लेखक परिचय

जयराम 'विप्लव'

जयराम 'विप्लव'

स्वतंत्र उड़ने की चाह, परिवर्तन जीवन का सार, आत्मविश्वास से जीत.... पत्रकारिता पेशा नहीं धर्म है जिनका. यहाँ आने का मकसद केवल सच को कहना, सच चाहे कितना कड़वा क्यूँ न हो ? फिलवक्त, अध्ययन, लेखन और आन्दोलन का कार्य कर रहे हैं ......... http://www.janokti.com/

Posted On by &filed under राजनीति, साहित्‍य.


ncr5हिन्दी अकादमी में विवाद गहराने लगा है। वजह बनी है एक ऐसा शक्स, जिस पर आरोप लगायें जा रहे है कि वह गंभीर नहीं है बल्कि हास्यवादी है। जो अपने चिंता और चिंतन को माथे के सिकन की लकीरों में तबदील होने नहीं देता बल्कि अपनी चुटिली अंदाजों से पल में हवा कर देता है। जी हाँ हम बात कर रहे है डाॅ. अशोक चक्रधर जी की। जिनके हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष बनते ही गंभीर साहित्यकार इस कदर तनाव में आ गये है कि उनकी सारी सुझ-बूझ इस्तीफे में तबदील होने लगी है। जी हां यह हादसा या कहे भारी-भरकम भूचाल आया है महा गंभीर मैन ज्योतिष जोशी के साथ। दरअसल इस विवाद की सबसे बड़ी वजह बनी है वो हिन्दी साहित्य जिसे चंद दकियानुसी साहित्यकार अपनी मुट्ठी में रखना चाहते है। आज देश की विडम्बना कहे या हिन्दी जगत के चंद सूरमाकारों की करतूत जिन्होंने हिन्दी साहित्य को गंभीर बनाने के चक्कर में इतनी जटीलता ला दी है कि लोग अब हिन्दी से कटने लगे है। और हिन्दी की जगह लोग अंग्रेजी का सहारा लेने लगे है। आज देश में जितने हिन्दी नहीं पढ़े जाते उससे कही अधिक लोगों में अंग्रेजी और अंग्रेजी साहित्य के प्रति रूचिया बढ़ने लगी है। जो हमारी कलिष्ठ हिन्दी भाषा या साहित्य से काफी सरल दिखाई पड़ती है। साथ ही हिन्दी साहित्यकारों के भारी-भरकम सोच और तेवरों के कारण ही आज के नवीन और उभरते साहित्यकार को उस कदर सफलता नहीं मिल पाई है जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी। क्योंकि आज के युवा जिस प्रवेश में पल-बढ़ रहे है, जिसमें अंग्रेजी, हिन्गलीश, क्षेत्रिय आदि भाषाओं का दबाव रहता है कि वह भारी-भरकम शब्दों का चयन अपने लेखनी में नहीं कर पाते। या कही न कही आर्थिक तंगी और जीविकोपार्जन में इस कदर जुझते रहते है कि वह न तो गंभीर और मंहगी साहित्य खरीद पाते है और ना ही उसे पढ़ने के लिए वक्त निकाल पाते है। ऐसे में जब उनकी आत्मिक और बौद्धिक चिंतन की तरंगे निकलती है जिसे वो किताबों के पन्नों पर लिख अपना नाम साहित्य जगत में गढ़ना चाहते है तो क्या उनका हक नहीं बनता। अगर कोई साहित्यकार व कवि अपनी पंक्तियों में कलिष्ठ भाषाओं का प्रयोग किये बगैर सरल भाषाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाना चाहता है तो क्या उनका ये अधिकार नहीं बनता। मैं तो मानता हूं कि युग परिवर्तन के साथ ही साहित्य में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। जब देश और देशवासी ही पूर्ण हिन्दी भाषी नहीं रहे तो भला साहित्य को कलिष्ठ भाषी बनाये रखना कहा की समझदारी है। हम जैसे नवीन कवियों को इस बात की खुशी है कि अब हमारा भी पैरोकार करने वाला हिन्दी अकादमी के मंच पर जगमगाने वाला है। और आने वाले समय में कई नये साहित्यकार उभरकर सामने आयेंगे जिनकी सोच लिखे हुए किताबों के पन्नों पर इस कदर सरल भाषा में दिखाई पड़ेंगे, जिसे एक कार्यालय का चपरासी और अफसर दोनो आसानी से पढकर समझ पायंेगे। साहित्य को लेकर उनकी बीच की खाई को आसानी से पाट दिया जाएगा। इतना ही नहीं ऐसे भी लोग साहित्य से जुड़ने लगेंगे जो छोटे-छोटे शहरों और कसबों में रहते है। हिन्दी साहित्य जगत की एक और विडम्बना सुनी होगी कि भारत जैसे हिन्दी भाषी देश में हैरी पोर्टर की किताबें सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में शामिल की गई। चलियें देर ही सही लेकिन कृष्ण के रूप में अशोक चक्रधर अपना चक्र चलाकर भारी-भरकम बोझ से झुके हिन्दी साहित्य के मकड़जाल को कांटकर सरल साहित्य का रूप देने में कामयाब रहे तो कई सारे प्रांतीय स्तर के रचनाकारों का भाग्य उज्जवल जरूर हो जाएगा। लेकिन देखना होगा कि वे जिस भारी-भरकम साहित्यकारों के चक्रव्यूह में फंसे हुए है, उसे अपने चक्र से कांट भी पाते है या अभिमन्यू की तरह बीच में ही दम तोड़ देते है। इसलिए जरूरत है कि तमाम साहित्य में रूचि रखने वाले नौजवान और नये-नये उभरते साहित्यकार और कवि जो जिस भी छंद में लेखन करते है, जिन्हे लगता हो कि साहित्य को कलिष्ठ बनाने की जगह सरस और सरल होना चाहिए, जिससे जन-जन तक साहित्य का प्रचार प्रसार हो सके। और देश में फिर से हिन्दी की दशा सुधरने लगे। डाॅ. अशोक चक्रधर की हौशला अफजाई या कहे उनके इस प्रयास के बढ़ते कदम में ताकत डालने के लिए समर्थन का बिगुल फुंकना बेहद जरूरी है। क्योंकि नेतृत्व करता में तब तक जोश नहीं आता जब तक की जय हो का जयकारा न लगे।
 
:- नरेन्द्र निर्मल ( लेखक समाजिक कार्यकर्त्ता और कवि हैं )

Leave a Reply

5 Comments on "अशोक चक्रधर को लेकर हंगामा क्यों बरपा है ?"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Kavi Deepak Sharma
Guest
मेरी एक कविता इस सन्दर्भ मे … महज़ अलफाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता कोई पेशा ,कोई व्यवसाय नही है कविता । कविता शौक से भी लिखने का काम नहीं इतनी सस्ती भी नहीं , इतनी बेदाम नहीं । कविता इंसान के ह्रदय का उच्छ्वास है, मन की भीनी उमंग , मानवीय अहसास है । महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नही हैं कविता कोई पेशा , कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥ कभी भी कविता विषय की मोहताज़ नहीं नयन नीर है कविता, राग -साज़ भी नहीं । कभी कविता किसी अल्हड यौवन का नाज़ है कभी दुःख से भरी ह्रदय… Read more »
Jeet Bhargava
Guest

वामपंथी साहित्यकार हमेशा ही अकादमियों पर कब्जा जमाकर अपनी दुकानदारी चलाना चाहते हैं. ऐसे में निष्पक्ष छवि के चक्रधरजी के आने से अनेक साहित्यिक ठेकेदारों के पेट में मरोड़ आ गयी है.

ALBELA KHATRI
Guest
narendra nirmalji, hindi akaadmi ko ak aadmi dhang ka mil raha hai toh use sweekaar karne me baadhaa kya hai ? ashok chakradhar ko hindi akaadami ka upaadhyaksh banana na keval akaadmi balki samooche hindi jagat ke liye laabh ka sauda rahega aisaa mera dridh vishwas hai halanki na toh mera akaadmi se koi kaam padne wala hai aur na hi ashokji se meri koi mitrata hai, na toh maine kabhi unkaa charan- vandan kiya hai aur na hi ve apne kavi-sammelanon me mujhe bulaate hain is ke baavjood main ashok chakradhar ka isliye pakshdhar hoon ki ve samay ke… Read more »
Rakesh Singh
Guest
मैं आपके विचार से पूरी तरह सहमत हूँ | अशोक चक्रधर जैसे हिंदी साहित्य के मनीषी का विरोध दुर्भाग्यपूर्ण है | नए नए कवियों, लेखकों को उचित सम्मान मिलना ही चाहिए तभी हिंदी आगे बढेगी | इस क्रम मैं कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना होगा की गुणवत्ता और भाषा की अपनी पहचान बनी रहे | ऐसा ना हो की हिंदी मैं इतना अंग्रेजी घुसेड दिया जाये जिससे हिंदी मर ही जाए | आज कल ज्यादातर (हिंदी मैं ) जो लिखा जा रहा है वो अजीब सा है | ढेर सारे लोग अपने आप को साहित्यकार बोंल अपने मुह मियां… Read more »
Dinesh Kumar Mali
Guest

डा. अशोक चक्रधर का हिंदी साहित्य के लिए एक महत्तवपूर्ण योगदान है . कालांतर में भाषाओँ में स्वत: बदलाव आता है.और उस बदलाव को को सहर्ष दिल से स्वीकार करना चाहिए. इंडी के महा -पंडितों से यही ही अनुरोध है कि बेवजह किसी विवाद को जन्म न दे ,जो कि किसी के आपसी ईर्ष्या से पैदा हुआ हो .

wpDiscuz