जो धन आदि का उपार्जन करते हैं वह यदि अपनी आवश्यकता से अधिक हैं तो उसे पीडि़त व अभावग्रस्त अपने बन्धुओं को देना दान कहलता है। यह दान अर्थ का भी हो सकता है और ज्ञान, श्रम व वस्तुओं का भी।  इन कार्यों को करने से श्रेष्ठ मनुष्य, श्रेष्ठ समाज व श्रेष्ठ देश का निर्माण होता है। ऐसा होने पर सारा विश्व ही श्रेष्ठ बनता है।  स्वामी दयानन्द ने यह नियम वेदों का गहन अध्ययन कर बनाया है। अन्य धर्म शास्त्रों, धार्मिक संगठनों व सम्प्रदायों आदि में इस प्रकार का नियम कही दृष्टि गोचर नहीं होता। सब अपनी-अपनी जनसंख्या बढ़ाने पर तो ध्यान देते हैं परन्तु कोई गुणवत्ता पर भी ध्यान देता है, ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता।

आईये, आर्य समाज के छठें नियम के अनुसार स्वयं का जीवन बनाये और एक श्रेष्ठ मनुष्य व नागरिक बन कर समाज व देश को मजबूत करें।

 

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