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विधानसभा चुनाव परिणाम : हिन्दुओं के लिये निराशाजनक चित्र तथा भाजपा के लिये सबक…(विस्तारित विश्लेषण)……


सुरेश चिपलूनकर

पश्चिम बंगाल :- ममता बनर्जी की आँधी में वामपक्ष उड़ गया, धुल गया, साफ़ हो गया… यह देश के साथ-साथ हिन्दुत्व के लिये क्षीण सी खुशखबरी कही जा सकती है। “क्षीण सी” इसलिये कहा, क्योंकि ममता बैनर्जी भी पूरी तरह से माओवादियों एवं इस्लामिक ताकतों (बांग्लादेशी शरणार्थियों) के समर्थन से ही मुख्यमंत्री बनी हैं… अतः पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं की दुर्दशा वैसी ही जारी रहेगी, जैसी अब तक होती आई है। (नतीजा : वामपंथ 5 साल के लिये बाहर = +1)

असम :- इस राज्य में कांग्रेस से अधिक निराश किया है भाजपा ने… दस साल के गोगोई शासन, मूल असमियों पर बांग्लादेशी गुण्डों द्वारा अत्याचार, कांग्रेसियों द्वारा खुलेआम बदरुद्दीन अजमल का समर्थन करने और अपना मुस्लिम वोट बैंक पक्का बनाये रखने का फ़ायदा कांग्रेस को मिला…। भाजपा यहाँ भी फ़िसड्डी साबित हुई। असम में धीरे-धीरे अल्पसंख्यक बनने की ओर अग्रसर हिन्दुओं के लिये अब उम्मीद कम ही बची है। (नतीजा : राजमाता के दरबार में दिग्गी राजा के कद में बढ़ोतरी और असम में हिन्दुओं की लतखोरी में बढ़ोतरी = (-) 1)

तमिलनाडु :- भाजपा तो कभी यहाँ थी ही नहीं, अब भी कोई प्रगति नहीं की। जयललिता की जीत से करुणानिधि कुनबा बाहर हुआ है, लेकिन अब जयललिता और शशिकला मिलकर तमिलनाडु को लूटेंगे…। चर्च की सत्ता वैसे ही बरकरार रहेगी, क्योंकि “सेकुलरिज़्म” के मामले में जयललिता का रिकॉर्ड भी उतना ही बदतर है, जितना करुणानिधि का। (नतीजा : कांग्रेस यहाँ एकदम गर्त में चली गई है… (+1)]

केरल :- नतीजे लगभग टाई ही रहे और जो भी सरकार बनेगी अस्थिर होने की सम्भावना है। कांग्रेस की सरकार बनी तो मुस्लिम लीग और PFI का आतंक मजबूत होगा। भाजपा को 2-3 सीटों की उम्मीद थी, लेकिन वह धूल में मिल गई…।

सकारात्मक पक्ष देखें तो – (अ) बंगाल से वामपंथी साफ़ हुए, जबकि केरल में भी झटका खाये हैं… (ब) तमिलनाडु से कांग्रेस पूरी तरह खत्म हो गई है…

समूचे परिदृश्य को समग्र रूप में देखें तो – (अ) दक्षिण और बंगाल में “हिन्दुत्व” की विचारधारा में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, (ब) भाजपा का प्रदर्शन बेहद निराश करने वाला रहा है…, (स) इन राज्यों में हि्न्दुओं की दुर्दशा में और वृद्धि होगी…। कुल मिलाकर निराशाजनक चित्र उभरा है। भाजपा निराश करती है, और कोई विकल्प है नहीं, जात-पाँत में बँटे हुए लतखोर हिन्दुओं ने शायद “नियति” को स्वीकार कर लिया है…।

एक नमूना पेश है, गौर कीजियेगा –

1) केरल की 140 सीटों में से 36 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार जीते हैं। (मुस्लिम लीग-20, सीपीएम-8, कांग्रेस-7 और RSP-1)

2) केरल में 20% ईसाई हैं, 25% मुस्लिम हैं और 30% कमीनिस्ट (यानी अ-हिन्दू सेकुलर)… यह 75% लोग मिलकर भाजपा को इतनी आसानी से जगह बनाने नहीं देंगे।

3) केरल कांग्रेस (जैकब गुट) नाम की “ईसाई सेकुलर” पार्टी ने 10 सीटें जीतीं, “सुपर-सेकुलर मुस्लिम लीग” ने 20 सीटें जीतीं, “हिन्दू सेकुलरों” ने वामपंथियों और कांग्रेस को विभाजित होकर वोट दिये… नतीजा – दोनों ही प्रमुख दलों को बहुमत नहीं मिला। अब अगले पाँच साल तक केरल कांग्रेस (ईसाई) और मुस्लिम लीग दोनों मिलकर अपना “एजेण्डा” चलाएंगे और कांग्रेस को जमकर चूसेंगे (कांग्रेस को इसमें कोई आपत्ति भी नहीं है)। मंत्रिमण्डल बनने में अभी समय है, लेकिन मुस्लिम लीग और जैकब कांग्रेस ने शिक्षा, राजस्व, उद्योग और गृह मंत्रालय पर अपना दावा ठोंक दिया है… (आगे-आगे देखिये होता है क्या…)

4) मुस्लिम बहुल इलाकों से मुस्लिम जीता, ईसाई बहुल इलाकों से ईसाई उम्मीदवार जीता… हिन्दू बहुल इलाके से, या तो वामपंथी जीता या बाकी दोनों में से एक… (मूर्ख हिन्दुओं के लिये तथा धोबी का कुत्ता उर्फ़ “सेकुलर भाजपा” के लिये भी एक सबक)…

सकारात्मक पक्ष :- पिछले 5 साल में संघ कार्यकर्ताओं की ज़मीनी मेहनत का नतीजा यह रहा है कि केरल में पहली बार भाजपा का वोट प्रतिशत 6% तक पहुँचा, 19 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपाईयों को 10,000 से 15,000 वोट मिले, और तीन विधानसभा सीटों पर भाजपा दूसरे नम्बर पर रही। लेकिन यहाँ भी एक पेंच है – ईसाई और मुस्लिम वोटरों ने योजनाबद्ध तरीके से वोटिंग करके यह सुनिश्चित किया कि भाजपा का उम्मीदवार न जीते… कांग्रेस या वामपंथी में से जो मजबूत दिखा उसे जिताया… (मूर्ख हिन्दुओं के लिये एक और सबक) (यदि सीखना चाहें तो…)

असम में भाजपा की सीटें 10 से घटकर 4 हो गईं, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कोई उपस्थिति दर्ज नहीं हुई…। हालांकि मेरी कोई औकात नहीं है फ़िर भी, भाजपा की इस वर्तमान दुर्दशा के बाद चन्द सुझाव इस प्रकार हैं -

1) भाजपा को सबसे पहला सबक ममता बनर्जी से सीखना चाहिये, विगत 20 साल में उस अकेली औरत ने वामपंथियों के खिलाफ़ लगातार सड़कों पर संघर्ष किया है, पुलिस से लड़ी, प्रशासन के नाकों चने चबवाए, हड़तालें की, बन्द आयोजित किये, हिंसाप्रेमी वामपंथियों को जरुरत पड़ने पर “उन्हीं की भाषा” में जवाब भी दिया। भाजपा “संकोच” छोड़े और कांग्रेसियों से “अन्दरूनी मधुर सम्बन्ध” खत्म करके संघर्ष का रास्ता अपनाये। हिन्दुओं, हिन्दू धर्म, मन्दिरों के अधिग्रहण, गौ-रक्षा, नकली सेकुलरिज़्म जैसे मुद्दों पर जब तक सीधी और आरपार की लड़ाई नहीं लड़ेंगे, तब तक भाजपा के ग्राफ़ में गिरावट आती ही जायेगी… वरना जल्दी ही एक समय आयेगा कि कोई “तीसरी पार्टी” इस “क्षुब्ध वोट बैंक” पर कब्जा कर लेगी। मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता चाहे जैसी भी हों, लेकिन भाजपा नेताओं को इन तीनों का कम से कम एक गुण तो अवश्य अपनाना ही चाहिये… वह है “लगातार संघर्ष और हार न मानने की प्रवृत्ति”।

2) ज़मीनी और संघर्षवान नेताओं को पार्टी में प्रमुख पद देना होगा, चाहे इसके लिये उनका कितना भी तुष्टिकरण करना पड़े… कल्याण सिंह, उमा भारती, वरुण गांधी जैसे मैदानी नेताओं के बिना उत्तरप्रदेश के चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने की बात भूल ही जाएं…

3) तमिलनाडु और केरल में मिशनरी धर्मान्तरण और बंगाल व असम में जेहादी मनोवृत्ति और बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर गुवाहाटी-कोलकाता से लेकर दिल्ली तक “तीव्र जमीनी संघर्ष” होना चाहिये…

4) जो उम्मीदवार अभी चुनाव हार गये हैं, वे अगले पाँच साल लगातार अपने विधानसभा क्षेत्र में बने रहें, सड़कों पर, खबरों में दिखाई दें, जनता से जीवंत सम्पर्क रखें। जो उम्मीदवार बहुत ही कम अन्तर से हारे हैं, वे एक बार फ़िर से अपने पूरे विधानसभा क्षेत्र का “पैदल” दौरा करें और “हिन्दुओं” को समझाएं कि अब अगले पाँच साल में उनके साथ क्या होने वाला है।

5) सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि भाजपा को “सेकुलर” दिखने की “भौण्डी कोशिश” छोड़ देना चाहिये। मीडिया के दुष्प्रचार की रत्ती भर भी परवाह किये बिना पूरी तरह से “हिन्दू हित” के लिये समर्पण दर्शाना चाहिये, क्योंकि भड़ैती मीडिया के सामने चाहे भाजपा “शीर्षासन” भी कर ले, तब भी वे उसे “हिन्दू पार्टी” कहकर बदनाम करते ही रहेंगे। यह तो भाजपा को तय करना है कि “बद अच्छा, बदनाम बुरा” वाली कहावत सही है या नहीं। इसी प्रकार यही “शीर्षासन” मुस्लिमों एवं ईसाईयों के सामने नग्न होकर भी किया जाए, तब भी वे भाजपा को “थोक में” वोट देने वाले नहीं हैं, तब क्यों अपनी ऊर्जा उधर बरबाद करना? इसकी बजाय, इस ऊर्जा का उपयोग “सेकुलर हिन्दुओं” को समझाइश देने में किया जाये।

दिक्कत यह है कि सत्ता में आने के बाद जो “कीटाणु” अमूमन घुस जाते हैं वह भाजपा में कुछ ज्यादा ही बड़े पैमाने पर घुस गये हैं। राम जन्मभूमि आंदोलन के वक्त की भाजपा का जमीनी और सड़क का संघर्ष, उसके कार्यकर्ताओं की तड़प और आज देश की भीषण परिस्थितियों में भाजपाईयों का “अखबारी और ड्राइंगरूमी संघर्ष” देखकर लगता ही नहीं, कि क्या यह वही पार्टी है? क्या यह वही पार्टी और उसी पार्टी के नेता हैं जिन्हें 1989 में जब मीडिया “हिन्दूवादी नेता” कहता था, तो नेताओं और कार्यकर्ताओं सभी का सीना चौड़ा होता था, जबकि आज 20 साल बाद वही मीडिया भाजपा के किसी नेता को “हिन्दूवादी” कहता है, तो वह नेता इधर-उधर मुँह छिपाने लगता है, उल्टे-सीधे तर्क देकर खुद को “सेकुलर” साबित करने की कोशिश करने लगता है…। यह “संकोचग्रस्त गिरावट” ही भाजपा के “धोबी का कुत्ता” बनने का असली कारण है। समझना और अमल में लाना चाहते हों तो अभी भी समय है, वरना 2012 में महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश में, जहाँ अभी पार्टी “गर्त” में है, वहीं टिकी रहेगी… जरा भी ऊपर नहीं उठेगी।

रही हिन्दुओं की बात… तो पिछले 60 साल में वामपंथियों और सेकुलरों ने इन्हें ऐसा “इतिहास और पुस्तकें” पढ़ाई हैं कि “भारतीय संस्कृति पर गौरव” करना क्या होता है यह एकदम भूल चुके हैं। सेकुलरिज़्म(?) के गुणगान और “एक परिवार की गुलामी” में मूर्ख हिन्दू ऐसे “मस्त और पस्त” हुए पड़े हैं कि इन्हें यह भी नहीं पता कि उनके चारों ओर कैसे “खतरनाक जाल” बुना जा रहा है…

May 14th, 2011 | 209 views | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post
Category: राजनीति | Tags: Congress, कांग्रेस, भाजपा, वामपंथ, विधानसभा चुनाव
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  • प्रो. मधुसूदन
    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    अनुरोध कहे या बिनती:
    डॉ. मीणा का लेख “हिन्दू क्यों नहीं चाहते…….” —जिसकी प्रवक्ता की कडी है।
    http://www.pravakta.com/story/12527
    पढे। कुछ विशेष दृष्टि कोण से लिखा गया है, ऐसा मानता हूं।
    सहमत होनेकी आवश्यकता नहीं।

    May 18 2011
    CommentsLikeUnlike
    • शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
      shastr nityagopal katare

      अब बिना समय गवांए भाजपा को अपना नेता धीर गंभीर और सच्चरित्र नरेन्द्र मोदी को घोषित कर देना चाहिये। वही इस देश को पटरी पर ला सकते हैं।

      May 17 2011
      CommentsLikeUnlike
      • ajit bhosle

        भाजपा के शीर्ष नेता अपना लक्ष्य भूल चुके हैं, ऊपर से शुतुरमुर्गी सोच के सेकुलर लोग जो लगातार मीडिया में बने रहते हैं वे भी इन मूर्ख भाजपाइयों को यही एहसास दिला रहे हैं की सेकुलर बनने में ही उनका भविष्य है जबकि सच्चाई एकदम उलट है और जो अब सामने भी आने लगी है, अभी नही चेते तो ये भाजपाई इतिहास बन जायेंगे चाहे कितने नुक्सान झेलने पड़े इनको नरेन्द्र मोदी का अनुसरण करना ही होगा और करना भी चाहिए तभी इनका आस्तित्व बचेगा और हिन्दुस्तान भी. और आपकी लिखी एक एक बात से सहमत.

        May 16 2011
        CommentsLikeUnlike
        • श्रीराम तिवारी
          shriramt tiwari

          वाम की पराजय पर आपने घी के दिए तो जरुर जलाये होंगे?वाम तो आपकी आँखों की किरकिरी “था सो अब आपके लिए मैदान साफ् है.केवल त्रिपुरा में ही तो शेष बचा है वाम पंथ बाकि तो “आंधी में उड़ गया.धुल गया,साफ हो गया”अब उम्मीद है की हिदुत्व के झंडावरदार अपने अश्वमेध का घोडा सरपट दौड़ा सकेंगे..आलेख में भाजपा की हार के बहाने हिंदुत्व के पराभव की घोषणा नितांत शर्मनाक और अविवेकपूर्ण है.वाम मोर्चे को धकिया कर बंगाल में गुंडावाहिनी ने ममता नामक नौटंकीबाज़ “लेडी डान” को सत्ता में बिठाकर कितना पवित्र कार्य किया है ?keral में क्या yh sach nahin है की janta ने nahin khud वाम ने वाम को harwaya है.aap se उम्मीद thee की vaastvikta का bhanda fodte.lekin aap तो yahaan भी हिंदुत्व का rona lekar baith gaye.

          May 16 2011
          CommentsLikeUnlike
          • अखिल कुमार (शोधार्थी)
            akhil

            बड़े ही बेकार और एकतरफा ढंग से आपने हिन्दुओं को इस बात के लिए मूर्खता की उपाधि से विभूषित कर दिया की उसने “भाजपा” को नही जिताया, हिन्दू क्या भाजपा के गुलाम हैं क्या?

            और भी आपका एकतरफा विश्लेषण की भाजपा की सरकार नही आने से हिन्दू दुर्दशा जारी रहेगी वाले मनगढ़ंत पूर्वाग्रह में दिखा? अगर हिन्दू बहुल इलाकों से हिन्दू न जीत के कोई और धर्म का या पंथनिरपेक्ष व्यक्ति जीत गया तो आप रो क्यों रहे हैं? यह तो राजनीति में ही न होता है, यह कोई धर्मनीति का दंगल तो था नहीं…… और अमेरिका में अगर कोई भारतीय मूल का गोवेर्नोर चुना जाय तब तो आपको अच्छा लगेगा न?

            भाजपाइयों के दृष्टि की यही सीमा है की वो ”राजनीति” की बातें न करके ”धर्मनीति” के एजेंडे से ही देश को कब्जाना चाहते हैं…..

            खैर उनकी भी क्या गलती उनके पास कोई पोलिटिकल एजेंडा हो तब न ऐसा करें, इस मामले में बड़े गरीब हैं ये भाजपाई…..पेट्रोल की कीमतें ५ रूपये/ लीटर बढ़ी इसे एजेंडा बना के क्यों नही उतारते सड़क पर? खाली हिन्दू-हिन्दू चिल्लाने से आम जनता का कोई भला नही होगा और जब तक आम जनता नही जुड़ेगी…..सत्ता केवल बन्दूक की गोली से मिल सकती है…..

            May 15 2011
            CommentsLikeUnlike
            • अहतशाम "अकेला"

              “भगवा-भगवा पुकारूँ में बन में”
              लेखक की पीड़ा का अंदाज़ा भलीभाँती लगाया जा सकता है
              लेकिन कुछ भी लेख दमदार लिखा-
              मगर अफ़सोस भाजपा को जिस प्रकार दिल्ली की जनता से जूते मरकर भगाया उससे लगता है की भाजपा को अपना दोगला रवैय्या छोड़ना होगा और रही बात यूं पी में बीजेपी की तो उसका सपना देखना तो अब भाजपा को बंद कर देना चाहिए

              May 15 2011
              CommentsLikeUnlike
              • दिवस दिनेश गौड़
                Er. Diwas Dinesh Gaur

                सुरेश चिप्लिनकर जी की बात से असहमत होने का सवाल ही नहीं होता…सही कहा है आपने…भाजपा को अपना मूल परिचय नहीं बदलना चाहिए…जिस उद्देश्य के लिए यह पार्टी बनाई गई थी उस पर टिके रहना चाहिए…
                मुझे लगता है कि श्रीमान लाल कृष्ण आडवानी अपने व्यक्तिगत क्षुद्र स्वार्थों के लिए भाजपा का दुरूपयोग कर रहे हैं…इससे अच्छा तो उन्हें राजनीति से त्याग ले लेना चाहिए व नरेन्द्र भाई मोदी जैसे योग्य व्यक्ति को अवसर देना चाहिए जो न केवल भाजपा अपितु समस्त भारत देश का कल्याण करने में सक्षम हैं…

                May 15 2011
                CommentsLikeUnlike
                • प्रो. मधुसूदन
                  डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

                  सही कहा सुरेशजी ==”सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि, भाजपा को “सेकुलर” दिखने की “भौण्डी कोशिश” छोड़ देना चाहिये।”==

                  भाजपा को अपनी जगह बनानी होगी, अपनी हिंदुत्व वादी विशेषता का आश्रय लेकर। बाजार का नियम है, कि (१) “आवश्यकता की पूर्ति करो”- Fill the vacuum and succeed (२) अपनी आयडेंटीटी ना बदलो। (३) सही कहा, सुरेशजी ने कि भाजपा शिर्षासन भी कर ले, तो उसे मुसलमान मत देगा नहीं।
                  (४) क्या, नरेंद्र मोदी से कुछ भी नहीं सीखोगे? मैं जानता हूं, कि भाजपा ही क्या संघ भी मुस्लिम विरोधी नहीं है। पर आम मुसलमान के मस्तिष्क में यह प्रकाश कभी भी नहीं पडेगा। लिख लीजिए।

                  May 15 2011
                  CommentsLikeUnlike

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                  • लेखक परिचय

                    सुरेश चिपलूनकर
                    सुरेश चिपलूनकर

                    लेखक चर्चित ब्‍लॉगर एवं सुप्रसिद्ध राष्‍ट्रवादी लेखक हैं।
                  • ‘प्रवक्‍ता’ एक नजर में

                    6,000 से अधिक लेख / 500 से अधिक लेखक / 68,534 एलेक्‍सा रैंकिंग / 51,281 पेजव्‍यू प्रतिदिन (जनवरी 2012)
                  • प्रवक्ता पर लेख भेजे

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