लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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-डॉ. दीपक आचार्य-

mukti

 

हम सभी लोग स्वतंत्र हैं स्वतंत्रता का सुकून देने के लिए पैदा हुए हैं। लेकिन हममें से अधिकांश लोग इस सत्य को कभी नहीं स्वीकार पाते कि हम स्वतंत्र हैं और स्वतंत्रता का आनंद पाना हमारे ही बस में है।  ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि का प्रत्येक तत्त्व और इकाई अपने आप में स्वतंत्र है लेकिन स्वतंत्रता का अहसास नहीं है।

एक इंसान के रूप में हम सादगी और संयम को अपनाते हुए अच्छी तरह जीवन जी सकते हैं, मौज-मस्ती का आनंद पा सकते हैं लेकिन हममें से शायद ही कोई ऎसा व्यक्ति होगा जो अपनी स्वतंंत्रता का पूरा अहसास कर पाता होगा। सब कुछ होने और सर्वसमर्थ होने के बावजूद हमारे आत्म आनंद में कमी का एकमेव कारण यही है कि हम भविष्य को लेकर भ्रमों, शंकाओं और आशंकाओं की वजह से हमेशा सशंकित रहने के आदी हैं।

दूसरी ओर हम अपने स्वतंत्र अस्तित्व को दरकिनार कर अपनी सुख-सुविधाओं, आरामतलबी, भोग-विलास तथा सुरक्षित भविष्य पाने के लिए हमेशा आगे ही आगे रहते हैं। अपनी छोटी-छोटी ऎषणाओं की प्राप्ति के लिए हम विश्वंभर को भुला कर सांसारिक लोगों के सामने हाथ पसारते रहते हैं, उनके आगे-पीछे, दांये-बांये और चरणों में बने रहने के प्रयास करते रहते हैं तथा यथास्थिति बरकरार रखने या भविष्य को अनुकूल बनाने के लिए रोजाना कभी नए समीकरण बनाते है, कभी नए-नए समझौते करते रहते हैं।

इसी वजह से हमारी आत्मा की मौलिक व ईश्वरप्रदत्त शक्तियां कमजोर होती हैं और हमें लगता है कि अपना पूरा का पूरा जीवन पराया हो चला है। परायेपन का यही बोध हमारी स्वतंत्रता की भावना को छीन कर हमें पूरी तरह पराधीन बना डालता है। एक बार जब यह पराधीनता घर कर जाती है तब पूरी जिन्दगी हम आत्महीनता के भंवर में फंसे हुए रहकर अपने आपको भुला बैठते हैं और उन यंत्रों की मानिंद काम करने लगते हैं जिनके बटन औरों के हाथ में होते हैं।

असल बात यह है कि हम अपने आपको हमेशा किसी न किसी से बंधा हुए पाते हैं। सदा-सर्वदा मुक्त होने के बावजूद मुक्ति का अहसास हमें नहीं होता है और इस वजह से हमारी स्थिति उन मूर्खों जैसी हो गई है जो कि अपने आपको किसी न किसी ऎषणा या संबंधों अथवा भावी आशंका के खंभों से बांधे हुए हैं और उन्हें हमेशा यह बोध बना रहता है कि उन्हें किसी ने इन खंभों से कसकर बांध दिया है। आशंकाओं की रस्सियों से बंधे हुए होने के कारण ही हम हर मामले में अपने आपको गुलाम व बंधक स्वीकार कर चुके हैं।

ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि में दूसरे सारे लोग भी हमारी ही तरह हाड़-माँस के बने हुए हैं और उनके साथ वही व्यवहार होना चाहिए जो कि हम हमारे साथ करते हैं। मगर हम ऎसा नहीं करके कभी किसी प्रलोभन और कभी भय के मारे हम उन लोगों को अपने से श्रेष्ठ और विलक्षण मान बैठते हैं और यहीं से शुरू होती है हमारे जीवन की दुःखद यात्राएं।

हम सारे के सारे लोग मर जाने के लिए ही पैदा हुए हैं। सारी कुण्ठाएं, चिन्ताएं और मानसिक विषाद लेकर मर जाएं उससे तो अच्छा है कि बिंदास होकर जियें और सारा हिसाब यहीं पूरा कर जाएं।

जो कुछ कहना है साफ-साफ कहें, चाहे सामने कितना ही बड़ा कहे जाने वाला आदमी क्यों न हो। मन-मस्तिष्क में जो कल्पनाएं आती हैं, जो विचार आते हैं उनका निर्भयतापूर्वक प्रकटीकरण करें, जिनसे इन विषयों का संबंध है उन लोगों से मुखर होकर कहें।

एक बार निडरतापूर्वक अभिव्यक्ति और पारदर्शिता के भावों को अंगीकार कर लिया जाए तो फिर दुनिया में ईश्वर के सिवाय किसी से भय नहीं लगने वाला। इंसान हैं, इंसान के लिए हैं इसलिए जो कुछ जगत व्यवहार की बातें हैं उनके बारे में इंसानों को अवगत कराने में काहे का भय।

अपनी ओर से हमेशा पाक-साफ रहने का अभ्यास डालें, फिर देखें जीते जी हर प्रकार से मुक्ति का परम अहसास कैसे हिलोरें लेने लगता है। हम न खूंटे से बंधे हैं, न  किसी पाश से बंधे हैं, और न सांसारिक रस्सियों ने हमें जकड़ रखा है।

हम सभी लोग दीन और दुःखी हैं, कुण्ठाओं भरी जिन्दगी जी रहे हैं और अपने आपको तुच्छ समझ बैठे हैं इन सभी का मूल कारण यही है कि हम अपने आपको जान नहीं पाए हैं। माँ के गर्भ में परिपूर्णता पाकर नाल कट जाने के बाद हम सभी मुक्त और स्वतंत्र हैं। हम सभी संसार के लिए हैं, और सारा संसार हमारा है।

मिथ्या पाशों के आभासी अहसास का परित्याग करें और जीवन के हर मोर्चे पर निर्भीकता के साथ मुखर रहकर काम करें, वाणी और व्यवहार में माधुर्य लाएं, हर कर्म में पारदर्शिता और निरपेक्षता लाएं। जीवन्मुक्ति पाने का इससे श्रेष्ठ और सहज माध्यम और कोई नहीं है। हम ईश्वर के अंश हैं, ईश्वर के प्रतिनिधि हैं और ईश्वरीय कार्य के लिए संसार में अवतरित हुए हैं, यही भाव हर पल मन में रखें। मरने से पहले ऎसा कुछ कर जाएं कि आने वाली पीढ़ियाँ भी श्रद्धा और आदर से याद करें और उनमें प्रेरणा का संचार हो।

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