लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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11अक्टूबर पर विशेषः-

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भारतीय संस्कृति पर्वो व उत्सवों की संस्कृति है। पर्वो व उत्सवों की लगातार चलने वाली श्रृंखला के अंतर्गत विजयदशमी का पर्व अधर्म पर धर्म की विजय और शक्ति का प्रतीक पर्व है। विजयदशमी का पर्व मानव में दस प्रकार के पापों को समाप्त करने का पर्व है लेकिन कलयुग के वातावरण में हम सभी कोई्र न कोई पाप कभी अंजाने मंे या फिर जानबूझकर करते ही रहते हंै। विजयदशमी का पर्व नौ दिन के नवरात्रि के साथ संपन्न होता है अर्थात विजयदशमी का पर्व मनाने के पूर्व हिंदू समाज मां दुर्गा के नौ रूपों की वंदना करता है । मान्यता है कि विजयदशमी के दिन अयोध्या के राजा भगवान श्रीराम ने अपनी वानर सेना के साथ लंकाधिपति रावण का वध किया था और रामराज्य की नीवं रखी थी। इतिहास में यह भी मान्यता है कि विजयदशमी के ही दिन महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज ने मुस्लिम आततायी औरंगजेब के खिलाफ विजयी प्रस्थान किया था और हिंदू समाज का संरक्षण किया था। विजयदशमी के ही दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का दिवस भी मनाया जाता है इसी दिन सरसंघचालक संघ के स्वयंसेवकांे को नागपुर से अपना वार्षिक संदेश भी देते हैं। शिवसेना का वार्षिक उत्सव भी इस दिन मुम्बई में धूमधाम से मनाया जाता है।
विजयदशमी शक्ति और शक्ति का समन्वय करने वाला पर्व है। इस दिन देश के कई हिस्सों में शस्त्र पूजा भी की जाती है। विजयदशमी का पर्व मनाने के पूर्व नवरात्रि के नौ दिन तक शक्तिशाली बना मनुष्य विजयप्राप्ति के लिए तत्पर रहता है। भारतीय संस्कृति सदा से ही वीरता , साहस व शौर्य की समर्थक रही है। प्रत्येक व्यक्ति और समाज में वीरता के प्रादुर्भाव को ही दशहरा कहा जाता है। भगवान राम के समय से ही यह दिन विजय प्रस्थान के दिन के रूप में निश्चित है। भारतीय इतिहास में ऐसे अनेकानेक उदाहरण हैं जिसमें तमाम राजाओं ने विजयदशमी के ही दिन विजय के लिए प्रस्थान किया है।
आश्विन शुक्ल दशमी के दिन तारा उदय होने के समय विजय नामक मुहूर्त होता है। विजयदशमी पर्व का सांस्कृतिक और सामाजिक पहलू भी है। भारत एक कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपनी खेत में से सुनहरी फसल उगाकर संपत्ति को घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के अवसर को वह भगवान की कृपा के रूप में मनाता है। समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व केे अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इस पर्व को मनाया जाता है। सायंकाल के समय पर सभी ग्रामीण जन सुंदर- सुंदर नये वस्त्रों से सुसज्जित होकर गंाव की सीमा पार कर शमीवृख की पूजा करके अपने गांव वापस आते हैं। यहां पर शमीवृक्ष को लूटने की और स्वयं आपस मंे आदान- प्रदान करने की भी परम्परा है।
यह पर्व पूरे भारत में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। हिमंाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। कुल्लू के दशहरा का आनंद लेने के लिए काफी मात्रा में पर्यटक आते हैं।इस दिन पहाड़ी लोग अपने ग्रामीण देवता का धूमधाम से जुलूस निकालते हैं तथा देवताओं को बहुत ही सुंदर व आकर्षक पालकी मेें सजाया जाता है। साथ ही वे अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं। इस जुलूस में प्रशिक्षित नर्तक और नर्तकियां मनमोहक नृत्य प्रस्तुत करते -करती हैं। कल्ू दशहरे के अवसर पर ऐतिहासिक भीड़ उमड़ती है। दशमी के दिन उत्सव की छटा निराली होती है। पंजाब में विजयदशमी का पर्व नवरात्रि के नौ दिन का व्रत रखकर मनाते हैं।इस दिन पंजाब में आगंतुकों का स्वागत मिठाई और उपहारों से किया जाता है। बस्तर मडल में राम की रावचा पर विजय न मनाकर वहां के लोग इसे मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते हैं। बंगाल , आसोम, ओडिशा में यह पर्व दुर्गापूजा के ही रूप में मनाया जाता है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में विजयदशमी का पर्व नौ दिन तक चलता है। जिसमें तीन देवियां मां लक्ष्मी, सरस्वती और मां दुर्गा की विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। यहां पर मां दुर्गा पूजा के बड़ें – बड़े पंडाल सजाये जाते है। जिनमें भक्तों की भारी भीड उमड़ती है।
कर्नाटक में मैसूर का दशहरा भी पूरे भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। मैसूर स्थित महल की सुंदरता व सजावट की छटा देखते ही बनती है। इस दिन पूरे शहर व समस्त गलियों को रोशनी से सजाया जाता है। गुजरात मंे मिटटी से सुशोभित रंगीन घड़ा देवी का प्रतीक मानाजाता है ओर युवा लड़कियंा सिर पर रखकर लोकप्रिय नृत्य करती हैं जिसे गरबा कहा जाता है । गरबा नृत्य इस पर्व की शान है। महाराष्ट्र में भी नौ दिन मां दुर्गा को समर्पित रहते हैं। दसवें दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।
विजयदशमी का पर्व विजय का प्रतीक है। पूरे देश के अंतःकरण में विजय की आकांक्षा जगाने और उसे पूर्ण करने के लिए समाज की सुसंगठित शक्ति खड़ी करने तथा उसके लिए कटिबद्ध होकर खड़े होने का संदेश देने वाला यह दिवस है। अपने देश में आज भी आसुरी शक्तियां सक्रिय हैं जो देशविरोधी गतिविधियां चला रही हैं। इन सभी प्रकार की शक्तियों का विनाश करने के लिए प्रत्येक को अपने अंदर की बुद्धि, भावना एवं शक्ति को केंद्रित करना होगा ताकि अपने समाज और देश को सुखी ,वैभवशाली और विजयी जीवन प्राप्त हो सके। विजयदशमी के पर्व से विजय की अदम्य प्रेरणा उत्पन्न होती है।
मृत्युंजय दीक्षित

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