लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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  autismऔटिज़्म एक ऐसा विकार है जो बच्चों मे सीखने मे  दिक़्कते (learning disabilities) पैदा करता है और कभी कभी उन्हे मन्दबुद्धि मान लिया जाता है। औटिज़म  एक स्नायु से संबधित विकार है जो व्यापक रूप से बढ़ते हुए बच्चों की सीखने की प्रक्रिया मे बाधक होता है।

यह लेख लिखने का  उद्देश्य केवल इस विकार की  सतही जानकारी से अवगत कराना है,न कि उसके वैज्ञानिक पक्ष के विस्तार मे जाना। इस विकार पर काफ़ी शोध हुए हैं पर अभी भी और अनुसंधान और शोध करने की ज़रूरत है, कारण और उपचार ढूंढने के लियें।

इससे पीड़ित बच्चे सामाजिक व्यवहार सही तरह से नहीं कर पाते, उन्हे शाब्दिक और गैर शाब्दिक संचार (verbal, nonverbal  communication)  मे भी बहुत असुविधा होती है। उनके व्यवहार मे पुनरावृत्ति और रुढ़िवादिता आ जाती है। वे बदलाव पसन्द नहीं करते। उनका मसतिष्क सूचनाओं का सही  प्रसंसकरण  (processing)  नहीं कर पाता। औटिज़्म के लक्षण तीन साल की आयु के बाद ही प्रकट होते हैं इसलियें इसका निदान भी इससे पहले नहीं हो पाता। औटिज़्म के निदान के लियें कोई परीक्षण नहीं है मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक बच्चे के व्यवहार का निरीक्षण करके ही निदान करते हैं।

औटिज़्म मे मस्तिषक की कोशिकाओं और उनको जोड़ने वाले सिनैप्सिज़ मे बदलाव आजाता हैं, इससे संबधित बहुत सारे सवाल हैं जिनका जवाब ढ़ूँढने के लियें अभी और अनुसंधानों की आवश्यकता है।औटिज़म के  कारण अनुवांशिक होते है पर अभी जानकारी पूरी नही हैं, मान जाता है कि जींस मे कुछ अनचाहे परिवर्तन कभी हो जाते हैं जिससे यह  होता है। कभी कभी देखा गया है कि औटिज़म के लक्षण अनुवांशिक नहीं होते और जन्म के समय की किसी ग़ल्ती जैसे भारी धातु, कीटनाशकों या किसी  ग़लत वैक्सीन के उपयोग से भी हो सकते है, परन्तु निश्चित रूप से कारणो के बारे मे अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।

इस विकार मे सामान्य सामाजिक विकास अवरुद्ध होने लगता है पर सामाजिक विकास से संबधित कुछ अन्य विकार भी होते है , इसलिये कुशल विशेषज्ञ द्वारा सही निदान होना ज़रूरी है। औटिज़्म से पीड़ित बच्चे बाहरी उत्तेजना (stimuli)  पर सामान्य बच्चों की तरह प्रतिक्रिया (react)  नहीं कर पाते। आंख से आंख मिलाना मुश्किल होता है।शरीर के हाव  भावो से भी मन की बात बताना मुश्किल होता है। किसी चीज़ की तरफ इशारा करके उसे मांग भी नहीं पाते ,अपनी उम्र के हिसाब से व्यवहार नहीं कर पाते। अचानक बीच मे एक दो शब्द बोल देगे कभी किसी व्यक्ति नक़ल करने की कोशिश भी करते हैं। ये बच्चे अकेलापन महसूस करते हैं, दोस्त नहीं बना पाते, अगर कोई दोस्त बन जाये तो उससे बहुत जुड़ जाते हैं। कभी कभी चिड़चिड़ापन अक्रामक व्यवहार या हिंसा भी कर सकते हैं।

अकसर ये बच्चे एक काम को दोहराते हैं जैसे हाथ पटकना या पैर पटकना बारबार चीज़ों को लाइन मे लगाना या एक के ऊपर एक जमाना।इन्हे बदलाव नहीं पसन्द होता जो चीज़ जहाँ हो वहीं  रहनी चाहिये। खाने मे कोई चीज़ पसन्द आगई तो रोज़ वही खाना चाहेंगे। इसी तरह टी.वी. के किसी कार्यक्रम से जुड़ गये तो उसे देखे बिना नहीं चैन मिलेगा।कपड़े भी एक ही तरह के पहनना चाहेंगे। दिनचर्या मे कोई बदलाव स्वीकार नहीं करेंगे।कभी अपनी त्वचा को खुरचते रहेंगे जिससे ख़ुद को नुकसान भी हो सकता है।

औटिज़म के लक्षण बच्चों मे धीरे धीरे दिखाई देते है। कभी कभी शुरू से मे वे सामान्य बच्चों की तरह बढ़ते हैं फिर उनकी हालत मे गिरावट आने लगती है।इस समय उन्हे बार बार दोहरा कर बोलने मे, समझने मे बातचीत करने मे मदद की जा सकती है जिससे वो अपनी देखभाल कर सकें और उनमे आत्मविश्वास पैदा हो। ऐसा करने से उनका संचार कौशल [communication skills] और सामाजिक कौशल [social skills] बढ़ने की आशा की जा सकती है।कुछ लोगों का मानना है कि औटिज़म एक बीमारी नही है एक अलग स्थिति है जिसे स्वीकार करना चाहिये ,जबकि कुछ लोग इसे एक बीमारी मानकर इसके इलाज की तलाश मे लगे हैं।जब तक इसका कोई इलाज नहीं मिलता तब तक तो इसे स्वीकार करके, बच्चों को उचित प्रशिक्षण देकर, उन्हे यथासंभव योज्ञ और आत्मनिर्भर बनाने पर ध्यान देना ज़रूरी है। औटिज़म से पीड़ित बच्चों का संचार कौशल कम होता पर कुछ बड़ा होने पर काफी बच्चे अपनी ज़रूरते  बता पाते हैं।  अक्सर उनके हाव भाव शब्दों से मेल नहीं खाते। अपनी भावनाये और अनुभव दूसरों से साझा नहीं कर पाते, सुनकर बात को दोहराते हैं।

औटिज्म स्पैक्ट्रम के अंतर्गत कई प्रकार के विकार आते हैं। औटिज़म स्पैक्ट्रम [ Autism spectrum ] मे ऐसपर्गर्स सिंड्रोम (Asperger syndrome ASDs)   और परवेसिव डेवलपमैन्ट डिसऔर्डर (Pervasive developmental disorder  PDD, not otherwise specified NOS ,) होता है जिनमे औटिज्म का स्तर अलग अलग होता है, कम प्रभावित बच्चे अपना काम अपने आप करना सीख जाते हैं अधिक प्रभावित बच्चों को किसी के सहारे की आवश्यकता पड़ती है। कुछ विशेषज्ञ इन बच्चों को विविध प्रकार से शिक्षा और प्रशिक्षण देकर उनकी क्षमताओं का विकास करते हैं। हरेक बच्चे की आवश्यकता के अनुसार उसके प्रशिक्षण का कार्यक्रम तैयार करना पड़ता है। माता पिता को उनका आत्मविश्वास बढ़ाना पड़ता है।

यद्यपि औटिज़म का कोई इलाज नहीं है फिर भी कुशल प्रबन्धन से बच्चों की कार्य कुशलता बढ़ाई जा सकती है। औटिज़म से पीड़ित बच्चे कभी किसी चीज़ जैसे संगीत नृत्य चित्रकला या किसी अन्य क्षेत्र मे विशेष योज्ञता  रखते हैं जिसको विकसित किया जासकता है।

यदि किसी बच्चे मे औटिज़म के लक्षण दिखाई दें अपने क्षेत्र के किसी मनोवैज्ञानिक  या  मनोचिकित्सक से मिलना चाहिये। वो बच्चे के व्यवहार के आधार  पर अन्य विशेषज्ञों की सहायता लेकर सुनिश्चित करेंगे के बच्चे को औटिज़म है या नहीं और है तो किस स्तर का। बच्चे की ज़रूरत के अनुरूप प्रशिक्षण के लियें भी आपके  क्षेत्र मे  कहाँ सुविधा है, वो बता पायेंगे। कुछ समय बाद प्रशिक्षण के तरीके अभिभावक भी सीख जाते हैं।

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