लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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shiraj_modiप्रवीण दुबे
सिविल सर्विस डे के अवसर पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दो अलग-अलग स्थानों पर अधिकारियों को सीख देते दिखाई दिए। संभवत: ऐसा पहली बार देखने को मिला जब देश का प्रधानमंत्री और किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री ने सहजता पूर्ण ढंग से अधिकारियों को समझाया सर्वविदित है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में जहां प्रशासनिक अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका है अभी तक किसी भी सरकार ने इस दिन का ठीक उपयोग नहीं किया, इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद दिया जाना चाहिए।

 जहां तक इस दिन को मनाए जाने का सवाल है मोदी की पहल पर इस दिवस को नई ऊंचाइयों के साथ मनाने का कीर्तिमान तो रच दिया गया, लेकिन उससे भी बड़ी बात तो यह रही कि प्रधानमंत्री और म.प्र. के मुख्यमंत्री ने इस दिन का सद्पयोग करते हुए अधिकारियों को जो सलाह दी है वास्तव में उस पर चर्चा करना बेहद आवश्यक है।
 इस पर हम बारी-बारी से विश्लेषण करेंगे। पहले मोदी द्वारा अधिकारियों को दी गई सीख पर बात कर लेते हैं। मोदी ने देशभर के अधिकारियों को तनाव मुक्त होकर काम करने की सलाह देते हुए कहा कि ‘तनावग्रस्त व्यक्ति कुछ हासिल नहीं कर सकता, आप तनाव में रहेंगे तो काम नहीं होगा। मोदी ने यहां तक सलाह दी कि अधिकारी अपने बारे में विचार करें उनकी जिंदगी फाइल बनकर तो नहीं रहेगी। इसके साथ ही बातों-बातों में मोदी ने यह भी सलाह दी कि उनके अर्थात अधिकारियों के कामकाज में राजनीतिक दखलंदाजी भी जरुरी है क्योंकि विधायकों सांसदों को जनता चुनती है।
 मोदी की बात सौ प्रतिशत सही है लेकिन मोदी की इस सलाह के आखिर मायनें क्या  है? क्या इस देश की प्रथम पंक्ति की नौकरशाही पर काम का बोझ अर्थात तनाव इस कदर हावी हो रहा है कि देश के प्रधानमंत्री को उन्हें इससे बचने की सलाह देनी पड़ रही है।
 इससे भी बड़ी बात तो यह है कि क्या अधिकारियों के काम-काज पर राजनीतिक दखलंदाजी इस कदर हावी हो रही है कि प्रधानमंत्री को इससे पैदा हो रहे तनाव को कम करने के लिए अधिकारियों को इस बात का आभास कराना पड़ रहा है कि राजनीतिक दखलंदाजी तो होती रहेगी क्योंकि सांसद-विधायक को जनता चुनती है।
 जहां तक विकास कार्यों को निर्धारित समय सीमा में पूरा करने के कारण तनाव पैदा होने की बात है तो इसको लेकर राजनीतिक हस्तक्षेप सही है लेकिन यदि ऐसे कार्य के लिए जो न्यायसंगत नहीं है और उसके लिए कोई दबाव बनाया जा रहा है तो फिर अधिकारी की परेशानी या तनाव को जायज ठहराया जा सकता है। रही बात फाइलों में उलझे रहने की और इसके चलते परिवार को समय न दे पाने के कारण उपजे तनाव की तो इस पर कैसे काबू पाया जाए इसका रास्ता भी खोजा जाना बेहद आवश्यक है। व्यवस्थित दिनचर्या, काम को समय पर नियमित निपटाने की आदत, योग आदि से इस तरह की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।
 यहां म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह द्वारा सिविल सर्विस डे पर अधिकारियों से जो कुछ कहा गया वास्तव में वह एक नेक सलाह कही जा सकती है। शिवराज सिंह ने कहा कि अफसरों के बीच अहंकार का टकराव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ‘मैं अफसर हूं यह अहंम अधिकारी में नहीं होना चाहिए। आपको अधिकार मिला है तो जनता की सेवा में उसका सद्पयोग करें। 
बात सौ प्रतिशत सच है। निश्चित ही प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज की अधिकारियों को दी गई यह सीख कितनी कारगर होगी यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन सिविल सर्विस डे पर देश और प्रदेश के शीर्ष स्थानों पर बैठे नेताओं ने अधिकारियों की दो प्रमुख समस्याओं को लेकर एक सार्थक सीख देने की कोशिश करके एक अच्छी परंपरा की शुरुआत की है। यदि अधिकारी इस दिशा में सकारात्मक तरीके से सुधाल लाने का प्रयास करते हैं तो अच्छा वातावरण निर्मित होगा।

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1 Comment on "अधिकारियों को सही सलाह"

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suresh karmarkar
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सिविल सर्विस डे पर यदि प्रधानमंत्री औ मुख्यमंत्री इन दो सीखों के अलावा एक सलाह देते तो ज्यादा लाभप्रद होता. अहम का टकराव् और विधायकों और सांसदों या जनप्रतिनिधियों का हस्तक्ष्ेप तो होगा ही. यदि इन दोनों बातों से पार पाना है टी उसका एक संभावित रास्ता है विप्पशना” आवश्यक नहीं ऐच्छिक। एक तो विप्पशना किसी धर्म ,मज़हब ,का न तो विरोध करती है और न समर्थन करती है. दूसरे अपने अपने धर्म या मजहब या पूजा पद्धति से इसका कोई सम्बन्ध नहीं। जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए ”योग” है उसी प्रकार मन को स्वस्थ रखने के… Read more »
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