लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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-राकेश कुमार आर्य-  congress
कांग्रेस का कर्णधार (पीएम पद का प्रत्याशी) आगामी चुनावों में कौन होगा? इस पर पार्टी मोदी के सामने अपने युवराज को लाने से बचने का बहाना बना रही है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस में पीएम पद का प्रत्याशी घोषित करना उसकी परंपरा नहीं रही है। बात तो सही है। जिस पार्टी में एक परिवार की तूती बोलती हो और जिसके विषय में ये माना जाता हो कि उसके किसी भी व्यक्ति के रहते अन्य कोई व्यक्ति पार्टी का पीएम पद का प्रत्याशी नहीं हो सकता है, वहां ये बात निश्चित मान लेनी चाहिए कि पार्टी का पीएम पद का प्रत्याशी कौन है? चुनाव के पश्चात कांग्रेस में सारी भेड़ों का मुंडन होता है। सारी जमीरों को पहली ही बैठक में सब नीलाम कर देते हैं और उस परिवार के मुखिया को देश का मुखिया बना देते हैं। इस ‘भेड़ मुंडन’ और ‘जमीरों की नीलामी’ की प्रक्रिया को ही कांग्रेस में पार्टी का ‘आंतरिक लोकतंत्र’ कहा जाता है।
पंडित नेहरू जब तक रहे तब तक उन्होंने कांग्रेस के इसी आंतरिक लोकतंत्र का नाटक किया और अपने नाम पर सर्वसम्मति बनाये रहे। इसके पश्चात इंदिरा गांधी ने नेहरू जी से भी चार कदम आगे जाकर इसी ‘आंतरिक लोकतंत्र’ का गला घोंटा। उनके पश्चात राजीव गांधी आये। वह भी पार्टी में अपनी सर्वोच्चता बनाये रहे। नेहरू-गांधी परिवार को जब अपने हाथ से सत्ता खिसकती दीखी तो उसकी बेचैनी अप्रत्याशित रूप से बढ़ी। अत: शास्त्री जी को इंदिरा गांधी नहीं पचा पायीं तो पीवी नरसिंहराव को और कांग्रेस मुखिया के रूप में सीताराम केसरी को सोनिया गांधी नहीं पचा पायीं। जिन लोगों ने कांग्रेस में ‘आंतरिक लोकतंत्र’ को वास्तविक अर्थों में स्थापित करने की कोशिश की, वही लोग या तो कांग्रेस से बाहर कर दिये गये या वे अप्रत्याशित रूप से जल्दी ही हमारे बीच से चले गये। स्वामी श्रद्धानंद से लेकर राजेश पायलट और माधवराव सिंधिया तक ऐसे कई नेताओं को हमने कांग्रेस छोड़ते या दुनिया छोड़ते देखा है। पीवी नरसिंह राव के साथ लोकतंत्र की पुजारिन कांग्रेस ने उनके अंतिम संस्कार तक पर भी क्या किया, यह किसी से छिपा नहीं है। इसी प्रकार शास्त्री जी की उपेक्षा उनके मरणोपरांत भी होती रही है।
कांग्रेस ने नेता बनाने का उद्योग बंद कर लिया तो आज ‘उसकी कंपनी’ बीमार घोषित होने के कगार पर है। जो स्वयं अपना नेता नहीं हैं, उन्हें पार्टी का और देश का नेता बनाया जा रहा है। राहुल अभी स्वयं नौसिखिये हैं, परंतु कांग्रेसियों की मजबूरी है कि उनके पीछे खड़ा होना पड़ रहा है। जब किसी पार्टी या संगठन में कमीशनखोर या स्वार्थी लोग इकट्ठे हो जाते हैं और नेता को जनता से काट दिया जाता है तो कांग्रेस जैसी ही स्थिति हर संगठन में उत्पन्न हो जाया करती है। जहां तक डॉ. मनमोहन सिंह की बात है तो वे कभी भी नेता नहीं रहे हैं, आज भी नहीं हैं। वह ‘मुंडी मुंडाई भेड़’ हैं और उन्होंने स्वयं को इसी रूप में सोनिया गांधी के समक्ष पेश किया है, उन्होंने अपनी पूंछ हिलाने के लिए बढ़ा ली और मूंछ (पौरूष समाप्त करने के लिए) कटा लीं। बस यही उनकी सबसे बड़ी योग्यता है और पार्टी के ‘आंतरिक लोकतंत्र’ की इसी पात्रता पर खरे उतरने के कारण ही वह देश के अनचाहे नेता बने हुए हैं। कांग्रेस के पास सचमुच नेतृत्व का संकट है।
अभी तक हुए 14 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पहली बार 1977 में सत्ता से बाहर हुई तो उसे 154 सीटें मिली थीं और वह चुनाव हार गयी थी। उसके बाद नरसिंहाराव के समय में 1996 में पार्टी को 140 सीटें मिलीं, 1998 में चुनाव हुए तो पार्टी को केवल एक सीट का लाभ मिला और वह 140 से 141 तक आ गयी। अगले ही वर्ष फिर चुनाव हुए तो पार्टी अभी तक के सर्वाधिक निराशाजनक प्रदर्शन पर पहुंच गयी और उसकी सीटें 141 से घटकर 114 हो गयीं। पिछले दस वर्ष से कांग्रेस सत्ता में है अवश्य, पर वह ‘जुगाड़ के बहुमत’ से सत्ता चला रही है जनता का विश्वास उसमें पहले दिन से ही नही रहा है। फिर भी वह जादुई जुगाड़ भरे लोकतंत्र के नाम पर देश का मूर्ख बना रही है और हम अपना मूर्ख बनने दे रहे हैं क्योंकि ‘जादुई जुगाड़’ को तोडऩे का कोई विकल्प या उपाय हमें नही सूझ रहा है।
अब मोदी मैदान में हैं तो कांग्रेस अपने ‘मेमने’ को बचा रही है। मेनका गांधी ने इस स्थिति पर व्यंग्य करते हुए चुटकी ली है कि मोदी शेर हैं तो राहुल गांधी चिडिय़ा हैं। अपनी इसी स्थिति को भांपते हुए ‘चिडिय़ा’ मैदान से भाग रही है, वह उडऩा चाहती है पर मजबूरी है उड़ तो सकती नही, पर ‘बचा बची’ का खेल तो खेल ही सकती है। संभवत: ‘चिडिय़ा’ की यह मन:स्थिति ही कांग्रेस को (जैसा कि आडवाणी ने कहा है) इस बार दो अंकों की सीट संख्या तक लाने जा रही है।
राहुल गांधी के लिए जानकारों का मानना है कि उनके भाषणों के कम से कम दस ड्राफ्ट तैयार होते हैं और वह उनमें अंतिम क्षणों तक परिवर्तन करते रहते हैं। वह अंतद्र्वन्द्व से ग्रस्त दीखते हैं और जोश दिखाते दिखाते असंतुलित हो बैठते हैं। इसलिए कभी अपने ही चुनावी घोषणा पत्र को सपा का घोषणा पत्र कहकर फाड़ डालते हैं तो कभी बांहों पर कुर्ता को यों समेटने लगते हैं कि जैसे किसी से कुश्ती करने जा रहे हैं। लोग उनकी इस भाव भंगिमा पर हंसते हैं। वह इतिहास की पुस्तकों को पढऩे के शौकीन हैं, परंतु शायद अपनी ही दादी स्व. इंदिरा गांधी को उन्होंने पढऩे से छोड़ दिया है, अन्यथा वह उन्हें ही पढ़ लेते थे तो जोशीला भाषण देने की ‘हास्यास्पद कला’ के प्रदर्शन से बच सकते थे।
कांग्रेस एक बार फिर वंशवाद के मकडज़ाल में फंसती जा रही है। कांग्रेस कार्य समिति की पिछले बृहस्पतिवार को संपन्न हुई बैठक में राहुल को चुनाव की बागडोर सौंप दी गयी है। जिससे लोकसभा के चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशी के नाम पर उनकी स्वीकृति की मुहर लगाना आवश्यक होगा। इसका अभिप्राय होगा कि किस

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