लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

टिया और मैं

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एक मशहूर पौराणिक कथा से बात शुरु होती है। नारद मुनि को हाथ में तेल से लबालब भरा कटोरा लिए राजर्षि जनक के बाग का पूरा चक्कर लगाने को कहा गया था। शर्त थी कि तेल की एक भी बूँद छलकने नहीं पाए। मुनिवर ने सफलतापूर्वक चक्कर लगाया। अब उनसे बाग का वर्णन देने को… Read more »

जीवित अन्त्येष्टि

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कभी कभार आपको ऐसी किताब मिल जाती है जो आपको चौंकाती है और जीवन के प्रति आकर्षण बढ़ाती है। पिछले दिनो एक किताब पढ़ने का अवसर मिला। किताब का नाम है Tuesdays with Morrie. यह किताब अमेरिका के मैसाचुसेट्स के ब्राण्डिस विश्वविद्यालय में सामाजिक मनोविज्ञान के प्रोफेसर मॉरी श्वार्ज़ की कहानी कहती है। मॉरी जीवन… Read more »



गंगा

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 गंगा की भोगौलिक उत्पत्ति मध्य-हिमालय के गंगोत्री हिमवाह(ग्लेसियर) से हुई। इस हिमवाह के पूर्व दिशा से अलकनन्दा का स्रोत आया है एवम् पश्चिम की ओर से भागीरथी का। देवप्रयाग में ये दो धाराएँ मिलित होकर गंगा नाम धारण कर लेती हैं । गोमुख जैसी गुहामुख से पिघले बर्फ की धारा के रूप में भागीरथी उतरती… Read more »

घर

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घर ऐसा परिवेश है, जो एकान्तता और भागीदारी ( privacy and sharing) के घिरे स्थान को समेटे हुए होता है। आदिम मनुष्य जानवरों की तरह ही जंगलों में रहता था। अपना भोजन जंगलों से खाद्य संग्रह और शिकार के द्वारा जुटाता था। फिर उसने खेती करना सीख ही नहीं लिया, अपना भी लिया। इसके साथ… Read more »

तब का और अब का भारत—एक अवलोकन

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जेरेमी सीब्रुक अनुवाद—गंगानन्द झा तीस साल पहले जिस भारत  को मैं गया था, वह आज के भारत से बिलकुल अलग मुल्क था। विदेशी के जेहन में उस वक्त यह अभी भी एक धुँधले, लेकिन व्यापक खतरे के खिलाफ आगाह करता था। सैलानी जरते थे कि उन्हें कोई छूत न लग जाए. भारत गन्दगी और मुसीबत… Read more »

तीसरी किश्त

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-गंगानंद झा- इस्लाम साहब से हमारी मुलाकात कई वर्षों के बाद हुई । अब वे बाकायदा प्रतिष्ठित और सम्पन्न पाकिस्तानी नागरिक और उद्योगपति हो चुके थे, बाकायदे पासपोर्ट, विसा पर आए थे । पाकिस्तान की बातें करते हुए उन्होंने कहा, ‘अरे हम लोग तो बनिया हैं । रोजगार की खातिर दूर-दराज जाना हमारी फितरत रही… Read more »

धार्मिक परिवेश का एक सच ऐसा भी

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-गंगानंद झा- मैं समझता था कि मेरी चेतना में  मुसलमानों की पहचान समझे जाने वाले प्रतीकों के विरुद्ध कोई पूर्वाग्रह नहीं था । पर सीवान ने मुझे बतलाया कि मेरे अवचेतन में कितने विकृत पूर्वाग्रह थे । मैं अपनी ही प्रतिक्रिया से चौंक गया जब एक दिन किश्वर के घर पर बैठा फैज साहब से… Read more »

समाज और धर्मः एक

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-गंगानंद झा- हम अपने को औसत लोगों से भिन्न इस अर्थ में समझते रहे कि‘ विरासत से पाई गई प्रज्ञा‘(received wisdom) के प्रति असहमति को हमने अपनी चेतना में सम्मिलित किया है। सीवान में हमने अपने इस मूल्यांकन को आईना में देखा। धर्म की बात उठाकर राजनैतिक बुद्धि चाहे जितना फायदा उठा ले— वह सत्य… Read more »

भाषा और समाज

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-गंगानंद झा- बात सन् 1989 की है, ‘बाबरी मस्जिद-राम मन्दिर’ का हंगामा चल रहा था, तभी कुछ दोस्तों ने  शहर की दीवालों पर जगह-जगह चिपके बहुत सारे पोस्टर्स की ओर ध्यान दिलाया । ये पोस्टर्स उर्दू में थे,  इनके मज़मून के बारे में कहा जा रहा था कि मुसलमानों को बाबरी मस्जिद के नाम पर… Read more »

मरना कठिन है, पर जीवित रहना उससे अधिक कठिन होता है

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-प्रो. गंगानन्द झा-    मूल्य-बोध धारण किए रहने वालों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती रहती है, इसलिए उनका जीना और भी अधिक कठिन हो जाया करता है। हमारे पिता के जीवन में कठिनाइयों का अभाव कभी भी नहीं रहा ; मरना भी सहज और यन्त्रणा-रहित नहीं रहा । कठिनाइयाँ तो औसत आदमी के जीवन में… Read more »