लेखक परिचय

गोपाल बघेल 'मधु'

गोपाल बघेल 'मधु'

President Akhil Vishva Hindi Samiti​ टोरोंटो. ओंटारियो, कनाडा

ऊर्ध्व हर विन्दु रहा अवनी तल !

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ऊर्ध्व हर विन्दु रहा अवनी तल, गोल आकार हुआ प्रति-सम चल; जीव उत्तिष्ट शिखर हर बैठा, रेणु कण भी प्रत्येक है एेंठा ! कम कहाँ किसी से रहा कोई, लगता पृथ्वी पति है हर कोई; देख ना पाता कौन इधर उधर, समझता स्वयं को महा भूधर ! अधर फैला हुआ है शून्य तिमिर, घूमते पिण्ड… Read more »

उर में आता कोई चला जाता !

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उर में आता कोई चला जाता, सुर में गाता कभी है विचलाता; सुनहरी आभा कभी दिखलाता, कभी बे-रंग कर चला जाता ! वश भी उनका स्वयं पे कब रहता, भाव भव की तरंगें मन बहता; नियंत्रण साधना किये होता, साध्य पर पा के वो कहाँ रहता ! जीव जग योजना विविध रहता, विधि वह उचित… Read more »



वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता !

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वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता, निरीक्षण करना बहुत कुछ होता; जाना पहचाना पुरातन होता, परीक्षण करना पुन: पर होता ! समय से बदलता विश्व रहता, द्रष्टा भी वैसा ही कहाँ रहता; द्रष्टि हर जन्म ही नई होती, कर्म गति अलहदा सदा रहती ! बदल परिप्रेक्ष्य पात्र पट जाते, रिश्ते नाते भी हैं सब उलट… Read more »

ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई !

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ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई, बना ऋषि घुमाया है हर कोई; ख़ुद छिपा झाँकता हृदय हर ही, कराता खोज स्वयं अपनी ही ! पूर्ण है पूर्ण से प्रकट होता, चूर्ण में भी तो पूर्ण ही होता; घूर्ण भी पूर्ण में मिला देता, रहस्य सृष्टि का समझ आता ! कभी मन द्रष्टि की सतह खोता, कभी… Read more »

संस्कार सुर में फुरक कर !

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संस्कार सुर में फुरक कर, ‘सो-हं’ की गंगा लुढ़क कर; ‘हं’ तिरोहित ‘सो’ में हुआ, ‘सो’ समाहित ‘हं’ में हुआ ! वह विराजित विभु में हुआ, अपना पराया ना रहा; अपनत्व पा महतत्व का, था सगुण गुण ले मन रहा ! शाश्वत खिला पा द्युति दिशा, मन महल वत चमका किया; रहना था बस उसका… Read more »

खड़े जब अपने पैर हो जाते !

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खड़े जब अपने पैर हो जाते, आत्म विश्वास से हैं भर जाते; सिहर हम मन ही मन में हैं जाते, अजब अनुभूति औ खुशी पाते ! डरते डरते ही हम ये कर पाते, झिझकते सोचते कभी होते; जमा जब अपने पैर हम लेते, झाँक औरों की आँख भी लेते ! हुई उपलब्धि हम समझ लेते,… Read more »

साथ जो छोड़ कर चले जाते !

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(मधुगीति १७०११४ ब) साथ जो छोड़ कर चले जाते, लौटकर देखना हैं फिर चहते; रहे मजबूरियाँ कभी होते, वक़्त की राह वे कभी होते ! देखना होता जगत में सब कुछ, भोग संस्कार करने होते कुछ; समझ हर समय कोई कब पाता, बिना अनुभूति उर कहाँ दिखता ! रहते वर्षों कोई हैं अपने बन, विलग… Read more »

वाँशुरी ऐसी बजाई मोहन !

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वाँशुरी ऐसी बजाई मोहन, लूटि कें लै गए वे मेरौ मन; रह्यौ कोरौ सलौनौ सूने- पन, शून्य में झाँकतौ रह्यौ जोवन ! चेतना दैकें नचायौ जीवन, वेदना दैकें वेध्यौ आपन-पन; कलेवर क्वारे लखे कोमल-पन, कुहक भरि प्रकटे विपिन बृन्दावन ! मधुवन गागरी मेरी झटके, मोह की माधुरी तनिक फुरके; पुलक-पन दै गए पलक झपके, नियति… Read more »

प्रभु प्रभाव प्रति जीव सुहाई !

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प्रभु प्रभाव प्रति जीव सुहाई; देश काल एकहि लग पाई ! पृथ्वी एक, देश सब अापन; विश्व बसहि, मानस उर अन्तर ! भेद प्रकट मन ही ते होबत; भाव सबल आत्मा संचारत ! बृह्म भाव आबत जब सुलझत; खुलत जात ग्रंथिन के घूँघट ! चक्र सुदर्शन-चक्र चलाबत; आहत होत द्वैत मति भागत ! नेह सनेह… Read more »