लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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— डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

विश्व हिन्दू परिषद के मार्गदर्शक अशोक सिंहल जी का १७ नहम्वर २०१५ को दोपहर में दिल्ली के पास गुड़गाँव में देहान्त हो गया । कुछ दिन पहले ही देश भर में उनका जन्म दिन मनाया गया था । उन्होंने जीवन के ८९ वर्ष पूरे कर लिये थे और ९० में प्रवेश किया था । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्नातक अशोक जी प्रशिक्षण से धातु विज्ञानी थे । इलाहाबाद के सम्पन्न परिवार के अशोक जी ने कुछ वर्ष पहले करोड़ों की अपनी पैतृक सम्पत्ति दान कर एक न्यास बना दिया था । महर्षि वसिष्ठ के नाम से बनाये गये इस न्यास के नाम के आगे वसिष्ठ ऋषि की अर्धांगनि का नाम जोड़ कर इसका पूरा नाम अरुन्धति वसिष्ठ अनुसन्धान पीठ रखा । पीठ का मुख्य उद्देष्य दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर शोध कार्य करना है । जिस प्रकार महात्मा गान्धी मानते थे कि भारत का विकास हिन्द स्वराज के आधार पर ही हो सकता है , पश्चिमी अवधारणाओं पर किया गया विकास भारत को भारत ही नहीं रहने देगा , उसी प्रकार अशोक सिंहल जी मानते थे कि विकास की सही दिशा उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन ही हो सकता है । यही दर्शन भारतीय स्वभाव और प्रकृति के अनुकूल है । गान्धी का हिन्द स्वराज और उपाध्याय का मानव दर्शन मोटे तौर पर एक ही धरातल पर अवस्थित हैं ।
अशोक जी की धातु प्राद्यौगिकी से लेकर एकात्म मानव दर्शन तक पहुँच पाने की यात्रा बहुत लम्बी है । 1926 में उनकी यह जीवन यात्रा आगरा से शुरु हुई थी । यह परिवार आगरा का ही रहने वाला है । वही आगरा जिसने इतिहास के न जाने कितने उतार चढ़ाव अपने जीवन काल में देखे । इसी आगरा से निकले अशोक सिंहल ने स्वयं भी भारतीय इतिहास पर अपना एक स्थायी पद चिन्ह छोड़ दिया । अशोक जी के निकटवर्ती विजय कुमार के अनुसार नौवीं कक्षा में पढ़ते हुये उन्होंने स्वामी दयानन्द की जीवनी पढ़ ली थी । ज़ाहिर है इस जीवनी ने बाद में अशोक जी को कभी चैन से नहीं बैठने दिया । लेकिन सभी जानते हैं कि शुरुआत चाहे आगरा से हो या किसी और स्थान से , भारत को अपने भीतर आत्मसात करने का रास्ता प्रयागराज से होता हुआ काशी जी में जाकर ही रुकता है । 1942 में अशोक जी भी प्रयागराज इलाहाबाद में ही अध्ययन कर रहे थे । इलाहाबाद उबल रहा था । आनन्द भवन कांग्रेस की गतिविधियों का केन्द्र था । महात्मा गान्धी ने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया था । सत्याग्रह हो रहा था । उधर द्वितीय विश्व युद्ध की ज्वालाओं में यूरोप दग्ध हो रहा था । बाबा साहिब आम्बेडकर कौंसिल के सदस्य होकर भारत में से अस्पृश्यता उन्मूलन के रास्ते तलाश रहे थे । गान्धी जी गिरफ़्तार हो चुके थे । देश में निराशा का वातावरण छाने लगा था । अशोक सिंहल जी की उम्र उस समय सोलह साल की थी । वे संगम तट पर खड़े होकर , यह कल कल छल छल बहती -क्या कहती गंगाधारा , को समझने का प्रयास कर रहे थे । वे जानते थे , यह गंगाधारा ही अनन्त काल से भारत की आवाज़ है । वहीं उनकी भेंट प्रो० राजेन्द्र सिंह (जो बाद में रज्जु भैया के नाम से जाने गये) से हुई जिन्होंने गंगा की कल कल ध्वनियों की व्याख्या किशोर अशोक को समझाई । भारत माँ को विश्व गुरु के आसन पर स्थापित करने की ध्वनि । विदेशी दासता से मुक्त करवाने की गुहार । अशोक जी उसी उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गये थे । लेकिन संघ से सोलह वर्ष के उस किशोर के लिये जुड़ना उस समय भी इतना आसान नहीं था । प्रो० राजेन्द्र सिंह को बाक़ायदा परिवार में बुलाया गया और उनसे संघ की प्रार्थना सुनी गई । नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे । प्रार्थना सुन कर अशोक जी के माता जी की संतुष्टि हुई । यही देश की मुक्ति का रास्ता है । सिंहल जी ने शाखा जाना शुरु कर दिया । उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा । कभी घर की तरफ़ भी नहीं ।
प्रयागराज से ही अशोक जी काशी गये । महामना मालवीय जी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में धातु विज्ञान की पढ़ाई करने के लिये । यहीं उन्होंने मनुष्यों के भीतर भी ऐसी धातु निर्माण का मंत्र सीखा जिसके चलते कोई अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों में अर्पित कर देता है । सबसे पहले उन्होंने यह ताक़त अपने भीतर ही पैदा की । गंगा के चौरासी घाटों पर गंगा को निहारते हुये , काशी विश्वनाथ मंदिर के घंटानाद को सुनते हुये , महामना की प्रयोगस्थली में घूमते हुये , उन्होंने अपने भीतर को फ़ौलादी बना लिया । बी.ई की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर वे १९४८ में जेल चले गये । पंडित नेहरु ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । जेल से छूटने के बाद ही उन्होंने अपनी बी.ई की पढ़ाई पूरी कर डिग्री हासिल की । लेकिन इसके साथ साथ उन्हेंने संघ की पढ़ाई भी पूरी कर ली थी । यही कारण है कि इंजीनियर बनने के बाद वे वापिस घर नहीं गये बल्कि संघ के प्रचारक बन गये ।
लगभग आठ सौ साल की ग़ुलामी के कारण भारतीय इतिहास पुरुष के शरीर पर पड़ गये काले धब्बे अशोक जी की चिन्ता का कारण थे । यह चिन्ता तो देश में और अनेक चिन्तकों को भी है । लेकिन अशोक जी चिन्तन और यथार्थ के अन्तराल को कर्म से पाटने वाले वीरव्रती थे । यही कारण है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से धातु विज्ञान में पढ़ाई करने के वाद भी सांसारिक झमेलों से किनारा करते हुये वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गये थे । अशोक जी की यही चिन्ता उन्हें बार बार अयोध्या की ओर खींच कर ले जाती थी । विदेशी आक्रमणकारियों ने अयोध्या में राम स्मृति मंदिर को ध्वस्त कर उसके स्थान पर बाबर की स्मृति में एक ढाँचा खड़ा कर दिया था । भारत के लोगों को आशा थी कि जिस प्रकार यूरोपीय विदेशी शासकों के भारत से चले जाने के बाद सरकार ने उन शासकों के बुत और अन्य चिन्ह सार्वजनिक स्थानों से हटा दिये थे , उसी प्रकार मंगोल , तुर्क , अफ़ग़ान व अरब शासकों के चिन्ह भी हटा दिये जायेंगे । सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से उसकी शुरुआत भी की थी , लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वह कार्य वहीं स्थगित हो गया । सरदार पटेल के उसी कार्य को आगे बढ़ाने का प्रश्न था । अयोध्या में बने बाबरी ढाँचे को लेकर अशोक जी की चिन्ता भी यही थी । बहुत से लोग अज्ञानतावश यह मानते हैं कि वे मुसलमानों के विरोधी थे , इसलिये बाबरी ढाँचा हटाना चाहते थे । लेकिन इस का लेशमात्र भी सत्य नहीं है । मुझे अशोक जी का सान्निध्य पिछले लगभग पन्द्रह बीस सालों से मिलता रहा है । दरअसल वे तो आश्चर्य व्यक्त किया करते थे कि भारत के मुसलमानों का बाबर से क्या सम्बंध है ? ये मुसलमान तो अपने ही बन्धु हैं जो विदेशी इस्लामी सत्ता के दिनों में किन्हीं कारणों से मतान्तरित हो गये । इनका बाबर से क्या लेना देना है । अशोक जी का कहना था कि इन लोगों को कुछ निहित स्वार्थी तत्व अपने राजनैतिक नफ़ा नुक़सान से भड़काते रहते हैं । बाबर मध्य एशिया से आया विदेशी आक्रमणकारी था । जिसने भारत के इस खंड को जीत ही नहीं लिया था बल्कि यहाँ के लोगों पर अमानुषिक अत्याचार किये थे । धीरे धीरे देश में बाबर के वंशजों का राज्य फैलता गया । मतान्तरण उसी कालखण्ड के अत्याचारों का परिणाम है । लेकिन उस कालखंड में भी भारत के लोग निरन्तर संघर्षशील रहे । आज जिन भारतीयों ने इस्लाम मज़हब को अँगीकार कर लिया है, उन्हीं के पूर्वज इन विदेशी इस्लामी आक्रमणकारियों के अत्याचारों का सर्वाधिक शिकार हुये थे । भारत के मुसलमानों का न तो मध्य एशिया से और न ही बाबर से कोई ताल्लुक़ है , बल्कि इन के पूर्वज तो बाबर और उनके वंशजों के अत्याचारों का शिकार हुये । इसीलिये अयोध्या का प्रश्न राष्ट्रीय प्रश्न है , उसका मज़हब से कुछ लेना देना नहीं है । यह सभी भारतीयों के सम्मान का प्रश्न है , चाहे वे इस्लाम मज़हब को मानते हों , वैष्णव सम्प्रदाय के हों , या शैव मत के , जैन मताबलम्बी हों या बौद्ध पंथ के अनुरागी हों । सिक्ख पंथ के उपासक हों या नास्तिक ही क्यों न हों । क्योंकि राम सभी के यशस्वी पूर्वज थे । कभी अल्लामा इक़बाल ने सभी भारतीयों की तरफ़ से राम की महत्ता का ज़िक्र करते हुये लिखा था —
है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़
अहले नज़र समझते हैं उसको इमाम ए हिन्द
अशोक जी इसी राम के वुजूद की निशानियों को समेट रहे थे , जिनको नष्ट कर दिया गया था या करने के प्रयास हो रहे थे । एक वक़्त ऐसा भी आया जब राम के वुजूद की दूसरी निशानी राम सेतु को तोड़ने की लगभग सब तैयारियाँ पूरी कर ली गई थीं । यदि उस वक़्त अशोक जी के नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद सक्रिय न होती तो सचमुच राम सेतु का वुजूद समाप्त हो जाता । लेकिन इन सभी प्रयासों में मुस्लिम विरोध कहीं दूर दूर तक नहीं था । यही कारण था कि अशोक जी प्रयास कर रहे थे कि अयोध्या में वर्तमान राम मंदिर का विस्तार कर भव्य राम मंदिर सर्वानुमति से बने । संसद इसके लिये प्रस्ताव पारित करे । इसी हेतु वे समाज के सभी वर्गों से मिलते थे । देह शान्त हो जाने से पूर्व भी उन्होंने यही कहा कि अभी भव्य राम मंदिर का निर्माण करना है , ऐसा समाचार पत्रों में छपा भी था । अयोध्या में राम मंदिर तो अशोक जी ने बना दिया था । अब तो केवल उसका स्वरुप युगानुकूल भव्य बनाना है ।
लेकिन राम मंदिर आन्दोलन तो बहुत बाद की बात है । संघ की दृष्टि से उनका लम्बा कार्यकाल कानपुर का ही रहा । आपात् काल में देश पर लाद दी गई सांविधानिक तानाशाही के ख़िलाफ़ नानाजी देशमुख के नेतृत्व में देश भर में आन्दोलन चला तो उसमें अशोक जी भी अग्रणी पंक्तियों में थे । पुलिस ने उन्हें पकडने के भरसक प्रयास किये लेकिन भूमिगत हो गये अशोक जी की छाया को भी वे पकड़ नहीं पाये । अशोक जी से प्रेरणा लेकर न जाने कितनें युवकों ने जेल जाना स्वीकार कर लिया अपने व्यवसाय और कैरियर को ठोकर मार कर । आपात काल में देशवासियों द्वारा किये गये संघर्ष की भट्टी में से तप कर निकले अशोक जी दिल्ली में प्रान्त प्रचारक बन कर आये । उधर सांयं प्रचारक का दायित्व इन्द्रेश कुमार जी ने संभाला । इन दोनों की योजना से ही दिल्ली का ऐतिहासिक तीर्थस्थान झंडेवाला मंदिर किसी की निजी सम्पत्ति न रह कर सार्वजनिक न्यास के रुप में विकसित हो सका । १९८१ में अशोक जी ने विश्व हिन्दु परिषद की ज़िम्मेदारी सँभाली । उन जिनों विश्व हिन्दू परिषद सीमित क्षेत्रों में ही जाना जाता था । उसका कार्यक्षेत्र विस्तृत होते हुये भी , काम सीमित ही था । अशोक जी ने इसे व्यापक फलक प्रदान किया । कार्यों का विस्तार किया । मीनाक्षीपुरम में हुये मतान्तरण ने उन्हें कहीं भीतर तक हिला कर रख दिया । जाति के आधार पर सामाजिक स्थान और नियति का निर्धारण ! उन्होंने हिन्दू समाज के भीतर अस्पृश्यता विरोधी व ऊँच-नीच विरोधी आन्दोलन को और गतिशील बनाया । सामाजिक समरसता परिषद का नारा बन गया । बाबा साहेब आम्बेडकर आयु पर्यन्त इस कार्य में लगे रहे थे । उन्होंने अनेक स्थानों पर जाति की जड़ता की चट्टानों को हिला कर रख दिया था । लेकिन इन चट्टानों को तोड़ने का काम अभी बाक़ी था । अशोक सिंहल ने यही काम शुरु किया । मंगल काल में अनेक बन्धु अनेक कारणों से हिन्दू समाज को त्याग कर इस्लाम में दीक्षित हो गये थे । कालान्तर में वे उनकी सन्तानें राष्ट्र विरोधी धरातल पर जा खड़ी हुईं । मतान्तरण से राष्ट्रन्तरण होता है । लेकिन शिक्षा के प्रभाव के कारण ऐसे अनेक बन्धु ,ख़ास कर युवा पीढ़ी पुनः अपने घर वापिस आ जाना चाहती थी । विश्व हिन्दु परिषद ने परावर्तन आन्दोलन शुरु किया । यह एक प्रकार से स्वामी दयानन्द द्वारा चलाये गये शुद्धि आन्दोलन का ही विस्तार था । इसी परावर्तन से आगे जाकर धर्म जागरण का आन्दोलन फैला । धर्म जागरण ने गो रक्षा के प्रश्न को एक बार फिर केन्द्र बिन्दु में स्थापित कर दिया ।
सनातन भारत के भावात्मक प्रतीकों को सायास नष्ट करने के प्रयासों का अशोक सिंहल जी विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से विरोध कर रहे थे । वे मानते थे कि भौतिक उपादानों से राज्य का निर्माण होता है । राष्ट्र के निर्माण के लिये भावात्मक कारकों के प्रति लगाव एवं भक्ति ही इतिहास-सिद्ध मंत्र है ।
यह अशोक सिंहल जी की उर्जा ही थी जिसने विश्व हिन्दू परिषद को उसकी पहचान और दिशा दी । परिषद के संस्थापक महासचिव दादा साहिब आप्टे ने परिषद की जो कल्पना की थी , उससे भटका न जाये , इसी की पूर्ति हेतु अशोक जी ने कुछ वर्ष पूर्व हिन्दुस्थान समाचार संवाद समिति के साथ मिल कर ( समिति के संस्थापक भी आप्टे ही थे ) दादा साहिब आप्टे की जन्म शताब्दी मनाने का निर्णय किया और आप्टे जी की जीवनी लिखने का ज़िम्मा मुझे सौंपा था । उन जिनों मुझे अशोक जी से बार बार मिलने का मौक़ा मिलता था , इसलिये उनके अन्तस को जानने का अवसर भी । दरअसल मैं उन दिनों ही अशोक जी के व्यक्तित्व को मैं सही ढंग से पकड़ पाया ।
अशोक जी की हिन्दु व हिन्दुत्व की अवधारणा बहुत व्यापक थी । वे मानते थे कि यूरोपीय बुद्धिजीवियों ने या तो अपनी अज्ञानता के चलते या फिर साम्राज्यवादी षड्यंत्र के कारण हिन्दुत्व को भी सामी सम्प्रदायों के समकक्ष मान कर उसे संकीर्ण मज़हबी सीमाओं में समझने की भूल की । दुर्भाग्य से नई शिक्षा पद्धति से पढ़े लिखे लोग भी हिन्दुत्व को उन्हीं संकीर्ण सीमाओं में देखने लगे । अशोक जी हिन्दुत्व को जीवन शैली के तौर पर देखते थे । इसे सुखद संयोग ही कहना चाहिये कि उच्चतम न्यायालय ने भी अपने एक निर्णय में हिन्दुत्व को जीवन शैली की ही संज्ञा दी । शायद यही कारण था कि वे ब्रिटिश शिक्षा पद्धति के स्थान पर भारतीय शिक्षा पद्धति के पक्षधर थे । इस स्थल पर अशोक जी महामना मदन मोहन मालवीय के अनन्य प्रशंसकों में से थे । ये मालवीय जी ही थे जिन्होंने अंग्रेज़ काल में भी सीमित स्पेस उपलब्ध होने के बावजूद शिक्षा पद्धति को भारतीयता का पुट देने का प्रयोग किया । अशोक जी उसी प्रयोग को आज भी आगे बढ़ाने के पक्षधर थे ।
अशोक जी विज्ञान के छात्र थे । लेकिन उनकी रुचियों का क्षेत्र विस्तृत था । शास्त्रीय संगीत उनकी कमज़ोरी था । शास्त्रीय गायन में सिद्ध हस्त थे । बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में गाये जाने वाले अनेक गीतों की लय उन्होंने ही बनाई थी । विदेशी आक्रमणों के कारण भारतीय विज्ञान में होने वाले विकास और शोध की भंग हो चुकी परम्परा को वे पुनः स्थापित करने के पक्षधर थे । वेद-विज्ञान विषय विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाना चाहिये और उनमें स्थापित मान्यताओं को आधुनिक उपकरणों से प्रयोगशालाओं में प्रमाणित भी किया जाना चाहिये । विश्व हिन्दू परिषद में ही कार्य कर रहे एक अन्य प्रचारक विजय कुमार का कहना है कि वेदों में अशोक जी की रुचि अपने कानपुर के कार्यकाल में पैदा हुई । वहाँ उनका सम्पर्क रामचन्द्र तिवारी नाम के विद्वान से हुआ , जिन्होंने उन्हें वेदों की ओर आकर्षित किया । वेदों में उनकी यह रुचि जीवन भर बनी रही । यह संयोग ही कहा जायेगा कि विश्व हिन्दू परिषद के संस्थापक महासचिव दादा साहेब आप्टे विदेशों में स्थान स्थान पर वेद भगवान की स्थापना कर आये थे और उनके उत्तराधिकारी अशोक सिंहल जी अब वेद को विश्व के विज्ञान पटल पर स्थापित करने का उद्यम कर रहे थे ।
पिछले कुछ अरसे से उनके शरीर ने अपनी सीमा के संकेत देने शुरु कर दिये थे । चिन्तन और कर्म की गति का यही विरोधाभास हे । कर्म की गति शरीर पर निर्भर है और शरीर की क्षमता और उमर , दोनों सीमित हैं । चिन्तन तो कालातीत है परन्तु शरीर तो काल के पाये से बन्धा हुआ है । काल के पाये से बन्धा यह शरीर ही अब धीरे धीरे उनका साथ नहीं दे रहा था । शरीर के इन संकेतों को उनसे ज़्यादा और कौन समझ सकता था ? वे ऋषि परम्परा के सिद्ध पुरुष थे । संघर्षों की ज्वाला में साधना करते सन्यासी योद्धा थे । कुछ मास पहले की बात है । उनका फ़ोन आया । उन्होंने दिल्ली बुलाया था । मैं वहाँ गया और मिला तो अरुन्धति वसिष्ठ अनुसन्धान पीठ की चर्चा शुरु कर दी । प्रो० मुरली मनोहर जोशी पीठ के मार्गदर्शक हैं । सुब्रह्मन्यन स्वामी उसके अध्यक्ष हैं , इत्यादि बताते रहे । मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे सब क्यों बता रहे हैं । फिर बोले , मैं चाहता हूँ आप इस पीठ के महासचिव का कार्यभार संभालें । मैं चुप हो गया और वे भी । कुछ देर बाद शायद अपने आप से ही बोल रहे हों , भारत का रास्ता इसी एकात्म मानव दर्शन से निकलेगा और कोई रास्ता नहीं है । मैंने उनके चरण स्पर्श किये और उनके स्वप्न को धारण किया । मेरे लिये यही अशोक जी का प्रसाद था ।

उस वीरव्रती ने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत माता के चरणों में खपा दिया । स्वयं के लिये किसी पद की कामना नहीं की । आपात्काल में जेल में हम जयप्रकाश नारायण की जेल में समगल की गई एक कविता पढ़ा करते थे , जिसमें जयप्रकाश नारायण ने लिखा था कि यदि मैं चाहता तो कितना ही बड़ा पद प्राप्त कर सकता था । पद मेरे पास चल कर आये । लेकिन मेरा उद्देष्य पद प्राप्त करना नहीं था । यही भाव अशोक सिंहल जी का था । पद प्राप्त करना उनके जीवन मार्ग का हिस्सा ही नहीं था । इस प्रकार की एषनाओं से वे कहीं उपर थे । वे समस्त मानव जाति की मंगल कामना के लिये भारतीय दर्शन के विविध प्रयोग कर रहे थे । यही उनका रास्ता था । यही मानव मंगल का रास्ता है । सुरुचि प्रकाशन में कार्य कर रहे विजय कुमार ने लिखा, जिनके लिये सारा देश शोक में डूबा है वे स्वयं अ-शोक थे ।

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