लेखक परिचय

गोपाल बघेल 'मधु'

गोपाल बघेल 'मधु'

President Akhil Vishva Hindi Samiti​ टोरोंटो. ओंटारियो, कनाडा

किलकि चहकि खिलत जात !

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किलकि चहकि खिलत जात ! किलकि चहकि खिलत जात, हर डालन कलिका; बागन में फागुन में, पुलक देत कहका ! केका कूँ टेरि चलत, कलरव सुनि मन चाहत; मौन रहन ना चहवत, सैनन सब थिरकावत ! चेतन जब ह्वै जावत, उर पाँखुड़ि खुलि पावत; अन्दर ना रहि पावत, बाहर झाँकन चाहत ! मोहत मोहिनी होवत,… Read more »

उठे कहाँ मन अब तक !

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शब्द परश रूप गंध, रस हैं तन्मात्रा;
छाता जब श्याम भाव, होता मधु-छत्ता !

राधा भव-बाधा हर, मिल जाती भूमा;
अणिमा महिमा गरिमा, भा जाती लघिमा !
तनिमा तरती जड़ता, सुरभित कर उर कलिका;
झंकृत तन्त्रित झलका, सुर आता रस छलका !



कोई मिल पल में चल देता !

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कोई मिल पल में चल देता, कोई कुछ वर्ष संग देता; जाना सबको ही है होता, मिलन संस्कार वश होता ! विदा क्षण क्षण दिये चलना, अलविदा कभी कह देना; यही कर्त्तव्य रह जाता, मुस्करा भाव भव देना ! चले सब जाते अपनी धुन, झाँकते चलते दे चितवन; नज़र में रखे निज मंज़िल, कभी उर्मिल… Read more »

ऊर्ध्व हर विन्दु रहा अवनी तल !

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ऊर्ध्व हर विन्दु रहा अवनी तल, गोल आकार हुआ प्रति-सम चल; जीव उत्तिष्ट शिखर हर बैठा, रेणु कण भी प्रत्येक है एेंठा ! कम कहाँ किसी से रहा कोई, लगता पृथ्वी पति है हर कोई; देख ना पाता कौन इधर उधर, समझता स्वयं को महा भूधर ! अधर फैला हुआ है शून्य तिमिर, घूमते पिण्ड… Read more »

उर में आता कोई चला जाता !

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उर में आता कोई चला जाता, सुर में गाता कभी है विचलाता; सुनहरी आभा कभी दिखलाता, कभी बे-रंग कर चला जाता ! वश भी उनका स्वयं पे कब रहता, भाव भव की तरंगें मन बहता; नियंत्रण साधना किये होता, साध्य पर पा के वो कहाँ रहता ! जीव जग योजना विविध रहता, विधि वह उचित… Read more »

वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता !

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वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता, निरीक्षण करना बहुत कुछ होता; जाना पहचाना पुरातन होता, परीक्षण करना पुन: पर होता ! समय से बदलता विश्व रहता, द्रष्टा भी वैसा ही कहाँ रहता; द्रष्टि हर जन्म ही नई होती, कर्म गति अलहदा सदा रहती ! बदल परिप्रेक्ष्य पात्र पट जाते, रिश्ते नाते भी हैं सब उलट… Read more »

ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई !

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ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई, बना ऋषि घुमाया है हर कोई; ख़ुद छिपा झाँकता हृदय हर ही, कराता खोज स्वयं अपनी ही ! पूर्ण है पूर्ण से प्रकट होता, चूर्ण में भी तो पूर्ण ही होता; घूर्ण भी पूर्ण में मिला देता, रहस्य सृष्टि का समझ आता ! कभी मन द्रष्टि की सतह खोता, कभी… Read more »

संस्कार सुर में फुरक कर !

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संस्कार सुर में फुरक कर, ‘सो-हं’ की गंगा लुढ़क कर; ‘हं’ तिरोहित ‘सो’ में हुआ, ‘सो’ समाहित ‘हं’ में हुआ ! वह विराजित विभु में हुआ, अपना पराया ना रहा; अपनत्व पा महतत्व का, था सगुण गुण ले मन रहा ! शाश्वत खिला पा द्युति दिशा, मन महल वत चमका किया; रहना था बस उसका… Read more »

खड़े जब अपने पैर हो जाते !

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खड़े जब अपने पैर हो जाते, आत्म विश्वास से हैं भर जाते; सिहर हम मन ही मन में हैं जाते, अजब अनुभूति औ खुशी पाते ! डरते डरते ही हम ये कर पाते, झिझकते सोचते कभी होते; जमा जब अपने पैर हम लेते, झाँक औरों की आँख भी लेते ! हुई उपलब्धि हम समझ लेते,… Read more »