लेखक परिचय

चरखा फिचर्स

चरखा फिचर्स

बेटी ने बदला परिवार का जीवन

Posted On & filed under समाज, सार्थक पहल.

पवन वैष्णव किसानों का देश कहा जाने वाला भारत, जहाँ देश का अन्नदाता आज खुद अन्न को तरस रहा है और बदहाल जीवन जी रहा है। बीते कुछ दिनों में किसानों की आत्महत्या के बहुत से मामले सामने आए हैं। किसानों की आत्महत्या की अहम वजह उनका बढ़ता कर्ज़, गरीबी और भुखमरी है। एक ओर… Read more »

आत्मनिर्भर बन रही हैं झारखंड की महिला किसान

Posted On & filed under महिला-जगत, विविधा.

कृषि सलाहकार बलदेव कुमार हेम्ब्रम बताते हैं “अब तक सैकड़ों किसानों को उन्होंने बागवानी, मछली पालन के साथ अच्छी कृषि कौशल भी सिखाए हैं ” वो आगे कहते हैं कि “मसलिया प्रखंड के राम खोड़ि, गुआसोल एंव सीता पहाड़ी महिला की किसान आत्मनिर्भर हो चुकी हैं। आज ग्रामीण गरीबी दूर करने में समुदायों की बड़ी भूमिका है।



शराबबंदी से बदलता महिलाओं का जीवन

Posted On & filed under समाज.

जगीना जांगड़े बिहार की ही तर्ज पर कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राज्य में शराबबंदी लागु करने का निश्चय किया गया। इसका असर छत्तीसगढ़ के कई गांवो में दिखने लगा है। जिला जांजगीर चांपा का कोसिर गांव इन्ही गांव में से एक है। जहां कुछ समय पहले तक कई परिवार शराब बंदी के कारण… Read more »

लद्दाख के वातावरण को बचाने का अनोखा प्रयास

Posted On & filed under पर्यावरण, समाज.

स्थानीय लोगो के माल मवेशी पर हिंसक हमलों के कारण लोगो का तेंदुए पर गुस्सा बहुत अधिक था, ऐसे में क्षेत्र में विभिन्न पशुओं के नस्लों की रक्षा करना महत्वपूर्ण था। रात के समय पशुओं को रखने की जगह चारो ओर से तो सुरक्षित थी परंतु उपर से खुली होती थी। कारणवश स्नो लेपर्ड रात के समय में जानवरों पर हमला कर देता था और लोगो औरस्नोलेपर्ड के बीच संघर्ष का एक वातारण निरंतर रुप से बढ़ता ही जा रहा था।

 पर्यावरण से छेड़छाड़ के बिना ही मिलने लगा भरपूर पानी

Posted On & filed under परिचर्चा, समाज, सार्थक पहल.

“जब मैं छोटा था बहुत बारिश और बर्फ होती थी। मई के अंत तक पहाड़ बिल्कुल सफेद रहते थे। लेकिन अब बर्फ बहुत ही कम हो गए हैं। सफेद की जगह हरे नजर आते हैं। क्योंकि बारिश ज्यादा होने लगी है”। ये वाक्य है लद्दाख के फ्यांग गांव में रहने वाले 80 वर्षीय टुंडुप वांगाईल का। इसी गांव के 51 वर्षीय रींचेन वांगड़ूज़ बताते हैं कि “साल दर साल वाहनो से निकलने वाले धुंए के कारण वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। और ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे है”।

शिक्षा अधिकार है तो मिलता क्यों नही ?

Posted On & filed under समाज.

समाजसेवी शब्बीर अहमद कहते हैं ” हमें गांव में बसने की सरे आम सजा दी जा रही है। जिससे यह साबित हो रहा है कि शिक्षा भी केवल अमीर लोगों की जागीर बन चुकी है।गरीबों के बच्चे अमीरों की नौकरी के लिए ही इस्तेमाल किए जाते हैं और आगे भी किए जाते रहेंगे। नेता चुनाव के दौरान उच्च अधिकारियों के सामने इन गरीबों को ख्वाब दिखा कर उनका शोषण करते हैं। जिससे साफ जाहिर होता है कि हम लोकतांत्रिक भारत में नहीं रहते । आज के विकसित दौर में भी मोरी अड़ाई के बच्चे खुले आसमान तले शिक्षा लेने को मजबूर हैं।मिडिल स्कूलकी अधूरी बिल्डिंग के निर्माण को पूरा होना चाहिए ताकि कम से कम धूप और बारिश में भी उनकी पढ़ाई जारी रह सके “।

ताकि अगली पीढ़ी जीवित रह सके।

Posted On & filed under विविधा.

22 अप्रैल 1970 से इस दिन की शुरुआत हुई। तब से पूरा विश्व इस दिन को बड़ी गंभीरता से मनाता है। जगह जगह पर वृक्षारोपण करना, स्कूल-कॉलेज के विद्धाथिर्यों द्वारा पर्यावरणीय मुद्दों पर वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेना, सेमिनार का आयोजन करना, सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा नुक्कड़ नाटक के जरिये पर्यावरण की रक्षा हेतू लोगो को प्रोत्साहित करना, प्लास्टिक तथा कीटनाशक के दुष्प्रभाव के प्रति लोगो को जागरुक करना इत्यादि इस दिन के क्रियाकलापों में से हैं।

 लद्दाख के कचरा प्रबंधन में महिलाओं की भूमिका

Posted On & filed under विविधा.

इस बारे में 47 वर्षीय गृहिणी जेरिंग डोल्मा जो अमा सोग्स्पा की सदस्य हैं उन्होंने बताया कि “वे कचरे को अलग किए बिना ही इकट्ठा करती हैं और जलाती हैं। क्या वह स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर कचरे को अंधाधुंध जलाने के प्रभावों को जानती हैं? पूछने पर उन्होने कहा ‘नहीं’। वह वास्तव में यह जानकर अचरज में थी कि प्लास्टिक जलाने पर खतरनाक रासायनिक पदार्थों का उत्सर्जन होता है।

महाबलीपुरम के संगतराश

Posted On & filed under विविधा.

नक्काशीकार और सीप का सामान बेचने वाले दुकानदार रामाचन्दरन के अनुसार ”महाबलीपुरम के तट पर सौ से अधिक पत्थर और सीप के सामान की दुकानें हैं। मछुआरों से सीप ख़रीदकर एसिड से उसकी सफाई करते हैं। इसके बाद चाभी का छल्ला, झुमर और अन्य श्रृंगार के सामान बनाते हैं। इसके अलावा कुछ सामान हम आगरा से भी मंगवाते हैं, लेकिन दुकानदारी कभी होती है, कभी बिल्कुल नहीं। ऐसा भी हुआ कि पूरे पूरे दिन न कोई पत्थर का सामान बिका और न ही सीप का। हैरानी तब होती है जब घरेलू पर्यटकों की तरह विदेशी पर्यटक भी मोलभाव करते हैं और विदेशी समझते हैं कि भारतीयों ने जो कीमत तय किया है, वह उचित नहीं हालांकि ऐसी कोई बात नहीं हमारी कड़ी मेहनत का उन्हें सही अनुमान नहीं होता। ”

बदलते भारत में बदलती शिक्षा

Posted On & filed under समाज.

उच्च शिक्षा के संबध में लोगो की राय जानने के लिए दिल्ली स्थित गैर सरकारी संगठन चरखा ने कुछ छात्रों से बात की। इस संबध में जम्मू विश्वविद्यालय के छात्र जफर कहते हैं कि “विश्वविद्यालय में एडमिशन के बारे पिछड़े क्षेत्रों में जागरूकता की कमी है। उनके पास जानकारी नहीं है कि कब प्रवेश परीक्षा आयोजित की जा रही है। हालांकि सरकार कई योजनाएं लाती है, लेकिन छात्रों को इन योजनाओं के बारे में सूचित करने का कोई रास्ता नहीं है। जम्मू जैसे क्षेत्र में कभी कभी सूचना इतनी देर से पहुंचती है कि छात्र उसके लाभ से वंचित रह जाते है”।